आत्मा तो अमर है, फिर लोगों की मर क्यों रही है?



--प्रमोद दूबे
कोलकाता - पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज।

महाभारत एक ग्रंथ है,जो सम्पत्ति के बंटवारे, मान-सम्मान के मामले को उठाकर, उनका समाधान करता है। हर विवाद, प्रत्येक समस्या का समाधान अंततः उसकी जड़ को ही खत्म कर संभवतः किया गया है! समस्या भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्योधन, शकुनी, शिशुपाल आदि सभी थे, सभी की जड़ों को काट दिया गया।

... और एक दिन द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था। वहां उपस्थित सभी की आत्मा मर चुकी थी, क्योंकि आत्मा तो अजर-अमर है, फिर मरती क्यों है? जो अन्याय का विरोध नहीं करता है, उसकी आत्मा मर चुकी है या मर जाती है!

... और उस दिन उस दुर्दांत अपराधी को चुनाव जीतने के लिए टिकट दे दिया गया। उसने दस करोड़ रुपए से भी ज्यादा पैसा बड़े नेताओं को दिया है! एक दिन उसके सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित था। प्रतिदिन गंगा स्नान, रामायण, महाभारत पढ़ने वाले कतिपय नेता खामोश थे, एक शब्द विरोध में बोलने की क्षमता नहीं रही। यहां एक विचारधारा को हराना है, राष्ट्रवाद को हराना है! श्रीराम मंदिर की धारणा को हराना है! सनातन संस्कृति को हराना है, कुछ जातियों को हराना है! विकास को हराना है! क्या घृणित मानसिकता है? यह एक जागरूक व्यक्ति की आत्मा के मर जाने जैसा है।

... और वे देख रहे हैं कि वह हफ्ता वसूली, भ्रष्टाचार में लिप्त है, फिर भी उसे टिकट दे दिया गया! आखिर क्यों? लाखों कार्यकर्ताओं ने अपनी आत्मा को गिरवी रख दिया, क्यों? वह इसलिए कि अपनी जाति का प्रत्याशी है, अपनी जाति का नेता है, अपनी जाति का मंत्री बनेगा! ग्राम पंचायत अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक बस हमारी जाति का ही बनें! ग्राम पंचायत सचिव से लेकर केंद्रीय मुख्य सचिव तक हमारी जाति का ही बनें! यह सोच विकास और राष्ट्रीय उन्नति के लिए बाधक है।

शासन-प्रशासन व राजनीति में जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त व्यक्ति देश व समाज के लिए खतरा है। वह अपना जातिवादी एजंडा चलाता है। आरक्षण का मैं उतना विरोध नहीं करता, जितना प्रतिभाशाली युवाओं के अवमूल्यन का! शासन-प्रशासन व जनप्रतिनिधियों से जुड़े नामों के पीछे जाति सूचक शब्द खेमेबाजी को और मुखर करती है।

... और हमारी आत्मा मर चुकी है, मन गिर चुका है, क्यों? इसलिए कि मुझे परिवार से ज्यादा अपनी, समाज से ज्यादा व्यक्ति, देश से ज्यादा समाज, अपने समूह के हितों की चिंता है। यह स्वार्थ हमारे देश को खोखला कर रहा है, युवा प्रतिभाओं का अवमूल्यन, उनके मनोबल को नीचा करना है। विकास की गंगा के प्रवाह को रोकना है। महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंक और नक्सलवाद को बढ़ावा देना है।

हम भ्रष्टाचार में लिप्त प्रत्याशियों का अपने दल में प्रवेश क्यों नहीं रोकते हैं? क्या होगा, अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर पार्टी से बाहर किया जा सकता है! चलिए इस जन्म में हम वह त्याग कर दें और इलाके को माफियाओं, भ्रष्टचारियों, लूटेरों के आतंक से मुक्त कराएं।

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