वाराणसी: ट्रामा सेंटर प्रभारी सौरभ सिंह को लोकायुक्त ने जारी किया सम्मन



वाराणसी - उत्तर प्रदेश
इंडिया इनसाइड न्यूज।

●प्रो. सौरभ सिंह पर आयुष्मान भारत योजना में 11.61 करोड़ रुपयों की वित्तीय अनियमितता का आरोप

●लोकायुक्त ने आरोपी ट्रामा सेंटर प्रभारी से मांगा बेनामी संपत्ति का ब्यौरा

●आरोपी ट्रामा सेंटर प्रभारी पर नियमों की अनदेखी एवं अपने परिचितों को लाभ देने का भी है आरोप

●आयकर विभाग कर रहा आरोपी सौरभ सिंह की बेनामी संपत्ति की जांच

●भ्रष्टाचार का यह मामला अत्यंत गंभीर, दर्ज हो सकती है एफआईआर: एडवोकेट अमित

बीएचयू स्थित ट्रामा सेंटर प्रभारी सौरभ सिंह को भ्रष्टाचार के आरोपों के सापेक्ष लोकायुक्त ने सम्मन जारी कर दिया है। लोकायुक्त की ओर से जारी सम्मन में आरोपी प्रो. सौरभ सिंह को निर्देशित किया गया है कि वे सभी दस्तावेज व सुसंगत पत्रावलियों के साथ आगामी 4 जून 2026 को उपस्थित हों। प्रो. सौरभ सिंह पर ट्रामा सेंटर में भारी भ्रष्टाचार व पद का दुरुपयोग करने का आरोप है। सामाजिक कार्यकर्ता राजनारायण मौर्या ने उत्तर प्रदेश लोकायुक्त के समक्ष दाखिल किये परिवाद में आरोप लगाया है कि ट्रामा सेंटर प्रभारी सौरभ सिंह ने आयुष्यमान भारत योजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश सरकार से प्राप्त लगभग 11,61,22,001 (ग्यारह करोड़ इकसठ लाख बाईस हजार एक) रुपये की धनराधि के उपयोग में गंभीर अनियमितताएं की हैं। परिवादी ने लोकायुक्त से आरोपी सौरभ सिंह की बेनामी संपत्तियों, वित्तीय लेन देन, ट्रामा सेंटर में खरीद प्रक्रिया तथा अधिकृत पोर्टल के रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच की मांग की है।

• आयुष्यमान भारत योजना की धनराशि का दुरुपयोग

आरोपी ट्रामा सेंटर प्रभारी सौरभ सिंह पर आरोप है कि उन्होंने अपात्रों व निजी परिचितों अथवा संदिग्धों को इस योजना का लाभ पहुंचाया है। इसके साथ ही आरोप है कि सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत संचालित ‘‘अमृत फार्मेसी’’ से लगभग 1.31 करोड़ रुपये की खरीदारी दर्शायी गई है जबकि लगभग 10 करोड़ रुपयों से अधिक की खरीद निजी फर्मों से की गई है। इस संबंध में लोकायुक्त को संबंधित दस्तावेज व ट्रांजेक्शन भी प्रस्तुत किये गए हैं।

इसके अलावा कई प्रकरणों में दवाईयां, उपकरण व अन्य सामग्री स्वीकृत सूची में शामिल न होने के बावजूद भी उनका भुगतान आयुष्यमान योजना की धनराशि से किया गया। साथ ही आरोप है कि कुछ गलत इंट्री के माध्यम से इस योजना का भुगतान प्राप्त किया गया।

• एसएसीएचआईएस के नियमों का उल्लंघन

परिवाद में दर्ज आरोपों के अनुसार आरोपी प्रो. सौरभ सिंह ने आयुष्यमान भारत योजना का डिजिटल संचालन करने वाले प्लेटफॉर्म एसएसीएचआईएस के नियमों की अनदेखी कर भारी अनियमितताएं की हैं। नियमानुसार प्रत्येक मरीज के उपचार से पूर्व अधिकृत प्राधिकारी से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होता है। साथ ही अधिकृत स्वास्थ्य बीमा एजेंसी द्वारा प्रदान किये जाने के उपरांत ही संबंधित दवाईयां, उपकरण व इंप्लांट उपलब्ध कराए जाते हैं। आरोप है कि आरोपी प्रो. सौरभ सिंह ने उक्त नियमों की अनदेखी करते हुए अनेक प्रकरणों का निस्तारण किया।

• आयकर विभाग कर रहा जांच

परिवादी द्वारा लोकायुक्त को यह अवगत कराया गया है आरोपी प्रो सौरभ सिंह की बेनामी संपत्ति की जांच आयकर विभाग कर रहा है। इसके लिए आरोपी सौरभ सिंह के समस्त बैंक ट्रांजिक्शन एवं संपत्तियों से संबंधित पत्रजात खंगाले जा रहे हैं।

• पद का दुरुपयोग

परिवाद में आरोपी ट्रामा सेंटर प्रभारी सौरभ सिंह पर अपने पद का खुलकर दुरुपयोग करने का आरोप है। उन्होंने ट्रामा सेंटर में अपने परिचितों और संबंधियों को लाभ दिलाने के लिए अपने पदीय दायित्वों का दुरुपयोग किया है। इसके लिए परिवादी द्वारा आरोपी प्रो. सौरभ सिंह के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा अन्य प्रासंगिक विधिक प्रावधानों के अंतर्गत मामले को देखने की मांग की गई है।

परिवादी द्वारा उपब्ध कराए गए साक्ष्यों को लोकायुक्त ने संज्ञान में लेते हुए आगामी 4 जून 2026 को आरोपी ट्रामा सेंटर प्रभारी सौरभ सिंह समेत दो अन्य अधिकारी; आयुष्मान भारत योजना (एसएसीएचआईएस) की मुख्य कार्याधिकारी अर्चना वर्मा, आईएएस व ट्रामा सेंटर में तैनात बीएचयू की आयुष्यमान भारत योजना की नोडल अधिकारी कविता मीना को संबंधित दस्तावेजों के साथ उपस्थित होना का निर्देश दिया है।

• मामला अत्यंत गंभीर है दर्ज हो सकती है एफआईआर : एडवोकेट प्रशांत श्रीवास्तव

विधि विशेषज्ञ एडवोकेट अमित श्रीवास्तव के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लोकायुक्त द्वारा इस प्रकार का संज्ञान सामान्यतः तभी लिया जाता है जब वह प्रथम दृष्टया आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों से संतुष्ट होकर प्रारंभिक जांच प्रारंभ करने योग्य स्थिति पाता है। यही वह बिंदु है जो इस मामले को साधारण शिकायत से अलग करता है। जहां एक ओर पुलिस व्यवस्था में संज्ञेय मामलों में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य प्रक्रिया होती है, वहीं लोकायुक्त बिना प्रारंभिक संतुष्टि के न तो जांच प्रारंभ करता है और न ही इस स्तर का सम्मन जारी करता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट संकेत है कि प्रस्तुत आरोपों को प्रथम दृष्ट्या गंभीरता के साथ स्वीकार किया गया है और मामला अब औपचारिक प्रारंभिक जांच के चरण में प्रवेश कर चुका है।

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