--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
●संघर्ष, रणनीति और संगठन शक्ति से भाजपा को दिलाई ऐतिहासिक सफलता
●कैलाश के संगठन कौशल से बंगाल में खिला भाजपा का कमल
●राजनीतिक चुनौतियों के बीच विजयवर्गीय ने लिखी बंगाल में भाजपा की नई कहानी
●बीजेपी को 03 से 77 सीटों तक पहुंचाने वाले हैं कैलाश विजयवर्गीय
●विजयवर्गीय ने बंगाल में जो पौधा रोपा वह वटवृक्ष बन गया
●बंगाल फतह का श्रेय विजयवर्गीय को
भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल का चुनाव हमेशा से केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं माना गया, बल्कि यह वैचारिक संघर्ष, राजनीतिक धैर्य और संगठनात्मक क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जाता रहा है। वर्षों तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव में रहने वाले बंगाल में बीजेपी का मजबूत होकर उभरना किसी सामान्य राजनीतिक घटना की तरह नहीं देखा जा सकता। यह परिवर्तन एक लंबी राजनीतिक साधना, निरंतर संघर्ष और मजबूत रणनीति का परिणाम रहा। इस ऐतिहासिक परिवर्तन के केंद्र में यदि किसी एक नेता का नाम सबसे प्रमुखता से उभरता है, तो वह हैं मध्यप्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री और भाजपा के कुशल संगठनकर्ता कैलाश विजयवर्गीय। पश्चिम बंगाल में भाजपा की मजबूत उपस्थिति और सत्ता तक पहुंचने की राह को आसान बनाने में कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को राजनीतिक विश्लेषक भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने ऐसे समय में बंगाल की जिम्मेदारी संभाली थी, जब भाजपा वहां राजनीतिक रूप से सीमित प्रभाव वाली पार्टी मानी जाती थी। उस समय भाजपा का संगठन जमीनी स्तर पर कमजोर था और कार्यकर्ताओं को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। लेकिन विजयवर्गीय ने परिस्थितियों को चुनौती मानते हुए बंगाल में पार्टी के लिए नई ऊर्जा और नई दिशा तैयार की। 2021 में जो पार्टी 03 सीटों तक सिमटी थी वह कैलाश जी के कारण 77 तक पहुंची।
• जब विजयवर्गीय पर टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने हमला किया, उसे याद कर आज भी भावुक हो जाते हैं कैलाश जी
लगभग पांच वर्ष पहले जब भाजपा नेतृत्व ने कैलाश विजयवर्गीय को बंगाल का प्रभारी बनाकर भेजा था, तब बहुत कम लोगों ने यह कल्पना की थी कि पार्टी इतनी तेजी से राज्य की राजनीति में अपनी पैठ बना लेगी। बंगाल प्रभार के दौरान वे तमाम मुसीबतों को झेलते हुए अपने मिशन में लगे रहे। एक चुनावी सभा में जाते समय टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने उनके काफिले पर पत्थरों से हमला किया था। जिसमें वह बाल-बाल बचे थे। आज भी कैलाश जी उस मंजर को याद करके बेचैन हो जाते हैं। उन पर फर्जी आपराधिक मामले दर्ज हुए, व्यक्तिगत आरोप लगाये गए लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। विजयवर्गीय ने बंगाल को केवल चुनावी राज्य की तरह नहीं देखा, बल्कि वहां के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ताने-बाने को गहराई से समझने का प्रयास किया। उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास भरने और आम जनता तक पार्टी की विचारधारा पहुंचाने का काम लगातार किया।
• मैंने 2020 में देखा भय, आतंक और गुंडागर्दी का मंजर
भोपाल से 1425 किलोमीटर का सफ़र कर के जब मैं 2021 के विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करने पश्चिम बंगाल पहुँची तो इस राज्य में घुसते ही मुझे भय और एक अजीब सी बेचैनी का एहसास हुआ। कोरोना की जद से बाहर आ रहे कोलकाता शहर में एक अजीब सा सन्नाटा रहता था। जैसे कोलकाता की मैंने कल्पना की थी ये वैसा नहीं था। मैंने सोचा कि कैसे कैलाश जी ऐसी जगह पर रह रहे हैं। जहाँ ना लोग अपने, ना बोली अपनी और ना ही सोच अपनी। लेकिन तब मुझे समझ आया कि पश्चिम बंगाल में ममता के चक्रव्यूह को तोड़ने और उसके गढ़ को भेदने के लिए अभिमन्यु और शिवाजी की तरह साहसी और निर्भीक व्यक्ति की जरूरत थी जो कैलाश विजयवर्गीय में देखने को मिली। मैंने वहाँ विभिन्न क्षेत्रों में जाकर चुनावी माहौल का जायज़ा लिया। कई जगह जाकर इंटरव्यू लिए। तब एक बात स्पष्ट होती जा रही थी कि पार्टी ने कैलाश जी को अत्यंत कठिन काम सौंपा है। उस समय पश्चिम बंगाल की जनता दो धड़ों में विभाजित थी। एक ममता के घोर समर्थक और एक ममता से बेहद आतंकित। दोनों ही स्थितियों में कैलाश जी के लिए परिस्थितियाँ विकट थीं। लेकिन उनका साहस और लक्ष्य के प्रति समर्पण इन सभी पर भारी था। वे बंगाल की धरती पर टिके रहे और अड़िग रहे और वामपंथी उग्रवाद के उस गढ़ में सेंध लगाने में सफल हुए। यकीनन पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के लिए बीज बोने का कठिन कार्य कैलाश जी द्वारा ही किया गया था।
• बंगाल फतह में विजयवर्गीय का विशेष योगदान
बंगाल की राजनीति हमेशा से संघर्षपूर्ण रही है। वहां राजनीतिक हिंसा, कार्यकर्ताओं पर हमले और विरोधी दलों के लिए कठिन माहौल जैसी परिस्थितियां किसी से छिपी नहीं हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं को भी लंबे समय तक इसी प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऐसे कठिन समय में विजयवर्गीय लगातार कार्यकर्ताओं के बीच खड़े दिखाई दिए। यही कारण रहा कि भाजपा धीरे-धीरे बंगाल के गांवों, कस्बों और शहरों तक अपनी मजबूत पकड़ बनाने में सफल हुई। बंगाल में उन्होंने छोटे-छोटे कार्यकर्ता सम्मेलनों, जनसंपर्क अभियानों और बूथ प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया। परिणाम यह हुआ कि जो भाजपा कभी ईकाई के आंकड़े तक सीमित थी, वह देखते ही देखते 77 सीटों तक पहुंचने में सफल हो गई। वर्षों तक बंगाल की जनता भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, बेरोजगारी और प्रशासनिक पक्षपात जैसे मुद्दों से परेशान रही। लोगों के भीतर परिवर्तन की इच्छा तो थी, लेकिन उन्हें एक मजबूत विकल्प की तलाश थी। भाजपा ने इसी जनभावना को समझते हुए जनता के बीच अपनी उपस्थिति मजबूत की।
• मध्यप्रदेश में भी संकटमोचन की भूमिका में विजयवर्गीय
कैलाश विजयवर्गीय ने केवल बंगाल, हरियाणा तक अपनी कुशल संगठन क्षमता को प्रदर्शित नहीं किया बल्कि वह मध्यप्रदेश में भी एक संकटमोचन की भूमिका में रहते हैं। प्रदेश में जब-जब भी पार्टी पर संकट पैदा होता है वह सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं और अपनी कुशलता से समस्या का निवारण कर देते हैं। सत्ता और संगठन में मजबूत पकड़ के चलते वह एक प्रभावी नेता की भूमिका में नजर आते हैं।