क्या छत्तीसगढ़ में होगा में अराजकता और भ्रष्टाचार का अंत?



--विजया पाठक (एडिटर- जगत विजन),
रायपुर-छत्तीसगढ़, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ भूपेश बघेल के राज में सुपर सी.एम महिला अधिकारी, दागी आईएएस और सलाहकारों की लूट से छत्तीसगढ़ को मिलेगा छुटकारा

■ सीएम पद के प्रबल दावेदार टीएस सिंहदेव को अब भी कुर्सी मिलने का इंतजार

छत्तीसगढ़ में विगत ढ़ाई साल से जो लूट हुई, अत्याचार हुआ वैसा इस प्रदेश ने कभी नहीं देखा था। चाहे अवैध शराब टैक्स हो या अवैध कोयला टैक्स बस हर जगह लूट ही लूट मची हुई थी। साथ में पूरा मीडिया मैनेज करने के लिए सलाहकार दलाली में लगे थे। इस लूट अत्याचार के खिलाफ कोई लिखता या आवाज उठाता उसका दमन इस सरकार में किया जाता। चाहे पत्रकार हो, सामाजिक कार्यकर्ता या सरकारी नौकर सबको सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर केस दर्ज कर दिया जाता। इन ढ़ाई साल में सत्ता का जो नशा भूपेश बघेल पर चढ़ा उसने आम छत्तीसगढ़िया को परेशान कर छोड़ा चाहे किसान हो, छोटा व्यापारी, सरकारी नौकर सब इस सरकार के रवैए से परेशान रहे। असली में सरकार तो सुपर सीएम महिला अधिकारी, दागी आईएएस और सलाहकार मिल कर चला रहे है। भूपेश बघेल का साहस इतना बढ़ गया कि अभी हाईकमान के मना करने के बावजूद 56 विधायकों को दिल्ली में डेरा डलवा दिया। वो मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं इसके लिए वो पार्टी भी तोड़ सकते है।

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में बनी कांग्रेस की सरकार में एक बार फिर अंदरूनी उथल पुथल देखने को मिल रही है। आलम यह है कि मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आमने-सामने हो गए है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास 90 में से 70 सीटें है। सरकार चलाने के लिए पार्टी के पास प्रचंड बहुमत है। पंजाब, एमपी और राजस्थान के बाद छत्तीसगढ़ भी अंदरूनी गुटबाजी से जुझ रही है। सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद यह गुटबाजी चरम पर आ गई है। सीएम भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव में ठनी है। खुलकर दोनों एक-दूसरे के खिलाफ नहीं बोलते लेकिन इनके समर्थकों में टकराव बनी रहती है। इस पूरे टकराव के पीछे की वजह ढाई-ढाई साल का फॉर्म्युला है। देखा जाए तो दोनों ही कांग्रेसी नेताओं के बीच आपसी टकराव होने की जानकारी कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुकी है। बावजूद उसके कांग्रेस शीर्षस्थ खेमा राहुल गांधी और सोनिया गांधी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे है। जबकि चुनाव जीतने के बाद आलाकमान ने इस बात पर सहमति जताई थी कि ढ़ाई साल का कार्यकाल भूपेश बघेल और ढ़ाई साल का कार्यकाल टीएस सिंहदेव का होगा। लेकिन कांग्रेसी नेता अब तक इस पर कोई निर्णय़ नहीं ले पाए है।

अगर भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल का आंकलन करें तो इस सरकार में पहली बार अराजकता, लूटपाट, चोरी, छेड़छाड़ सहित भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। यह सरकार इस सभी पर रोक लगाने में असफल साबित हुई है। लेकिन भूपेश बघेल अपने किये पर पर्दा डालते हुए कांग्रेस शीर्षस्थ बैठे नेताओं को राज्य के बेहतरी संचालन की सूचना देते है। इतना ही नहीं भूपेश बघेल के किये की जानकारी आलाकमान तक न पहुंचे इसके लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने स्वतंत्र पत्रकारों के लिखने की आजादी पर बैन लगा दिया है। कोई भी पत्रकार अगर उनके सरकार के भ्रष्टाचार और कामचोरी के खिलाफ लिखता है तो उसे तुरंत जेल में भेज दिया जाता है या फिर उसे धमकियां दी जाती है। कहा जा रहा है कि भूपेश बघेल ने अपने चहेते दो-तीन राष्ट्रीय चैनलों को प्राथमिकता देते हुए सरकार की ब्रांडिगं करने की जिम्मेदारी सौंप रखी है। बीते एक महीने में दोनों के बीच झगड़ा काफी बढ़ गया है। इसे सुलझाने के लिए दिल्ली में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पंचायत करनी पड़ी है। सीएम भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव को उन्होंने आमने-सामने बैठाकर बात की है। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से दोनों नेताओं की मुलाकात हुई है। लेकिन मामला अब भी शांत होता नहीं दिखाई दे रहा है।

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