--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
●योजना की वास्तविक स्थिति: सिर्फ 20 प्रतिशत बेटियों को मिला लाभ
●बालिका शिक्षा और सामाजिक परिस्थितियों का योजना पर प्रभाव
●80 प्रतिशत बेटियां बीच में ही छोड़ रहीं स्कूल
●बजट में 1800 करोड़ के प्रावधान का उद्देश्य समाधान या केवल औपचारिकता
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बेटियों के भविष्य को सुरक्षित और उज्ज्वल बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई लाड़ली लक्ष्मी योजना कभी राज्य की सबसे चर्चित और महत्वाकांक्षी योजनाओं में गिनी जाती थी। इस योजना की शुरुआत वर्ष 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में की गई थी। इसका मूल उद्देश्य समाज में बालिकाओं के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना, बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देना तथा बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों को रोकना था। लेकिन हाल ही में विधानसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों ने इस योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मध्य प्रदेश में लाड़ली लक्ष्मी योजना के तहत अब तक लगभग 52.56 लाख बालिकाओं का पंजीयन हो चुका है। आंकड़ों के अनुसार, योजना के अंतर्गत पंजीकृत बालिकाओं में से केवल लगभग 20 प्रतिशत लाड़ली लक्ष्मियों को ही योजना का पूरा लाभ मिल पाया है। लाड़ली लक्ष्मी योजना पर सरकार हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है, लेकिन इसके बावजूद मध्यप्रदेश में सिर्फ 20% बेटियाँ ही बारहवीं कक्षा तक पहुंच पा रही हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और बताती है कि योजना का असली लाभ बेटियों तक नहीं पहुँच रहा। सरकार पिछले 19 वर्षों से इस योजना को बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित करती रही है, लेकिन वास्तविक आंकड़े बिल्कुल उलटी तस्वीर दिखाते हैं। इन सबके बाद भी बेटियों की शिक्षा वहीं अटकी हुई है जहाँ सालों पहले थी। यह साफ इशारा है कि योजना का फोकस बेटियों को शिक्षित और सशक्त बनाना नहीं, बल्कि उनका उपयोग राजनीतिक लाभ और वोट बैंक तैयार करने के लिए किया गया है। अगर सरकार वास्तव में बेटियों की शिक्षा को लेकर संवेदनशील होती तो सबसे पहले स्कूलों की गुणवत्ता सुधारती, शिक्षकों की कमी दूर करती, सुरक्षा और सामाजिक वातावरण बेहतर बनाती और जागरूकता अभियान चलाती। लेकिन सरकार ने इन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज किया। जोश और प्रचार में बेटियों की तस्वीरें तो खूब इस्तेमाल की गईं, लेकिन उनकी शिक्षा के लिए जमीन पर कोई गंभीर कदम नहीं उठाए गए। सच्चाई यही है कि यदि वास्तव में विचार और नीयत शिक्षा सुधार की होती तो आज 20% नहीं, बल्कि अधिकांश बेटियाँ बारहवीं तक पहुँच रही होतीं।
यह स्थिति इस महत्वाकांक्षी योजना की प्रभावशीलता और प्रशासनिक कार्यप्रणाली दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। लाड़ली लक्ष्मी योजना मध्यप्रदेश की उन योजनाओं में से एक है, जिसने बेटियों के सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण उम्मीदें जगाई थीं। लेकिन यदि वास्तव में केवल 20 प्रतिशत लाभार्थियों को ही इसका पूरा लाभ मिल रहा है, तो यह स्थिति चिंताजनक है। यह केवल एक योजना की विफलता का मामला नहीं है, बल्कि इससे समाज में बेटियों के भविष्य से जुड़ी उम्मीदों पर भी असर पड़ता है। यदि प्रशासनिक सुधार, जागरूकता और शिक्षा के क्षेत्र में गंभीर प्रयास किए जाएं, तो लाड़ली लक्ष्मी योजना फिर से अपने मूल उद्देश्य की ओर लौट सकती है और वास्तव में लाखों बेटियों के भविष्य को सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
• 19 साल में 52.2 लाख लड़कियों का पंजीयन
साल 2010-11 में पहली कक्षा में शामिल 11.07 लाख बच्चियों में से केवल साल 2021-22 तक 3.44 लाख छात्राएं ही 12वीं कक्षा तक पहुंच सकी। ये करीब 30 फीसदी है। साल 2025 कि बात करें तो यह आंकड़ा गिरकर 19.97 प्रतिशत तक पहुंच गया। वर्ष 2007 से 2025 तक कुल 52.2 लाख बेटियों का पंजीयन हुआ। वर्ष 2012 में सर्वाधिक 3 लाख 54 हजार 271 पंजीयन हुए। 2021 में 3 लाख 44 हजार 649 और 2025 में 2,72,006 बेटियों का नामांकन हुआ। इसके बावजूद 2025-26 तक पात्र 26.13 लाख लाड़ली लक्ष्मियों में से केवल 13.68 लाख यानी 52.35 प्रतिशत ने ही छठी कक्षा में प्रवेश लिया। नौवीं में यह प्रतिशत घटकर 42.21 रह गया।
• बजट में 1800 करोड़ रुपये का प्रावधान
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि जब योजना का लाभ सीमित संख्या तक ही पहुंच रहा है, तो फिर राज्य सरकार ने वर्तमान बजट में 1800 करोड़ रुपये का प्रावधान क्यों किया है। संभव है कि सरकार योजना के दायरे को और अधिक बढ़ाने या इसके क्रियान्वयन को मजबूत करने के लिए यह बजट रख रही हो। लेकिन यदि मौजूदा व्यवस्था में ही खामियां बनी रहती हैं, तो केवल बजट बढ़ाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाएंगे।
• इस तरह मिलता है लाड़ली लक्ष्मी योजना का लाभ
2007-08 से 2010-11 के बीच पंजीकृत 7.46 लाख बेटियों पर लगभग 7400 करोड़ रुपये खर्च होंगे। वहीं 2011-12 में पंजीकृत 3.80 लाख बेटियों के लिए 3800 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इस योजना के तहत छठी कक्षा में 2 हजार रुपये, नौवीं में 04 हजार रुपये, 11वीं और 12वीं में 6-6 हजार रुपये, कॉलेज में 25 हजार रुपये और 21 वर्ष की आयु पूरी होने पर 01 लाख रुपये दिए जाते हैं।
• सामने आई वास्तविकता
हालांकि विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों ने इस योजना की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है। बताया गया कि पंजीकृत बालिकाओं में से बहुत कम संख्या को ही योजना का पूर्ण लाभ मिल पाया है। यदि वास्तव में केवल 20 प्रतिशत लाभार्थियों तक ही योजना का लाभ पहुंच रहा है तो यह योजना के क्रियान्वयन में गंभीर खामियों की ओर संकेत करता है।
• मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने चुनौती
वर्तमान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार काम कर रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब योजना का उद्देश्य इतना महत्वपूर्ण है, तो इसके क्रियान्वयन में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है। सरकार की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि बेटियों के सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन यदि लाड़ली लक्ष्मी जैसी प्रमुख योजना ही अपने लक्ष्य से पीछे रह जाए, तो यह सरकार की नीतियों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।