भास्कर समूह पर आयकर छापेमारी की कार्यवाही मोदी-शाह के डर को बयां करती है



--विजया पाठक (एडिटर, जगत विजन),
भोपाल-मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कलम की ताकत को आईबी, आईटी से डरा रही सरकार

■ धारदार पत्रकारिता के जरिए जनता के सामने सच सामने लाने पर घबराई सरकार ने की कार्यवाही

■ दैनिक भास्कर तो बहाना है- मकसद तो मीडिया को डराना है

दो दिन पहले दैनिक भास्कर ग्रुप पर की गई आयकर विभाग की छापामारी कार्यवाही पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी हुई। आजादी के बाद पहली बार किसी मीडिया समूह पर आयकर विभाग की इतनी बड़ी कार्यवाही हुई है। हिंदी भाषा के देश के नंबर वन अखबारों की सूची में दैनिक भास्कर समूह मालिक, उनसे जुड़े लोग, ग्रुप के प्रमोटर्स व भोपाल स्थित मुख्यालय सहित इंदौर, ग्वालियर, जयपुर, दिल्ली, मुंबई, छत्तीसगढ़, गुजरात, अहमदाबाद के ठिकानों पर आयकर की 200 से अधिक लोगों की टीम ने गुरूवार सुबह तड़के 4.30 बजे एक साथ दबिश दी। आयकर विभाग द्वारा की गई इस कार्यवाही को पत्रकारिता जगत से जुड़े लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से हिटलर शाही से जोड़कर देख रहे है।

विपक्ष से लेकर संसद तक हर तरफ एक ही चर्चा है कि किसान आंदोलन से लेकर गंगा में बहती लाशे और कोविड कुप्रबंधन तक केंद्र सरकार की लापरवाहियों को दैनिक भास्कर ने प्रमुखता से उजागर किया है, जिससे तिलमिलाए मोदी और अमित शाह ने बदले की भावना से आयकर विभाग की रेड करवाई है। देखा जाए तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर इस तरह की कार्यवाही से विश्वभर में भारत की छवि धूमिल हुई है। पहले ही केंद्र सरकार पर टेलीविजन चैनलों को खरीद लेने के आरोप लगते रहे है। ऐसे में अब प्रिंट मीडिया की आवाज भी सरकार दबाना चाहती है। हिंदी के सबसे बड़े और सबसे प्रामाणिक अखबार, भास्कर, पर छापों की खबर ने देश के करोड़ों पाठकों और हजारों पत्रकारों को हतप्रभ कर दिया है। जो नेता और पत्रकार भाजपा और मोदी के भक्त हैं, वे भी सन्न रह गए। ये छापे मारकर क्या सरकार ने खुद का भला किया है या अपनी छवि चमकाई है? नहीं, उल्टा ही हुआ है।

एक तो पेगासस से जासूसी के मामले में सरकार की बदनामी पहले से हो रही है और अब लोकतंत्र के चौथे खंभे खबरपालिका पर हमला करके सरकार ने नई मुसीबत मोल ले ली है। देश के सभी निष्पक्ष अखबार, पत्रकार और टीवी चैनल इस हमले से परेशान हैं। उसे अपने हिसाब से चलाना चाहती है जोकि बिल्कुल गलत है। वहीं, देश के कई राजनेताओं ने इस कार्यवाही को मोदी-शाह की तानाशाही बताया है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लिखा कि कागज पर स्याही से सच लिखना, एक कमजोर सरकार को डराने के लिए काफी है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट किया कि पीएम मोदी ने महामारी को गलत तरीके से हैंडल किया। भास्कर ने इसे बहादुरी से बताया।

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी कहा कि सच को देशभर में निर्भीकता से उजागर कर रहे दैनिक भास्कर मीडिया समूह को दबाने का काम शुरू हो गया है।

● कुछ इस तरह के सच उजागर किए है भास्कर ने

दूसरी लहर के दौरान 6 महीने तक भास्कर ने देश और कोरोना प्रभावित प्रमुख राज्यों में असल हालात को पूरे दमखम के साथ देश के सामने रखा है। गंगा में लाशें बहाए जाने का मामला हो या फिर कोरोना से होने वाली मौतों को छिपाने का खेल, भास्कर ने निष्पक्ष पत्रकारिता की और जनता के सामने सच ही रखा।

यूपी में गंगा किनारे के 27 जिलों से ग्राउंड रिपोर्ट:1140 किमी में 2 हजार से ज्यादा शव; कानपुर, उन्नाव, गाजीपुर और बलिया में हालात सबसे ज्यादा खराब सरकार के दावे में ऑक्सीजन कम:संसद में बयान- ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं; असलियत- 43 दिन में 629 मौतों की खबर तो मीडिया में ही आ चुकी थी

● डस्टबिन से वैक्सीन मिलने पर हड़कंप:राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री ने खबर को झूठा बताया; भास्कर के पास कचरे में पड़ी 500 वायल का फोटो इसका सबूत भास्कर का बड़ा खुलासा:राजस्थान में टीके की बर्बादी, 35 सेंटरों के कचरे में मिलीं 500 वायल, इनमें 2500 से भी ज्यादा डोज।

चित्रकूट मंथन की इनसाइड स्टोरी: संघ गुप्त बैठक कर रहा; सरकार के लिए धर्म, संस्कृति और सियासी मोर्चे पर मास्टर प्लान की तैयारी राम जन्मभूमि जमीन विवाद:राम जन्मभूमि ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय ने चित्रकूट पहुंचकर सफाई दी, संघ संतुष्ट नहीं; लेकिन हटाने पर फैसला होल्ड, पर शर्तें लागू सरकार के किये का जनता को आईना दिखाती इन खबरों के बाद मोदी सरकार इस तरह से तिलमिलाई कि आईटी, आईबी का सहारा लेकर भास्कर समूह को डराने की कोशिश पर उतर आई। लेकिन अखबार ने भी अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा-मैं स्वतंत्र हूं क्योंकि मैं भास्कर हूं'। 'भास्कर में चलेगी पाठकों की मर्जी'।

एक बात जो समझने वाली है वो ये कि जब सरकारे किसी भी मीडिया समूह को सपोर्ट करके उन्हें नियम विरुद्ध जाकर जमीन अलॉट करती है या फिर उन्हें वित्तीय मदद देती है तो उसके बाद ये सरकारे उसकी मोनिटरिंग क्यों नही करती। क्यों नहीं इस बात का ध्यान रखती कि आखिर ये समूह अखबार और चैनल की आड़ में क्या क्या कर रहे है। देखा जाये तो मीडिया समूह की इन गलतियों में सहभागी सरकार के वो नुमाइंदे भी है जो इनके साथ मिलकर इनके नियम विरुद्ध कामों में सलंग्न रहे। फिर बात चाहे किसी भी मीडिया समूह की हो या फिर उत्तर प्रदेश के भारत समाचार चैनल की। एक बात और गौर करने वाली है वो यह कि मोदी सरकार में सबसे ज्यादा परेशानी छोटे पत्र-पत्रिकाओं के संचालकर्ताओं की हुई है। सरकारों ने इन लोगों को मिलने वाले विज्ञापनों पर अनचाही रोक लगा दी है। कोरोनाकाल के बाद लोगों की समस्याएं और बढ़ गई है इसलिए सरकार को इस दिशा में अपना रवैया बदलने की आवश्यकता है।

मैं इस मीडिया समूह पर कार्रवाई की कड़ी निंदा करती हूँ।

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