छत्‍तीसगढ़ में आईपीएस जीपी सिंह बने भूपेश सरकार के शिकार



--विजया पाठक (एडिटर, जगत विजन)
रायपुर-छत्तीसगढ़, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ रडार पर राजनेताओं के प्यादे और कठपुतली ना बनने वाले नौकरशाह

■ भाजपा से लेकर कांग्रेस तक, नेताओं के चहेते रहे हैं जीपी सिंह

■ पूर्वमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कार्यवाही पर उठाए सवाल

छत्‍तीसगढ़ के सीनियर आईपीएस अफसर जीपी सिंह प्रदेश की भूपेश सरकार के गुस्‍से के शिकार हो गए हैं। सरकार ने जीपी सिंह के दर्जनों ठिकानों पर एसीबी एवं ईओडब्‍ल्‍यू से छापा डलवाकर अनगिनत मामले दर्ज करवा दिए हैं। यह प्रदेश में पहला अवसर है जब किसी अधिकारी पर देशद्रोह जैसे आरोप लगाकर धाराएं लगाई गईं हैं। इससे पहले भी प्रदेश में कई उच्‍च अधिकारियों के यहां छापेमारी हुई है। लेकिन देशद्रोह जैसी धाराएं किसी पर नही लगाई गई। निश्चित तौर पर यह भूपेश सरकार की सोची समझी साजिश के तहत की गई कार्यवाही लग रही है। बताया जा रहा है कि मुख्‍यमंत्री भूपेश बघेल के मनमुताबिक काम न करने के कारण सिंह पर यह कार्यवाही की गई है।

गौरतलब है कि 15 साल तक छत्तीसगढ़ पर शासन करने वाली भाजपा की रमन सिंह सरकार हो या फिर 2018 में बनने वाली कांग्रेस की बघेल सरकार। 1994 बैच के आईपीएस जीपी सिंह दोनों सरकारों में चहेते अफसर के रूप में जाने जाते रहे। सिंह को भाजपा सरकार ने राज्य के रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, नक्सलवाद प्रभावित बस्तर जैसे बड़े जिलों में एसपी, डीआईजी और आईजी जैसे महत्वपूर्ण पदों से नवाजा तो वर्तमान भूपेश बघेल सरकार ने सत्ता संभालने के बाद छत्तीसगढ़ में साल 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद जीपी सिंह को एसीबी और इओडब्ल्यू का प्रमुख बनाया गया था। तब ये माना जा रहा था कि वे सरकार के करीबी हैं, लेकिन इस बीच लगातार शिकायतों का हवाला एवं एक महिला अधिकारी से नहीं जमने के कारण उन्हें पद से हटा दिया गया था। सिंह के एसीबी प्रमुख रहते हुए पूर्व मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के खिलाफ एफआईआर तो हुई लेकिन इससे आगे सरकार कुछ नही कर पाई। इसके बाद राज्य सरकार ने सिंह को अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एसीबी से हटाकर उनका स्थानांतरण राज्य पुलिस अकादमी के निदेशक के रूप में कर दिया। राज्य के प्रशासनिक महकमे में माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उनके एक मंत्री और कुछ अधिकारियों द्वारा सिंह के खिलाफ शिकायत करने पर उन्हें एसीबी से हटाया था। एसीबी चीफ रहने के दौरान सिंह के खिलाफ मिली अवैध वसूली और करोड़ों की संपत्ति इकट्ठा करने की शिकायतों पर एसीबी ने जून में खुफिया जांच शुरू की। जांच में शिकायतों को सही पाए जाने पर एसीबी एवं राज्य के आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्‍ल्‍यू) ने एक जुलाई को तड़के जीपी सिंह के रायपुर स्थित सरकारी निवास सहित, राजनांदगांव, भिलाई और ओडिशा में उनसे जुड़े करीब 15 ठिकानों पर छापा मारा। करीब 68 घंटों तक लगातार खोजबीन के बाद एसीबी ने बताया कि उनके खिलाफ बेहिसाब बेनामी संपत्ति, अवैध लेनदेन सबंधित कागजात, कई बैंक एकाउंट, अवैध जेवरात, ओडिशा के खदानों में निवेश और मनी लांड्रिंग के सबूत मिले। एसीबी के अनुसार सिंह के ठिकानों से करीब 10 करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति के साथ-साथ सरकार के खिलाफ साजिशों से जुड़े दस्तावेज भी पाए गए। छापे में पाए गए दस्तावेजों के आधार पर सिंह के खिलाफ रायपुर पुलिस ने 3 जुलाई को उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की और सरकार ने 5 जुलाई को उन्हें निलंबित कर दिया। निलंबन के बाद सरकार ने 8 जुलाई को देर रात सिंह के विरुद्ध देशद्रोह का भी मुकदमा दायर कर दिया।

अपने ठिकानों पर एसीबी और ईओडब्लू की कार्यवाही से लेकर निलंबन तक चुप रहने के बाद जीपी सिंह ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सरकार पर दबाव में कार्यवाही कराने का गंभीर आरोप लगाये हैं। रिट याचिका में उन्होंने मांग की है कि उनके खिलाफ आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो और रायपुर थाना सिटी कोतवाली में जो अपराध दर्ज किए गया हैं। उसकी जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी जैसे सीबीआइ से कराई जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि उन्हें सरकार के कुछ अधिकारियों ने ट्रैप कराया है। इसके साथ ही सिंह के द्वारा निचली अदालत में अपनी अग्रिम जमानत याचिका भी लगाई है। सिंह ने अपनी याचिका में कहा है कि जिन कागजों और डायरी के आधार पर उनके खिलाफ अपराध दर्ज किया गया है वह सालों पुराने हैं और कचरों और नाली में फेंके हुए थे। याचिका में कहा गया है कि जिस डायरी और कागजों के आधार पर यह केस दर्ज किया गया है। वह सालों पुरानी है। कचरे, नाली में फेंकी हुई थी और उसे बंगले में छापा मारने वाले खुद ढूंढकर लाए थे। जब इन फटे-पुराने कागजों की जब्ती की जा रही थी, उस समय जीपी सिंह को नहीं बुलाया गया। जबकि, वो बंगले में मौजूद थे। एक डायरी जिसे पुलिस सबूत बता रही है, उसके पन्नें भीगे हुए थे और पुलिस ने उसे सूखाने के बाद उसमें जो अस्पष्ट शब्द लिखे हैं और उसके आधार पर मामला दर्ज कर लिया है। याचिका में एडीजी जीपी सिंह ने यह भी कहा है कि छापा मारने वाले ये कागजात खुद ढूंढकर लाए थे और जब्ती उनके सामने नही की गई है। जीपी सिंह की ओर से कहा गया है कि उन्हें डायरी लिखने की आदत रही है। याचिका में तर्क दिया गया है कि किसी व्यक्ति की डायरी लिखने की आदत हो और वह किसी मामले में कुछ लिखता है। इसका मतलब यह तो नहीं हो जाता कि वह उसमें शामिल हो। वह तो अपनी मन की बातें लिखता है। फिर उसके लिखे का पुलिस द्धेषवश कुछ और मतलब निकाल ले और अपराध दर्ज कर ले ये न्यायोचित नहीं है। डायरी में लिखी बातों को पुलिस प्रमाणित भी नहीं कर सकती। याचिका में बीते तीस जून को रायपुर की विशेष अदालत में दो अधिकारियों के विरुद्ध नान मामले में चार्ज फ्रेम किए जाने वाले अदालती कार्यवाही का भी ज़िक्र किया गया है।

यहां एक बार और स्‍पष्‍ट हो रही है कि जीपी सिंह इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की बात कर रहे हैं। यही भी हो सकता है कि कार्यवाई गलत मंशा से की गई हो जब तो सिंह सीबीआई की मांग कर रहे हैं। उन्‍हें लग रहा होगा कि सच्‍चाई वह नही है जो प्रदर्शित की जा रही है।

छत्‍तीसगढ़ के पूर्वमंत्री और प्रदेश बीजेपी के कददावार नेता बृजमोहन अग्रवाल ने सिंह पर हुई कार्यवाही पर सवाल उठाए हैं। उन्‍होंने कहा है कि इस तरह की कार्यवाही प्रदेश के हित में नही है। इससे नौकरशाही में गलत संदेश जाएगा।

अब सवाल उठता है कि आखिरकार प्रदेश के इतने बड़े अफसर पर इनती बड़ी कार्यवाही क्‍यों हुई। आखिर उच्‍च अधिकारी के साथ ऐसी कार्यवाही होती है तो कहीं न कहीं इससे प्रदेश की छवि भी धूमिल होती है। जीपी सिंह ईओडब्‍ल्‍यू के चीफ थे। उन्‍हें सीएम की पसंद से ही ईओडब्‍ल्‍यू का चीफ बनाया गया था। यह पद सीएम के पंसद का होता है। फिर ऐसा क्‍या हुआ कि सीएम ने सिंह को इस पद से हटा दिया। आशंका ऐसी भी जताई जा रही है कि सीएम भूपेश बघेल ईओडब्‍ल्‍यू के माध्‍यम से कई अधिकारियों पर कार्यवाईयां करवाना चाहते थे लेकिन जीपी सिंह ऐसा नहीं करना चाहते थे और उन्‍हें इस पद से हटा दिया। साथ ही कई मामलों को रफा-दफा करवाना चाहते थे पर सिंह ने ऐसा नहीं किया।

हम कुछ उदाहरण देखते हैं कि प्रदेश की सरकारें अपने प्रदेश के अफसरों को गलत ढंग से की गई कार्यवाहियों से कैसे बचाते हैं। जैसे- साल 1996 में उत्तरप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के एक सर्वेक्षण में अखंड प्रताप सिंह को कथित रूप से प्रदेश का सबसे भ्रष्ट अफ़सर बताया गया था। उनकी सारी संपत्ति की जाँच कराने की माँग की गई थी, जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने नामंज़ूर कर दिया था। केंद्र सरकार ने अखंड प्रताप सिंह के ख़िलाफ़ सीबीआइ जांच के लिए राज्य सरकार की अनुमति मांगी थी जिसे राजनाथ सिंह सरकार ने अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद आई मायावती सरकार ने न केवल सीबीआइ जांच की एक और मांग ठुकराई बल्कि सिंह के ख़िलाफ़ विजिलेंस के मामले भी वापस ले लिये। मायावती के बाद आए मुलायम सिंह यादव एक कदम आगे गए और उन्होंने अखंड प्रताप सिंह को राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया और बाद में केंद्र सरकार की सहमति से उन्हें सेवा विस्तार भी दिया। चार अलग-अलग पार्टियों के मुख्यमंत्रियों का अखंड प्रताप सिंह को लगातार बचाना अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन छत्‍तीसगढ़ में इससे अलग ही हो रहा है। यहां एक सीनियर अफसर को झूठे प्रकरणों में ऐसे फंसाया जा रहा है जैसे वह आतंकवादी हों। कुछ ऐसा ही मामला मध्‍य प्रदेश में भी सामने आया था। मध्य प्रदेश के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रमेश थेटे ने मीडिया को चिट्ठी लिखकर अपने साथ शासन में रहते हुए अन्याय की जानकारी दी थी। रमेश थेटे ने लिखा कि डायरेक्ट आईएएस होने के बाद भी उन्हें कलेक्टर नहीं बनने दिया गया। उन्होंने लिखा कि मैंने अंबेडकरवादी होने की कीमत चुकाई। मैंने दलित कर्मचारियों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई तो झूठे प्रकरण में फंसाकर जेल भिजवा दिया गया। साथ ही नौकरी से बर्खास्त करवा दिया गया। थेटे ने लिखा मुझ पर 25 झूठे केस ठोके गए। रमेश थेटे कोर्ट से दोषमुक्त हो गए।

अब यह भविष्‍य के गर्त में है कि जीपी सिंह को कोर्ट से न्‍याय कब मिलेगा?

ताजा समाचार

  India Inside News


National Report



Image Gallery
Budget Advertisementt
इ-पत्रिका - जगत विज़न


राष्ट्रीय विशेष
Budget Advertisementt