सिंधिया ने बनाया बीजेपी को कठपुतली?



--विजया पाठक (एडिटर: जगत विजन),
भोपाल-मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ जो कांग्रेस में करते वही अब बीजेपी में कर रहे सिंधिया

■ जनता के सवाल का जवाब दीजिए, जब यहां लाशों के ढेर थे तब कहां थे सिंधिया

■ मुख्यमंत्री की ऐसी भी क्या मजबूरी कि मनचाहे पोर्टफोलियो के बाद भी निगम मंडल में सिंधिया सर्मथकों को जगह दिलाना चाहते हैं

कोरोना संकट की दूसरी लहर के कम होते ही एक बार फिर मध्य प्रदेश के दौरे पर राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया पहुंचे हैं। जिस प्रदेश की सीट से राज्यसभा की कुर्सी पर बैठे और केंद्र में मंत्री पद का सपना देख रहे ज्योतिरादित्य को आखिरकार एक बार फिर अपने प्रदेश की याद आ ही गई। प्रदेश की जनता से सिंधिया जी को कितना प्रेम है इस बात का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि जिस वक्त प्रदेश में चारों ओर जनता की लाशों का ढेर लगा था, लोग ऑक्सीजन और अस्पतालों में बेड के लिए दर-बदर भटक रहे थे, उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया चुप्पी साधे बैठे रहे। उन्हें एक बार प्रदेश की जनता के स्वास्थ्य और उनकी जिंदगी का ख्याल नहीं आया और मूकदर्शक बने रहे।

दूसरी तरफ पूर्व कांग्रेसी और अब भाजपाई हो चुके ज्‍यातिरादित्‍य सिंधिया ने अब अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। जो रंग कभी उन्‍होंने प्रदेश की कमलनाथ सरकार में दिखाए थे ठीक वैसे ही रंग सिंधिया अब शिवराज सरकार में दिखाने लगे हैं। इसकी बानगी हम दो दिन पहले भोपाल दौरे पर आए सिंधिया की कार्यशैली से समझ सकते हैं। इस दौरे पर उन्‍होंने बीजेपी के कई वरिष्‍ठ नेताओं से मुलाकात की। इस मुलाकात में एक खास बात थी कि वह अपने साथ एक फाईल लेके चल रहे थे। बताया जाता है कि उस फाईल में सिंधिया गुट के उन लोगों के बायाडाटा थे जिन्‍हें वह सत्‍ता और संगठन में एडजेस्‍ट करवाना चाहते थे। हालांकि भोपाल आने से पहले जिस तरह से एक दिन पहले देर रात भाजपा कार्यसमिति सदस्यों की घोषणा की गई और उसमें उनके सर्वाधिक 63 समर्थकों को जगह दी गई, उससे साफ संदेश गया है कि अब सिंधिया ने बीजेपी को पूरी तरह से कठपुतली की तरह नचाने के लिए तैयार कर लिया है।

कहा तो यह भी जा रहा है कि अभी संगठन में रिक्त पदों में से कुछ पर और सिंधिया समर्थकों की ताजपोशी की जाएगी, जिसकी वजह से उनके समर्थकों की संख्या करीब 75 तक जा सकती है। इस तरह से सत्ता की तरह ही संगठन में भी उनकी पकड़ मजबूत होगी। जानकार सिर्फ यही कह रहे हैं कि सिंधिया अपने चहेतों को निगम मंडल सहित प्रदेश के लाभ वाले पदों पर बैठाने के लिए यहां पहुंचे हैं। लेकिन भाजपा खासतौर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए यह निर्णय लेना इतना आसन नहीं होगा। क्योंकि पहले से ही प्रदेश के कई वरिष्ठ विधायक और कार्यकर्ता पदों के इंतजार में बैठे हैं। ऐसे में यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि आखिर शिवराज सरकार सिंधिया खेमे के कौन-कौन से चेहरे को निगम मंडलों में स्थान दे पाती है।

सूत्रों की माने तो भाजपा पार्टी दो अलग-अलग खेमे में टूटती नजर आ रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जरूरत से ज्यादा सिंधिया सर्मथकों की ओर से झुकाव उन्हें अपनी पार्टी में लोगों की आंखों का कांटा बनाए दे रहा है। पहले भी मंत्रीमंडल में सिंधिया के मर्जी अनुसार उनके व्यक्तियों को मनचाहा पोर्टफोलियो देना और अब निगम मंडलों के सदस्यों की सूची। मंत्रियों की बात की जाए तो सिंधिया खेमे के मंत्रियों के काम का स्तर प्रदेश की जनता ने डेढ़ वर्ष में बहुत अच्छे से समझ लिया है। फिर चाहे वो स्वास्थ्य मंत्री प्रभुराम चौधरी, राजस्व और परिवहन गोविंद सिंह राजपूत हो या फिर पंचायत मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया। कोरोना के इस संकट काल में किसी भी मंत्री ने ऐसा कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया जिसे जनता उनके नाम से याद रखे। एक बात जो समझने वाली है वो यह कि आखिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ऐसी भी क्या मजबूरी है कि वो सब दरकिनार करते हुए सिंधिया की हर बात को मानने को तैयार हो जाते हैं। जबकि सिंधिया को प्रदेश और प्रदेश की जनता से कितना प्रेम है यह बात वो अच्छी तरह से समझ चुके हैं। लेकिन सत्ता में बने रहने के दबाव के आगे वो भी कुछ न करने की स्थिति में आ बैठे हैं।

■ व्‍यक्तिगत हित साधने में लगे हैं सिंधिया

सिंधिया खासतौर पर उन नेताओं की सत्ता में भागीदारी चाहते हैं, जो उपचुनाव में हार गए हैं। ऐसे नेताओं में इमरती देवी, गिर्राज दंडोतिया, मुन्ना लाल गोयल, जसवंत जाटव और रघुराज कंसाना के नाम शामिल हैं। इनके नामों को लेकर सत्ता व संगठन में सहमति नहीं बन पा रही है। इसकी वजह से मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा है। उधर संगठन व सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता भी अपने-अपने समर्थकों को निगम मंडल में देखना चाहते हैं। संगठन को डर है कि अगर श्रीमंत समर्थक आधा दर्जन नेताओं को निगम मंडलों की कमान दी गई तो उनका मूल कार्यकर्ता नाराज हो सकता है। इस डर के चलते मामला टालना उचित माना जा रहा है। लगातार यह मामला टलने की वजह से ही भाजपा कार्यकर्ताओं में अंसतोष बढ़ने का कारण भी बन रहा है। वैसे भी अपने समर्थकों को सर्वाधिक कार्यसमिति में सदस्यों के रुप में जगह मिलने के बाद भी सिंधिया खुश नही हैं, इसकी वजह है पदाधिकारियों में उनके समर्थकों को महत्व नहीं दिया जाना है। यही वजह है कि अब उनकी नाराजगी दूर करने के लिए पार्टी प्रवक्ता और मीडिया पैनलिस्ट में उनके कुछ समर्थकों को जगह देने का फैसला कर लिया गया है। माना जा रहा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा, संगठन महामंत्री सुहास भगत और सह संगठन महामंत्री हितानंद से भी चर्चा कर चुके हैं, लेकिन सूत्रों की माने तो संगठन नेताओं ने उनसे कहा कि इस मामले में थोड़ा इंतजार करना ठीक होगा। इसके अलावा इस मामले को लेकर केंद्रीय नेताओं से एक बार फिर राय लेने की बात कही गई। सीएम हाउस में भी उनके द्वारा इस मामले को लेकर जोर दिया गया, लेकिन इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं हो पाया। बताया जाता है कि राष्ट्रीय नेताओं से चर्चा कर निर्णय लेने की बात कहकर मामले को फिलहाल टालने का प्रयास किया गया। दरअसल उपचुनाव के दौरान वादे के मुताबिक सिंधिया समर्थकों को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया था। इस दौरान पार्टी के सिंधिया समर्थक नेताओं से चुनाव हारने वाले नेता भी टिकट की दावेदारी कर दलबदलुओं को प्रत्याशी बनाए जाने से नाराज होकर खुलकर विद्रोह की स्थिति में आ गए थे। उन्हें मनाने के लिए सत्ता व संगठन की ओर से निगम मंडलों में एडजस्ट करने का भी भरोसा दिया गया था। ऐसे में यह नेता भी अपनी दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे नेताओं में करीब दो दर्जन नेताओं की भारी संख्या है। अगर इन नेताओं की अनदेखी की गई तो उनकी नाराजगी पार्टी को भारी पड़ सकती है। यही वजह है कि सत्ता व संगठन इस मामले को टालना ही बेहतर समझ रहे हैं।

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