क्या छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या खत्म नहीं हो सकती ?



--विजया पाठक (एडिटर- जगत विजन),
रायपुर-छत्तीसगढ़, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ ज्यादातर मारने और मरने वाले आदिवासी

■ आदिवासियों की समस्या खत्म तो नक्सलवाद खत्म

■ नक्सलवाद की मूल जड़ में जाना होगा भूपेश बघेल सरकार को

■ काबिल अफसरों को मिले नक्सल समस्या से निपटने की जिम्मेदारी

■ जगदलपुर में क्यों नहीं है अत्याधुनिक अस्पताल?

हाल ही में 03 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा जिले की बार्डर पर बहुत बड़ी नक्सली वारदात हुई। इस नक्सली वारदात में करीब दो दर्जन सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और कई जवान घायल हुए। इस नक्सली हमले के बाद एक बार फिर नक्सलवाद को लेकर विचार मंथन प्रारंभ हुआ। केन्द्र और राज्य सरकार के मंत्रियों के बड़े-बड़े बयान आए। किसी ने नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने की बात कहीं तो किसी ने नक्सली हमले का मुंहतोड़ जबाव देने पर जोर दिया। निश्चित तौर पर इस तरह के हमले होने के बाद आने वाले बयान नये नही हैं। जब-जब भी ऐसी वारदातें हुई हैं, राजनेता ऐसी बयानवाजी करते हैं। लेकिन कोई भी राजनेता या सरकार नक्सलवाद की मूल जड़ पर नही जाना चाहता है। हम जानते हैं कि नक्सलवादी कोई तीसरी दुनिया के लोग नही हैं। ये भी हमारे ही बीच के, हमारी ही समाज के लोग हैं, जो अपने आपको प्रजातांत्रिक व्यवस्था से उपेक्षित समझते हैं। इस व्यवस्था के विरोध में हथियार उठाकर खून-खराबे पर उतर आए हैं। मैं ये नहीं कहती कि नक्सलवादी हिंसा का रास्ता अपनाकर अच्छा कार्य कर रहे हैं। नक्सलवादियों का यह रास्ता बिल्कुल गलत है। आज तक खून-खराबे और हिंसा से किसी भी समस्या का हल नही हुआ है। इस समस्या को स्थाई रूप से खत्म करने में सरकार और नक्सलवादी वर्ग को आपस में संवाद स्थापित करना होगा। यदि पहल सरकार की ओर से होगी तो निश्चित ही परिणाम सकारात्मक आएंगे। सरकार को नक्सलवाद की मूल जड़ में जाना होगा।

सबसे पहले आज हम छत्तीसगढ़ में पनपे नक्सलवाद के मूल को समझने की कोशिश करते हैं। छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य राज्य है। यहां आधी से अधिक जनसंख्या आदिवासियों की है। छत्तीसगढ़ का गठन ही इस प्रयोजन से किया गया था कि अलग प्रदेश बनने से यहां के आदिवासियों की जिंदगी सबर जाएगी और ये भी बेहतर जीवनयापन कर सकेंगे। लेकिन इसे बिडंवना ही कहेंगे कि राज्‍य बनने के 20 साल के बाद भी प्रदेश में आदिवासियों की सुध नहीं ली गई। यह आज भी सामाजिक रूप से, राजनीतिक रूप से, आर्थिक रूप से पिछड़े और उपेक्षित हैं। आदिवासियों के क्षेत्र भी पिछड़े हैं, विकास का नामो निशान नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्‍य, बिजली, पानी, आवागमन और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। यही कारण रहा कि आज तक इस वर्ग का न सामाजिक स्तर पर और न ही मानसिक स्‍तर पर विकास हो सका। धीरे-धीरे कर इन लोगों के मन में यह कुंठा घर कर गई। यह शासन, प्रशासन को अपना विरोधी मानने लगे। जिसका फायदा बाहर से आए नक्सली नेताओं ने उठाया। इन नक्सली नेताओं ने इन भोल-भाले आदिवासी लोगों का ब्रेनवॉस कर इन्हें भी हथियार उठाने पर मजबूर किया। अब इन आदिवासियों में बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने दबाव में हथियार उठाए हैं और कई ऐसे भी हैं जो वाकई में सिस्टम से दु:खी हैं। आज हालात ऐेसे बन गये हैं कि इन्हें दोहरी जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ रहा है। ये बाहरी नक्सलियों से भी परेशान है तो स्थानीय स्तर पर पुलिस प्रशासन से भी परेशान है। हम कह सकते हैं कि आदिवासी नक्सली नहीं हैं। आदिवासियों के बीच के ही लोगों से दूसरी आदिवासियों को मारने की साजिश की जा रही हैं। मतलब साफ है कि नक्स‍लवाद में मारने और मरने वाले दोनों ही आदिवासी हैं। इन क्षेत्रों की मूल समस्याओं को समझना होगा। आदिवासी वर्ग की उपेक्षित परिपाटी को दूर करना होगा।

आखिर में सवाल यही आकर रूकता है कि नक्सलवाद की मूल जड़ तक सरकार क्यों नही जाना चाहती हैं। ऐसा भी नही है कि छत्ती‍सगढ़ से नक्सलवाद खत्म नही होगा। प्रदेश से नक्सलवाद को खत्म करने में प्रमुख रोल राज्य सरकार का होगा। केन्द्र सरकार को भी इसमें हस्तक्षेप करना होगा। हम जानते हैं कि छत्तीसगढ़ का बहुत बड़ा भू-भाग आज भी नक्सल समस्या से ग्रस्त है। नक्सली क्षेत्र के आदिवासी आज भी अपने आप को उपेक्षित और मुख्यधारा से कटा मानते हैं। सबसे पहले तो सरकारों को इस वर्ग का भरोसा जीतना होगा कि वह भी विकास की मुख्यधारा के हिस्सा हैं। प्रदेश जितना अन्य वर्गों का, समुदायों का है उतना ही आदिवासियों का भी है। अन्य‍ क्षेत्रों की तरह इनके क्षेत्रों का भी विकास करना होगा। यह होगा केवल सिर्फ राज्य सकरार की इच्छाशक्ति से। यदि इच्छाशक्ति प्रबल होगी तो नक्सल समस्या का हल भी प्रबल होगा। सरकार को यह भी नहीं समझना चाहिए कि आदिवासी ही नक्सली हैं। ये जबर्दस्ती बनाए गए नक्सली हैं। सरकार की ओर से ऐसी परिस्थितयां निर्मित हुई कि उन्हें हथियार उठाना पड़ा। आज जरूरत इसी बात की है वह फिर से विकास की, समाज की मुख्य् धारा में वापस लौट आएं।

हमें यह भी नही भूलना चाहिए कि नक्सलवाद सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नही है। झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों में भी नक्सलवाद चरम पर था, लेकिन धीरे-धीरे कर इन राज्यों में नक्सलवाद खत्म होता जा रहा है। वहां नक्सलवादी वारदातें नही हो रही हैं। इसका प्रमुख कारण है कि यहां की सरकारों ने इच्छाशक्ति प्रबल की है। समस्या के हल की येाजनाएं बनाई हैं। पर हम देख रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में तो इस बात के प्रयास ही नहीं हो रहे। तात्कालिक प्रयास होते जरूर हैं लेकिन कारगर साबित नही हो रहे।

ऐसा भी नही है कि प्रदेश में नक्सलवाद से निपटने के लिए प्रशासनिक तंत्र मौजूद नही है या केन्द्र सरकार से मदद नही मिल रही है। प्रशासनिक रूप से, आर्थिक रूप से राज्य सकार को मजबूती प्रदान की जा रही है। भूपेश बघेल सरकार के पास आज भी ऐसे काबिल अफसर हैं जिन्हें नक्सलवाद से निपटने का अच्छा खासा तजुर्बा है। आईपीएस मुकेश गुप्ता, एसआरपी कल्लूरी और पूर्व डीजीपी रामनिवास यादव जैसे काबिल अफसर हैं, जो नक्सली समस्या को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। नक्सलवाद को इन अधिकारियों से बेहतर कोई नही समझ सकता। क्योंकि इन्होंने बहुत समय तक नक्सली क्षेत्रों में काम किया है। इन्हें नक्सलियों की समस्याओं और निदानों की जानकारी है, समझ है। अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मनभेदों और मतभेदों को भूल काबिल अफसरों को लेकर एक ऐसी टीम बनाए जो सिर्फ नक्सल समस्या पर कार्य करे। इस टीम में ऐसे अफसरों को रखा जाए जिन्होंने नक्सली क्षेत्रों में काम किया है या जिन्हें नक्सली समस्या को हल करने की योजना है। जिन्होंने अपने विभाग में दबंगई और साहस से कई फैसले लिए हैं। मुकेश गुप्ता और एसआरपी कल्लूरी ने अपने विभागों में साहसी फैसले लिए हैं। मुकेश गुप्ता जब ईओडब्यू के चीफ थे तब इन्होंने भूपेश बघेल के खिलाफ ईओडब्ल्यू में केस दायर किया था। अब सीएम बघेल को प्रदेश के हित के लिए आपसी रंजिश को भूलना चाहिए।

बता दूं कि मुकेश गुप्ता ने मेरे खिलाफ भी कई केस दायर किए हैं। लेकिन मैं मानती हूं कि मुकेश गुप्ता साहसी अधिकारी हैं। उनमें वह काबिलियत है जिससे काफी हद तक नक्सली समस्या का हल निकाला जा सकता है। बेहतर होगा कि प्रदेश सरकार काबिल अधिकारियों के मार्गदर्शन में नक्सली समस्या को खत्म करने के लिए आगे बड़े।

यह बात भी सच है कि यदि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ में नक्सली समस्या को हल करने में कामयाब हो जाते हैं तो प्रदेश में कांग्रेस अमर हो जायेगी। इससे बड़ी कांग्रेस की कोई उपलब्धि नही होगी। इसके लिए भूपेश बघेल को सत्ता पक्ष, विपक्ष और मीडिया को साथ में लेना होगा। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह, पूर्वमंत्री बृजमोहन अग्रवाल एवं युवा नेता अमित जोगी जैसे अनुभवी और तजुर्बेकार राजनेताओं का भी वर्तमान सरकार को सहयोग लेना चाहिए। आखिर इन्होंने कई वर्षों तक नक्सल समस्या पर कार्य किया है। इसके अलावा भूपेश बघेल मीडिया को साथ लेकर चलेंगे तो बेहतर होगा। क्योंकि मीडिया ही एक ऐसा तंत्र है जो सरकार और नक्सलियों के मध्य सेतु का कार्य करती है। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात है जिसका जिक्र करना जरूरी है। वर्तमान में सीएम बघेल के दो प्रमुख सलाहकार विनोद वर्मा और रूचिर गर्ग हैं। ये दोनों ही कम्युनिष्ट विचारधारा के हैं। इनके अनुभव और संपर्कों का भी उपयोग किया जा सकता है। नक्सलवाद की समस्या के निदान में इन दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। सीएम को भी इनकी सलाह और मशबरे पर ध्यान देना चाहिए।

खैर, जहां तक छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या के निदान की बात की जाए तो निश्चित तौर पर वर्तमान सरकार के पास नक्सलावाद को खत्म करने के लिए बहुत कुछ है। केन्द्र में ऐसी सरकार है जो नक्सलवाद जैसी समस्या को निपटाने में पूर्ण सहयोग करना चाहती है। अब भूपेश बघेल सरकार को तय करना है कि वह समस्या के हल की ओर कदम बढ़ाती है या इसे समस्या ही बनी रहना चाहती है।

● जगदलपुर में बने अत्याधुनिक अस्पताल

हम देखते हैं कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जब भी कोई वारदात होती है तो हमारे वीर जवान बड़ी संख्या में घायल होते हैं। इन घायल जवानों को एयरलिप्ट करके रायपुर की अस्पतालों में रिफर किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय बर्बाद हो जाता है और सही समय पर इलाज न मिलने के कारण हमारे जवान शहीद हो जाते हैं। इस समस्या के प्रति सरकार ध्यान क्यों नहीं देती। हम जानते हैं कि नक्सल क्षेत्र का सबसे नजदीक शहर जगदलपुर है। क्यों न जगदलपुर में एक अत्याधुनिक अस्पताल बनवाया जाए। जहां पर जवानों को तत्काल में इलाज के लिए लाया जा सके। यदि ऐसा होता है तो समय पर इलाज मिलने से काफी हद तक हमारे घायल जवानों की जानों को बचाया जा सकता है।

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