विजया पाठक (एडिटर- जगत विजन),
भोपाल-मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
■ लोकायुक्त की खात्मा अर्जी रद्द होने के बाद बढ़ सकती है डॉ. राजौरा की मुश्किलें
■ प्रदेश की अफसरशाही पर जांच कमेटी हावी, नए सिरे से होगी राजौरा के कारनामों की जांच
प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अफसर और अपर मुख्य सचिव गृह विभाग डॉ. राजेश राजौरा की मुश्किलें कम होती नहीं दिखाई दे रही है। बतौर स्वास्थ्य आयुक्त डॉ. राजौरा ने अपने पद का दुर्पयोग करते हुए 14 साल पहले बिना आवश्यकता के 37 लाख रुपए के इंजेक्शन की खरीदी की थी। यह इंजेक्शन महिलाओं के इलाज के नाम पर खरीदे गए थे। इस खरीदी में हुए घोटाले की जांच कर रही लोकायुक्त पुलिस द्वारा लगाए खात्म आवेदन को स्पेशल कोर्ट ने समाप्त करते हुए पांच बिंदुओं पर जांच करने के निर्देश दिए है।
उल्लेखनीय है कि इस पूरे मामले में राजेश राजौरा के अलावा स्वास्थ्य विभाग के 3 अन्य अफसरों के ऊपर घोटाला और भ्रष्टाचार करने के आरोप लगे हुए है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी आईएएस अफसर पर पद का दुरपयोग कर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगा हो, इससे पहले भी इस तरह के आरोप लगते रह है। लेकिन समझने वाली बात यह है कि मध्य प्रदेश में अफसरशाही इतनी ज्यादा हावी है कि किसी भी घोटाले की जांच करने में एक दो तीन या चार साल नहीं बल्कि 14 से अधिक साल लग गए है। कुल मिलाकर चूंकि इस पूरे मामले में मुख्य आरोपी आईएएस अफसर राजौरा शामिल है इसलिए शायद सरकार खुद जानबूझकर इस कार्य़वाही को धीमी गति से चला रही है।
इतना ही नहीं राजौरा के इस पूरे खेल में स्वास्थ्य विभाग के रिटायर हो चुके अफसर पर भी गाज गिर सकती है और उन्हें भी दोषी ठहराया जा सकता है। क्योंकि राजौरा के इशारे पर ही विभाग के अधिकारियों ने इस पूरे मामले को अंजाम दिया था। इसमें तत्कालीन स्वास्थ्य संचालक डॉ. योगीराज शर्मा का नाम भी शामिल है। स्पेशल कोर्ट ने प्रकरण में पाया कि अनुसंधानकर्ता अधिकारी ने कोई साक्ष्य नहीं जुटाए है। स्पेशल जज (पीसी एक्ट) राकेश कुमार शर्मा ने 6 मार्च को लोकायुक्त पुलिस की खात्मा रिपोर्ट को खारिज किया था। कोर्ट के निर्देश पर 7 साल के पहले खात्मा लग चुके मामले की वापस से जांच चलेगी।
उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य विभाग ने 8 दिसंबर 2006 को 37.46 लाख के स्टेप्टोमाइसिन इंजेक्शन (.75 मिलीग्राम) की खरीदी बिना जरूरत की थी। ये 20 अप्रैल 2007 को भी खरीदे गए। लोकायुक्त शिकायत में सामने आया था कि किसी जिले ने इंजेक्शन की मांग नहीं की थी। लोकायुक्त ने दवा खरीदी पर वर्ष 2007 में स्वत: संज्ञान लेकर जांच शुरू की थी। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त डॉ. राजेश राजौरा, तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी एमएम माथुर, संयुक्त संचालक डॉ. अशोक विरांग, संचालक डॉ. योगीराज शर्मा थे। इन अफसरों को मेसर्स कर्नाटक एंटी बायोटिक्स एंड फार्मासुटिकल्स (बैंगलोर) से बिना मांग के दवा खरीदने पर भ्रष्टाचार की जांच के दायरे में लिया गया था।