कृषि बिल में संशोधन ही एक मात्र उपाय नहीं तो आंदोलन सड़क से संसद तक पहुंचेगा



--विजया पाठक (एडिटर - जगत विजन),
भोपाल-मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

किसान प्रधान कहा जाने वाले भारत देश में आज किसानों की स्थिति कितनी बेहतर है, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि देश का किसान पिछले 37 दिनों से दिल्ली बॉर्डर की सड़कों पर संघर्ष कर रहा है। किसानों के बुलंद हौंसलों को ना तो सर्द मौसम और ना ही सरकार डगमगा पाई है। लेकिन मोदी सरकार का बेरहम दिल इस बात पर भी नहीं पसीज रहा कि पिछले दिनों किसान आंदोलन में शामिल कई किसानों की मौत हो गई और कुछ ने इस आंदोलन से तंग आकर अपनी जान दे दी। किसान अपना घर परिवार छोड़ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। अगर यह आंदोलन आने वाले कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब किसान संसद की ओर बैलगाड़ी और हल, ट्रैक्टर के साथ कूच करेंगे। जिसके संकेत भी किसान प्रतिनिधि दे चुके है।

देखा जाए तो एक दिन पहले ही आंदोलन में शामिल किसानों ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली आयोजित करने की धमकी दी है। इसके अलावा किसानों ने कहा है कि 23 जनवरी को, यानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर सभी राज्यपालों के आवास पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। किसानों ने स्पष्ट चेतावानी दी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी और नए कृषि कानूनों को रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। सरकार द्वारा तैयार किए गए कृषि बिल से सीधा अंदेशा लगाया जा सकता है कि यह बिल कुछ विशेष लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है, जिसका असर सीधे किसानों की आजीविका पर पड़ने का डर है। किसानों के आंदोलन को विराम देने के लिए अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसानों की मांग अनुसार कृषि बिल में संशोधन कर लेना चाहिए। यदि वो ऐसा करते है तो कहीं न कहीं देश के किसानों के दिल में मोदी जी की सकारात्मक सोच का प्रभाव होगा और मोदी के सबका साथ सबका विकास फॉर्मूला सही साबित होगा। हालांकि देखा जाए तो किसान प्रतिनिधियों और केंद्र सरकार के कई मंत्रियों के बीच कई दौर की बैठके तो हुईं लेकिन इन बैठकों में आंदोलन समाप्त करने जैसा कोई निष्कर्ष नहीं निकला जो एक बड़ा चिंता का विषय है।

किसान आज भी अपनी मांगों पर अडिग है और सरकार से इस बिल में संशोधन करने का आग्रह पहले दिन से कर रहे है। किसानों की मांगों का सर्मथन अब न सिर्फ राजनेता कर रहे है बल्कि अब इसमें कई समाजसेवी, पत्रकार सहित समाज के अन्य वर्ग से जुड़े लोग भी शामिल हो रहे है और सभी अपने अपने ढंग से सराकर तक कृषि बिल संशोधन करने की मांग कर रहे है। इन सभी का आग्रह है कि मिनिमम सपोर्ट प्राइज मंडियों में फिक्स होना चाहिए, इसके साथ सभी खाद्य एमएसपी डिस्प्ले करना चाहिए।

सरकार 23 फसलों की खरीद एमएसपी के हिसाब से करती है जबकि सरकार को अन्य फसलों के साथ फल एवं सब्जी को भी एमएसपी के दायरे में लाना चाहिए। कुल मिलाकर अब इस आंदोलन को समाप्त करने का एक मात्र उपाय सिर्फ बिल में संशोधन है, नहीं तो यह संघर्ष निरंतर जारी रहेगा।

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