क्या बिहार में बदल जायेगा सत्ता का समीकरण ?



--एकलव्य कुमार,
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

बीते बिहार विधान सभा चुनाव में भले ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) हार गई हो पर सत्ता में आने की उसकी छटपटाहट कम नहीं हुई है। राजद नेता आये दिन मौजूदा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की सरकार के एक साल के भीतर गिर जाने की बात करते रहते हैं। अब राजनीतिक में कब दुश्मन दोस्त बन जाये या वफादारी की कसमें खानेवाला पलटी मार जाए कहा नहीं जा सकता। सत्ता चीज ही ऐसी है जिसका नशा शराब से भी कई गुना अधिक होती है। पिछले दिनों अरुणाचल में जो हुआ उसे लेकर जदयू खेमे की भाजपा के प्रति नाराजगी भी किसी से छिपी नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस घटना को लेकर गठबंधन धर्म की दुहाई देते नजर आए।

दूसरी ओर राजद के युवराज तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद पाने को बेताब हैं। जिस तरीके से उन्होंने बिहार चुनाव में जी-जान से मेहनत की उसका फल उन्हें मिलते-मिलते रह जो गया था। एक्जिट पोल से लेकर शुरुआती मतगणना को देखकर हर किसी को यही लग रहा था इस बार तेजस्वी सरकार लेकिन तेजस्वी का तेज वोटों की गिनती के साथ फीका पड़ता गया। वहीं भाजपा को बड़ी जीत मिली। बिहार विधानसभा चुनाव में लोकतांत्रिक जनता पार्टी के युवराज चिराग पासवान ने जहाँ जदयू का गेम बिगाड़ा वहीं राजद को भी नुकसान पहुंचाया।

अब खबर है कि राजद सत्ता पर काबिज होने की कोशिशों में जुटा है। सूत्रों की मानें तो बिहार विधानसभा के पूर्व स्पीकर और राजद नेता उदय नारायण चौधरी का कहना है कि अगर राजद नेता तेजस्वी यादव को नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद दे देते हैं तो विपक्षी पार्टियां वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन दे सकती हैं।

बता दें कि उदय नारायण चौधरी के इस ऑफर ने सर्दी के मौसम में बिहार की राजनीति में फिर से गर्माहट पैदा कर दी है। कयासों का बाजार इस लिए भी गर्म है क्योंकि अरुणाचल में जदयू विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद सुशासन बाबू पार्टी अध्यक्ष पद की अपने निकटतम सहयोगी आरसीपी सिंह को सौंप दी है। अब बिहार में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता यह तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा। फिलहाल, राजनीति का रहस्य और रोमांच से भरा शो जारी है।

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