एक अनोखा गांव जहां सभी हैं शाकाहारी



--अभिजीत पाण्डेय (ब्यूरो),
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

एक तरफ जहां दुनिया धीरे-धीरे मांसाहार को त्याग कर शाकाहार की ओर बढ़ रही है तो वहीं, दूसरी ओर शाकाहार की संख्या में जोरदार इजाफा हो रहा है। इसमें देश-दुनिया के बड़े-बड़े हस्ती भी धीरे-धीरे शामिल होते जा रहे है। मगर नवादा में एक ऐसा गांव है जो कई दशकों से शाकाहार को अपनाए हुए है और आज भी इस गांव में मांसाहार खाना नहीं बनता है।

नवादा-नालंदा के बॉर्डर पर विश्व प्रसिद्ध राजगीर पहाड़ी की तलहटी में बसा यह गांव है डोहड़ा पंचायत का मोतनाज़े गांव जो देखने में सभी गांव के समान दिखता है। मगर इस गांव में कुछ ऐसी बात है जो अन्य सभी गांव से इसे अलग करती है। यह गांव सात्विक लोगों का गांव है। यहां के वाशिंदे पूरी तरह से शाकाहारी हैं और गांव के किसी भी घर मे मांसाहार नहीं बनता है।

70 से 80 घर का यह गांव जिसके उत्तर में राजगीर की पहाड़ी और दक्षिण पूर्व में पंचाने नदी गुजरती है। यहां के पूर्वज जिले के रुस्तमपुर से आये थे। अंग्रेजों ने इन्हें सजा के रूप में पहाड़ के किनारे भेज दिया था। इस गांव के लोग स्व. मांगो दास और स्व. भीम दास के वंशज हैं।

गांव के लोगों ने बताया कि दोनों बड़े पहलवान थे। अंग्रेजों से भी उन्होंने लोहा लिया था। उन्हें टक्कर देने वाला कोई नहीं था। समाज में आंदोलन चलाकर गरीबों को विकसित एवं स्वस्थ्य रखने के लिए मुहिम चलाई थी। समाज से बुराई को हटाने के लिए उन्होंने मांस, मछली, शराब को लोगों को त्यागने की अपील की और शाकाहारी अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित किया। क्योंकि उनका मानना था कि अगर यह सब लोगों से दूर रहेगा तो एक बेहतर समाज का निर्माण हो पाएगा। यही कारण है कि लोग उस दिन से आजतक उनकी इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।

गांव में आज कई दशक बीत जाने के बाद भी लोग उनकी परम्परा को निभा रहे हैं। इस गांव को सात्विक लोगों का गांव इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस गांव के सभी घर के लोग सुखी सम्पन्न हैं। सभी घर से कोई न कोई ब्यक्ति सरकारी नौकरी में हैं। गांव में हर सुख सुविधा मौजूद है। पहले इस गांव के लोगों को अंग्रेजों ने पहाड़ किनारे जंगल में बसने की सजा दी थी। मगर इस गांव के लोग बहुत ही मेहनती थे और अपनी मेहनत के बल पर जंगल को काटकर अपनी एक अलग दुनिया बसा ली।

जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे इस गांव के लोग समय के साथ चलने लगे। जो लोग नौकरी के लिए बाहर रहने लगे उनमें से कुछ लोगों ने अपनी इच्छा से अन्य जगहों पर मांसाहार को अपनाया। मगर गांव में रहने वाले लोग पूरी तरह शाकाहारी हैं। इनके चूल्हे से मांस-मछली काफी दूर है। अगर गांव आए लोगों को मांसाहार खाना भी हो तो गांव से दूर पहाड़ की तलहटी में जाकर बनाकर खाते हैं। गांव के कुछ लोगों ने बताया कि अगल-बगल के कुछ अन्य गांव के लोगों को भी शाकाहार अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

कई लोग अपने पूर्वज के कर्मो का फल ही मानते हैं कि उन्हें आशीर्वाद देने के लिए मां गंगा खुद आशीर्वाद देने के लिए उनके गांव तक आ रही है। अब यहां इस गांव में पाइप लाइन के माध्यम से गंगाजल लाने की योजना पर काम चल रहा है। गांंव से महज आधे किलोमीटर की दूरी पर गंगाजल उद्भव योजना के तहत वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जा रहा है।

एक तरफ जहां बीतते समय के साथ लोगों के रहन-सहन, खान-पान में बदलाव आ जाता है तो वहीं दृढ़ इच्छाशक्ति एवं अपनी परंपरा को बरकरार रखने की मिसाल यह गांव बखूबी पेश कर रहा है। जिसमें गांव के बुजुर्ग, युवा एवं महिलाओं का भरपूर साथ मिल रहा है। अपने बुजुर्गों के बताए मार्ग पर चलकर गांव के युवा पीढ़ी के लोग भी आज सात्विक जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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