केवल डेढ़ से दो क्विंटल प्रति एकड़ मूंग खरीद रही मध्यप्रदेश सरकार



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

■कम रेट पर मूंग बेचने पर मजबूर मध्य प्रदेश के किसान

■पहले गेंहू बेचने में लाईन में लगे अब मूंग की बारी

मध्‍यप्रदेश के किसानों की मुसीबतें कम होती दिखाई नहीं दे रही हैं। पहले गेंहू को बेचने में किसानों ने परेशानी झेली अब मूंग को लेकर भी वहीं स्थिति बन रही है। मूंग बेचने पर तो दोहरी मार पड़ने वाली है। कहीं कहीं पर जो रजिस्‍ट्रेशन हो रहे हैं वह केवल प्रति एकड़ डेढ़ से दो क्विंटल मूंग बेचने पर ही हो रहे हैं। जबकि प्रति एकड़ मूंग 7-8 प्रति क्विंटल पैदा हुई है। ऐसी स्थिति में बाकी की मूंग को किसान कहां बेचेगा। स्‍वाभाविक है मजबूरन बाजार में व्‍यापारियों को मूंग बेचने पर मजबूर होगा। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश, जिसे भारत का “दलहन राज्य” भी कहा जाता है, देश में मूंग (हरी मूंग) उत्पादन के प्रमुख केंद्रों में से एक है। यहाँ के नर्मदापुरम, खरगोन, खंडवा, बड़वानी, रायसेन, सीहोर और देवास जैसे जिलों में हर साल हजारों किसान ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती करते हैं। यह फसल कम पानी में, कम समय में और अपेक्षाकृत बेहतर मुनाफे के लिए जानी जाती है। लेकिन हाल के वर्षों में यही फसल किसानों के लिए परेशानी और घाटे का कारण बनती जा रही है। इस साल भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। खेतों में लहलहाती मूंग की फसल के बावजूद किसानों को मजबूरी में कम दामों पर अपनी उपज बेचनी पड़ रही है। इसके पीछे कई आर्थिक, प्रशासनिक और नीतिगत कारण हैं, जिन्होंने किसानों की कमर तोड़ दी है। मध्य प्रदेश के किसान आज एक ऐसे चक्र में फंसे हुए हैं, जहां उत्पादन तो अच्छा है लेकिन लाभ नहीं मिल रहा। मूंग जैसी नकदी फसल, जो कभी किसानों के लिए उम्मीद थी, अब अनिश्चितता और बाजार के दबाव का प्रतीक बनती जा रही है। जब तक एमएसपी पर भरोसेमंद और समय पर खरीद सुनिश्चित नहीं होती, तब तक किसानों को कम दामों पर फसल बेचने की मजबूरी बनी रहेगी। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि कृषि नीति और बाजार संरचना से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।

● एमएसपी और बाजार भाव के बीच बढ़ती खाई

सरकार हर साल मूंग के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करती है, ताकि किसानों को उनकी लागत से कम दाम न मिलें। 2026 के आसपास मूंग का एमएसपी लगभग 8800 प्रति क्विंटल है। लेकिन हकीकत यह है कि मंडियों में किसानों को कई बार 6000 से 7000 प्रति क्विंटल के बीच ही दाम मिल रहे हैं। जब सरकारी खरीद समय पर शुरू नहीं होती, तो किसान मजबूरी में निजी व्यापारियों को अपनी उपज बेच देते हैं। व्यापारी इसी स्थिति का फायदा उठाकर कम कीमत पर खरीदारी करते हैं।

● खरीदी प्रक्रिया में देरी और अनिश्चितता

किसानों की सबसे बड़ी समस्या सरकारी खरीदी में देरी और अनिश्चितता है। कई बार मूंग की फसल तैयार हो जाती है, लेकिन खरीदी केंद्र शुरू नहीं होते। इससे किसानों को भंडारण की समस्या होती है और वे लंबे समय तक फसल रोककर नहीं रख सकते। कई जिलों में किसान इस वजह से मूंग की खेती छोड़ने तक पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह भरोसा नहीं रहता कि सरकार समय पर एमएसपी पर खरीद करेगी या नहीं।

● निजी मंडियों का दबाव

जब सरकारी खरीद सीमित या देर से होती है, तो पूरा दबाव निजी मंडियों पर आ जाता है। वहां भाव पूरी तरह मांग और आपूर्ति पर निर्भर होते हैं। जैसे ही नई फसल बाजार में आती है, कीमतें तेजी से गिर जाती हैं। कई जिलों में देखा गया है कि शुरुआती दिनों में भाव ठीक रहते हैं, लेकिन जैसे-जैसे आवक बढ़ती है, रेट गिरकर लागत के करीब या उससे नीचे पहुंच जाते हैं। इससे किसानों की मेहनत का लाभ बिचौलियों और व्यापारियों को मिल जाता है।

● लागत बढ़ने और मुनाफा घटने की समस्या

किसान केवल फसल उगाने में ही नहीं, बल्कि बीज, खाद, सिंचाई, श्रम और परिवहन में भी भारी खर्च करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन सभी इनपुट लागतों में लगातार वृद्धि हुई है। लेकिन मूंग का बाजार भाव उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। इस असंतुलन के कारण किसान “लागत निकालना” भी मुश्किल समझ रहे हैं। कई किसानों का कहना है कि अगर फसल एमएसपी पर भी नहीं बिकती, तो वे घाटे में चले जाते हैं। किसानों की एक बड़ी चिंता नीति की अनिश्चितता भी है। कभी खरीद की घोषणा होती है, कभी प्रक्रिया देर से शुरू होती है, तो कभी सीमित कोटा तय कर दिया जाता है। इससे किसान यह तय नहीं कर पाते कि कौन सी फसल लाभकारी रहेगी। मप्र सरकार ने कुछ वर्षों में राज्य ने मूंग की खरीद प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता नहीं दी, जिससे किसानों का भरोसा कमजोर हुआ है और उन्होंने फसल पैटर्न बदलना शुरू कर दिया है। किसानों को उत्पादन जोखिम के साथ-साथ बाजार जोखिम भी झेलना पड़ता है, जिससे यह फसल पहले जैसी “कम जोखिम वाली” नहीं रह गई है।

● छोटे और मध्यम किसानों की सबसे ज्यादा मार

मध्य प्रदेश के ज्यादातर मूंग उत्पादक छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास भंडारण की सुविधा नहीं होती। ऐसे किसान फसल को लंबे समय तक रोककर नहीं रख सकते, इसलिए उन्हें तुरंत मंडी में बेचना पड़ता है। यही वजह है कि बड़े व्यापारी और आढ़ती इस स्थिति का फायदा उठाते हैं और कम दामों पर खरीद कर मुनाफा कमाते हैं।

● पंजीयन और प्रक्रिया की जटिलता

सरकार ने एमएसपी पर खरीद के लिए ई-उपार्जन पोर्टल पर पंजीयन प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन इसकी समयसीमा और प्रक्रिया को लेकर भी किसानों में भागदौड़ और भ्रम की स्थिति रहती है। अभी भी कई जगहों पर ई-उपार्जन पोर्टल पर पंजीयन नहीं हो रहा है। मध्यप्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर जो “हाहाकार” जैसी स्थिति दिख रही है, उसकी असल वजहें कुछ साफ तौर पर सामने आ रही हैं।

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