--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
■विकास की राह पर विनाश की ओर भारत
■विकास के नाम पर चढ़ाई जा रही पेड़ों की बलि
भारत में लगातार वनों की संख्या घट रही है, जो एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती के रूप में उभर कर सामने आ रही है। विकास के नाम पर हर साल करोड़ों पेड़ों की बलि चढ़ाई जा रही है। आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक वर्ष 18 करोड़ से अधिक पेड़ों को इसलिए काटा जा रहा है क्योंकि यह विकास में बाधक माने जाते हैं। लेकिन सही मायने में यह पेड़ों की कटाई नहीं बल्कि मानव जाति की सांसों की हत्या है। वन मानव जीवन और पृथ्वी के अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। भारत में वनों की लगातार घटती संख्या पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को जलवायु परिवर्तन, जल संकट, जैव विविधता के विनाश और प्राकृतिक आपदाओं जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इसलिए वन संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना आवश्यक है। सतत विकास तभी संभव है जब विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। वृक्षारोपण, जन-जागरूकता और कठोर संरक्षण नीतियों के माध्यम से हम अपने वनों को सुरक्षित रख सकते हैं तथा एक हरित और समृद्ध भारत का निर्माण कर सकते हैं। भारत का कुल वन क्षेत्र लगभग 7,13,789 वर्ग किलोमीटर है। यह भारत के कुल भू-भाग का लगभग 21–22% हिस्सा है। सघन वन लगभग 40%, खुले वन लगभग 60% है। भारत जैसे विकासशील देश में वनों का महत्व और भी अधिक है, क्योंकि यहाँ बड़ी आबादी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वन संसाधनों पर निर्भर है। इसके बावजूद देश में लगातार वन क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे वन संपदा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। पिछले 30 वर्षों में प्राकृतिक वनों की सघनता घट रही है, जबकि नए वृक्षारोपण मुख्यतः सड़क किनारे, बंजर भूमि और खुले वनों में हो रहे हैं। अवैध कटाई, औद्योगिकीकरण और कृषि विस्तार के कारण वनों का वास्तविक जैव विविधता वाला क्षेत्र लगातार कम हो रहा है।
● भारत में वनों की स्थिति चिंताजनक
भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। देश में उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से लेकर शुष्क पर्णपाती वनों तक विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते हैं। हालांकि सरकारी प्रयासों के कारण कुछ क्षेत्रों में वृक्षावरण बढ़ा है, फिर भी प्राकृतिक वनों का क्षरण और उनकी गुणवत्ता में गिरावट एक बड़ी चिंता का विषय है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण वन क्षेत्रों पर निरंतर दबाव बढ़ता जा रहा है।
● उदयोगपतियों ने छलनी किये जंगल
देश के तमाम बड़े-बड़े उदयोगपतियों को देश के जंगलों को छलनी करने का बीड़ा उठाया है। उदयोगपति द्वारा कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट तथा अन्य खनिजों के उत्खनन के लिए वन क्षेत्रों में खनन कार्य किया जा रहा है। अरावली पर्वत, हसदेव के जंगल, सिंगरौली के जंगल जैसे ऐसे कई वन क्षेत्र हैं जहां लाखों हरे-भरे पेड़ों को नष्ट किया जा रहा है। हजारों एकड़ के जंगल के जंगल मलवे में तब्दील हो गये। खनन न केवल पेड़ों को नष्ट करता है बल्कि भूमि, जल और जैव विविधता को भी गंभीर क्षति पहुँचाता है। खासकर आदिवासी संस्कृति, सभ्यता और आजीविका तक को बर्बाद कर रहे हैं।
● औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, सड़क-रेल नेटवर्क बना विनाश का कारण
देश में औद्योगिक विकास और नगरीकरण की गति तेज हुई है। नए उद्योगों, कारखानों, आवासीय कॉलोनियों और व्यावसायिक परिसरों के निर्माण के लिए वन भूमि का उपयोग किया जाता है। विशेषकर सड़क-रेल नेटवर्क के निर्माण के कारण प्रत्येक वर्ष भारत में करोड़ों पेड़ों का काटा जा रहा है। विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़ी मात्रा में पेड़ों की कटाई की जाती है। कहने को तो बड़े ही सुंदर तरीके से प्रचारित किया जाता है कि देश बदल रहा है, देश विकास कर रहा है लेकिन इसके पीछे के कहानी किसी को नहीं बताई जाती है।
● जनसंख्या वृद्धि और भूमि की बढ़ती मांग
भारत की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है। बढ़ती आबादी को आवास, सड़क, विद्यालय, अस्पताल और अन्य बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर भूमि की आवश्यकता होती है। इसके परिणामस्वरूप वन क्षेत्रों को काटकर मानव बस्तियों में परिवर्तित किया जा रहा है। लकड़ी की बढ़ती मांग के कारण कई क्षेत्रों में अवैध रूप से पेड़ों की कटाई की जाती है।
● वनों की कमी के दुष्परिणाम
जैव विविधता का ह्रास: वनों के नष्ट होने से अनेक पशु-पक्षियों और वनस्पतियों के प्राकृतिक आवास समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप कई प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच जाती हैं। जैव विविधता का नुकसान पारिस्थितिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा है।
•जल संकट: वन जल चक्र को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे वर्षा के जल को भूमि में समाहित करने में सहायता करते हैं। वनों के नष्ट होने से भूजल स्तर गिरता है और जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे जल संकट उत्पन्न होता है।
•प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि: वनों की कमी के कारण बाढ़, भूस्खलन, सूखा तथा चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता बढ़ सकती है। पर्वतीय क्षेत्रों में वनों की कटाई विशेष रूप से भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ावा देती है।
•आदिवासी समुदायों पर प्रभाव: भारत के अनेक आदिवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं। वन क्षेत्र घटने से उनकी आजीविका, संस्कृति और जीवनशैली प्रभावित होती है। इससे सामाजिक और आर्थिक समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।
● सरकार के होने चाहिए दायित्व
विकास के नाम पर सरकार पेड़ों का जो विनाश कर रही है उसके भी अपने दायित्व होने चाहिए। योजनाएं बनाई जानी चाहिए जो प्रकृति को नुकसान न पहुंचाएं। हमारा मानना है कि विकास जरूरी है लेकिन विकास, विनाश करके नहीं किया जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण की जो सरकार और गैर सरकारी संस्थाएं हैं उनका काम केवल निगरानी करना भर नहीं है बल्कि नुकसानदायक योजनाओं को रोकना भी है। क्योंकि प्रकृति ही वह अनमोल धरोहर है जिसके कारण मानव जाति का अस्तित्व है। इसका संरक्षण करना समाज और सरकार दोनों का कर्तव्य है।