--प्रदीप फुटेला
ग्रेटर नोएडा-उत्तर प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
प्रशान्त अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक, विचारक, लेखक एवं पूर्व सिविल सेवा अधिकारी आचार्य प्रशान्त ने कहा है कि संस्था द्वारा युवा पीढ़ी को वीगन बनने के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है। उनकी संस्था के प्रयासों से करीब 50 लाख लोग मांसाहार को त्याग चुके हैं। उनका कहना है कि जानवर भी हमारे समाज का एक अहम हिस्सा हैं। ये हमारे पर्यावरण को भी संतुलित बनाए रखने में सहायक होते हैं। जानवर मन से सच्चे होते हैं। उनमें भी भावनाएं होती हैं। जानवरों को प्रेम और स्नेह चाहिए, क्योंकि ये बहुत ही कोमल व संवेदनशील होते हैं। इंसान लालच में इतना अंधा हो गया है कि उसे अपने फायदे के आगे कुछ भी नहीं दिखता। बेजुबान जानवर और इंसान के बीच का रिश्ता बेहद खास होता है।
आचार्य प्रशान्त नॉलेज पार्क स्थित केसीसी कॉलेज में तीन दिवसीय वेदान्त महोत्सव के समापन अवसर पर आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कई मौके ऐसे आए, जब इंसान के प्यार ने बेजुबान पशुओं की जान बचाकर मानवता का धर्म निभाया। पर्यावरण को संतुलित रखने में पेड़-पौधों के साथ ही पशु-पक्षियों की भूमिका भी अहम है। मनुष्य के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण इनकी संख्या कम होती जा रही है। यदि हम जल्द नहीं चेते तो स्थिति भयावह हो सकती है। कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से जहां पक्षियों की संख्या कम होती जा रही है, वहीं कुछ प्रजातियां तो विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। गर्मी का मौसम विशेषकर पक्षियों के लिए बहुत कष्टप्रद होता है। उन्हें बचाने के लिए सभी को प्रयास करना होगा। कम से कम एक कटोरा पानी का भरकर छायादार स्थान में रख दें तो बहुत से पंछियों की जान हम बचा सकते हैं। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ करता जा रहा है। इसके दुष्परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं। हालांकि पर्यावरणविदों का कहना है कि ये दुष्परिणाम लंबी अवधि के होते हैं और अभी जो नजर आ रहे हैं वे सौवें हिस्से के बराबर हैं। युगों से इंसान पशु-पक्षियों से प्यार करता रहा है। बेजुबान मासूम जानवरों को सड़कों पर वाहन से कुचल आगे बढ़ जाना या फिर उन्हें तड़पते हुआ देखकर अनदेखा कर देना आजकल के लोगों की फितरत बन चुकी है, लेकिन अपने इस रवैये के कारण हम यह भूल जाते हैं कि हमारे बीच रहने वाले पशु-पक्षियों को केवल हमारा ही सहारा है। भले ही जानवर अपना दर्द बयां न कर सकते हों, लेकिन इंसान के प्रति प्यार और लगाव बखूबी बयां करते हैं। दो वक्त की रोटी और कुछ पल के प्यार व सहानुभूति के बदले यह अपना पूरा जीवन इंसानों की वफादारी करने में बिता देते हैं। जानवर के प्रति हमारा व्यवहार बहुत प्यार भावना वाला होना चाहिए। बेशक जानवर बोल नहीं सकते, लेकिन उन में भी मनुष्य की तरह दर्द, भावनाएं, प्यार होता है। जानवर भी खुश और दुखी होते हैं। जानवर भी हर बात को समझते और महसूस करते हैं। जानवरों का भी अपना परिवार होता है। हमें जानवरों को तंग नहीं करना चाहिए और ना ही मारना चाहिए। हमें उनके साथ प्यार से रहना चाहिए। उनके लिए दाना पानी रखना चाहिए। इस विषय मे हमारी संस्था ने पहल की है और इसके सार्थक परिणाम भी सामने आए हैं। जो लोग तर्क देते हैं कि जानवरों में विटामिन, कैल्शियम होता है वह कुतर्क ही करते है जबकि यह सिद्ध हो चुका है शाकाहार सबसे उत्तम आहार है।
ऋषियों, विद्वानों ने अनेक रूप में सार्थक जीवन की परिभाषा देते हुए संघर्ष की उपयोगिता को, संघर्ष के महत्व को दर्शाया है। महापुरुषों के जीवन संघर्ष से भी यही स्पष्ट होता है कि जीवन की सार्थकता संघर्षों में है। अनेक विद्वानों ने जीवन को इस रूप में देखा है या जिया है कि जीवन एक संघर्ष है, संघर्ष-हीन जीवन मृत्यु का पर्याय है।
अन्तर मात्र इतना है कि जीवित सांस लेते हैं। संघर्ष वह अज्ञात शक्ति है जो व्यक्ति को निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। अतः संघर्ष के अभाव में जीवन का सही आनन्द नहीं उठाया जाता है।
प्रत्येक मनुष्य की नैसार्गिक प्रवृत्ति है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर कीर्तिमान बने। उसकी यही कामना होती है कि जीवन के क्षेत्र में शिखर-स्पर्शी सफलताएँ प्राप्त कर दूसरों के लिए उदाहरण बने, प्रेरणा-स्रोत बने और मैं सभा साधन-सम्पन्नता को प्राप्त कर लूँ। परन्तु मनुष्य को सफलताएँ सहजता से या कल्पना मात्र से प्राप्त हो जाती थीं तो जगत से नीरसता आ जाती। सभी प्राणी जड़वत हो जाते और जीवन के आनन्द से विमुक्त हो जाते।
संसार में ऐसे बहुत कम व्यक्ति हैं, जिनके जीवन में बिना संघर्ष के सफलताएँ प्राप्त हुई हों। जिन व्यक्तियों को पैतृक परम्पराओं से सुख-सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं उन्हें उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जो संघर्ष से हट जीवन जीने के आदी हो गए वे शीघ्र ही उस सुख-सुविधा से वंचित हो गए और घृणित जीवन-जीने के लिए विवश हुए। इसलिए अनिवार्य है कि महापुरुषों ने जीवन की सार्थकता को बनाए रखने के लिए जो आदर्श बताए थे उनको आचरण में लाते हुए संघर्ष करते रहना चाहिए।
जीवन में सफलताओं का आनन्द तभी सम्भव है जब मनुष्य में संघर्ष के लिए अपेक्षित इच्छा-शक्ति हो और दृढ़ इच्छा-शक्ति हो। इच्छा-शक्ति के अभाव में सामर्थ्यवान व्यक्ति भी अपने ध्येय तक पहुँचने में सफल नहीं हो सकता है। दृढ़ इच्छा-शक्ति और धैर्य उसके साथी हों तो सफलताएँ सदैव चरण चूमती हैं, अन्यथा इसके अभाव में ध्येय के निकट पहुँचकर भी धड़ाम से नीचे गिर सकते हैं। और अन्ततः निराशा ही हाथ लगती है और हाथ मलते रह जाते हैं।
दृढ़ इच्छा शक्ति को बनाए रखने के लिए निरन्तर शुभ-चिन्तन, सावधानी, सजगता और क्रियाशीलता आवश्यक है। ध्येय की प्राप्ति न हो पाने पर बिना निराश हुए ध्येय तक पहुँचने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहने पर सफलता मिल जाती है। जीवन को जय-यात्रा के रूप में समझना मनुष्य की प्रथम सफलता है। इस जय यात्रा का शुभारम्भ जन्म लेने पर ही शुरू हो जाता है। यह जय-यात्रा मृत्यु होने पर समाप्त हो जाती है।