कॉर्पोरेट जगत के ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने किसानों को ठग रही सरकार



--विजया पाठक,
(एडिटर, जगत विजन)
मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

देश में इस समय बड़ी अजीब स्थिति कायम है। एक तो पहले से ही समूचा देश कोरोना संकट से जूझ रहा है। दिन प्रतिदिन बढ़ते संक्रमण के केस और उससे होती मौतों का सिलसिला थमा भी नहीं था, कि विगत दस दिनों से देश के किसानों का आक्रोश सड़कों पर है। संसद से सड़क तक केवल एक ही चर्चा है किसानों का उग्र होता यह आंदोलन। देखा जाए तो किसानों का आक्रोश सड़कों पर उतरना लाजमी भी है। यदि यह आंदोलन यही शांत नहीं हुआ तो आने वाले समय में इसका हिस्सा न सिर्फ भारत का आम जन बल्कि विदेश में रहने वाले भारतीय भी किसानों के हितों की मांग करते दिखाई देंगे। केंद्र सरकार द्वारा नए कृषि कानून पारित होने से सीधे-सीधे इसका प्रभाव किसानों की आजीविका पर पड़ेगा। इस कानून का सीधा लाभ कॉर्पोरेट जगत के ठेकेदारों को मिलेगा। कुल मिलाकर किसानों की मांगे जायज है और सरकार को इस कानून में किसानों की मांग अनुसार संशोधन करना ही चाहिए। यदि सरकार इस दिशा में कदम नहीं उठाती है तो कहीं न कहीं यह आंदोलन आने वाले दिनों में और उग्र होने की संभावना है। सरकार को एक बात साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि यह किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा उकसाया हुआ आंदोलन नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन है जिसमें किसान अपने हितों की बात कर रहे है और सरकार का किसानों के हितों का संरक्षण करना प्राथमिक कर्तव्य बनता है।

देश आज ऐसे दहलीज पर खड़ा है जहां किसान अपने हक के लिए आवाज उठाने को मजबूर है। एक दौर ऐसा भी था जब देश को सोने की चिड़ियां का तमगा सिर्फ इसलिए मिला था क्योंकि यहां के लोगों का धन उर्पाजन का मुख्य साधन खेती था। लेकिन आज सड़कों पर किसानों को खड़े होकर अपने हक के लिए चीखता चिल्लाता देख अफसोस होता है। क्या यह वहीं किसान हितैषी सरकार है जो अपने चुनावी वायदों में किसानों को लाभ पहुंचाने की बात को प्राथमिकता देती है। भले आज किसान कॉर्पोरेट जगत के कृषि क्षेत्र पर हावी होने की बात को लेकर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। लेकिन सच तो यह है कि कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट की दुनिया की एंट्री कब की हो चुकी है। इसे देखने के लिए एक उदाहरण को समझना होगा। सरकारी संस्था फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया किसानों के उत्पाद की सबसे बड़ी ख़रीदार है। 23 अलग-अलग फ़सलों के ख़रीदे जाने का प्रावधान है लेकिन सरकार अक्सर केवल चावल और गेहूं ख़रीदती है। केंद्र सरकार के साथ किसानों की हुई पांचवे दौर की बैठक भी बेनतिजा रही और अगली बातचीत 9 दिसंबर को होना तय हुआ है। अब एक बार फिर किसान प्रतिनिधियों ने दो टूक कहा है कि उन्हें कॉरपोरेट फार्मिंग कानून नहीं चाहिए। इससे सरकार को फायदा होगा, किसानों को नहीं। किसान नेताओं ने स्पष्ट कहा है कि हमारे पास इतना सामान है कि हम एक साल गुज़ार सकते हैं। हम कई दिनों से सड़क पर हैं। अगर सरकार चाहती है कि हम सड़कों पर ही रहें तो हमें कोई परेशानी नहीं...।

इस पूरे आंदोलन में एक बात जो सबसे अलग देखने को मिलती है वो है किसान महिलाएं। पंजाब हो या हरियाणा यहां की महिलाएं पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस पूरे आंदोलन में सहभागी बनी हुई है। सहभागी बनें भी क्यों न। इस मिट्टी की खूश्बू में ही वह बात है इतिहास गवाह है जरूरत पड़ने पर यह महिलाएं शौर्य, पराक्रम और वीरता दिखाने को पीछे नहीं हटती। फिर चाहे वो खेत में ट्रेक्टर और हल चलाने की बात हो या फिर अंतरिक्ष का सफर तय करने की।

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