मोदी को लाने का जुनून



---के• विक्रम राव, अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

गैरभाजपायी विपक्ष ने सत्रहवीं लोकसभा चुनाव में अपनी आभासी पराजय का संभावित कारण ईवीएम मशीन को बना लिया है। यदि धुप्पल में वे जीत भी गये तब मान लेंगे कि मशीन ठीक रही। वर्ना मुफीद बहाना तो हाथ लग गया है। ऐसी ही हालत पांचवीं लोकसभा (1971) के वक्त भी थी। तब इंदिरा–कांग्रेस ने गरीबी हटाओ के नारे पर 502 सीटों में से 362 जीतीं थी। हालांकि भंग (चौथी) लोकसभा में उसके मात्र 228 रह गये थे। पछ्पन सदस्य संगठन-कांग्रेस (निजलिंगप्पा–मोरारजी देसाई वाली) में चले गये थे। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस तोड़ डाली थी। कम्युनिस्टों की वैसाखी पर वे अपनी अल्पमतवाली सरकार साल भर चलाती रहीं।

इंदिरा गांधी द्वारा 1971 में 43.7 प्रतिशत वोट पाकर दो तिहाई सीटें जीतने पर भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष प्रो• बलराज मधोक ने आरोप लगाया था कि सोवियत रूस के मुखिया लेउनीड ब्रेजनेव ने अदृश्य स्याही मास्को से दिल्ली भेजी थी, जिसका इंदिरा-कांग्रेस ने मतपत्र (गाय –बछड़ा निशान वाला) पर मुहर लगाने में उपयोग कराया था। नतीजन इस रूसी स्याही के चमत्कार के कारण इंदिरा-कांग्रेस को पांचवीं लोकसभा में 520 में से 362 सीटें हासिल हुईं। जनसंघ अध्यक्ष ने लोकसभा चुनाव में पुनर्मतदान की माँग की, पर निर्वाचन आयोग ने उसे ख़ारिज कर दिया था। तब भी एक महागठबंधन (ग्रांड एलायंस) बना था, जिसमें सोशलिस्ट पार्टी, संगठन-कांग्रेस, चरण सिंह वाले लोग और जनसंघ आदि शामिल थे।

कुछ उसी भारतीय जनसंघ की तर्ज पर आज राहुल-कांग्रेस भी ईवीएम पर संदेह व्यक्त कर उच्चतम न्यायालय को विवाद में घसीट लायी। तब (1971 में) विपक्ष निर्वाचन आयोग के प्रति खिसियानी बिल्ली जैसा हो गया था। मगर आज तो भाजपा खुद एक आक्रामक बिलौटा बन गयी है। विपक्ष मूषक जैसा।

त्रासदपूर्ण प्रसंग यह है कि निर्वाचन आयोग, जो एक संवैधानिक संस्था है, पर फिर भी शक पैदा किया जा रहा है। अतः लोकतंत्र के प्रति आम वोटर के मन पर ख़राब प्रभाव पड़ेगा।

मान भी लें कि गत दिनों प्रसारित एग्जिट पोल कुछ अतिरंजित और गढ़ंत है तो भी भाजपा-नीत राजग सरकार का बनना अवश्यंभावी है। कुछ प्रमुख पार्टियाँ जैसे- आंध्र की वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल, तेलंगाना राष्ट्रीय पार्टी, तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक, जनता दल (यू), अकाली दल, पासवान की रालोजपा, अपना दल, शिव सेना और पूर्वोत्तर की छुटपुट पार्टियाँ नरेंद्र मोदी को 298 के बहुमत के पार पहुंचा ही देंगी। दल बदलू शरद पवार अपनी राष्ट्रवादी कांग्रेस को राजग से जोड़ देंगे। इस कैंसर-पीड़ित नेता का यह आखिरी चुनाव है। उनकी पार्टी बनी थी सोनिया गांधी के विदेशी मूल के विरोध में। अपनी दुलारी दुहिता (सुप्रिया शुले) के प्यारे पिता होने के नाते शरद पवार उसे मोदी काबीना में मंत्री बनवायेंगे ताकि उनके आँखों के समक्ष ही पवार-वंश आबाद हो जाये। एक बात और। विपक्ष को संजोने में ओवरटाइम कर रहे हैं एन• चन्द्रबाबू नायडू के पैरों तले धरती खिसक गई है। आंध्र-प्रदेश विधान सभा के संपन्न मतदान में उनकी तेलुगु देशम पार्टी की विदाई हो रही है। जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस बहुमत पा रही है। रेड्डी मोदी के समर्थक हैं। नायडू की 23 मई के बाद छुट्टी हो जाएगी। तो इस भूतपूर्व नेता को तब कौन भाव देगा?

उधर उत्तर प्रदेश में राहुल-कांग्रेस की सीटें दहाई की संख्या तक नहीं पहुँच पा रही हैं। हालांकि अध्यक्ष की बहना अपना आंचल लहराते डगर-डगर विचरती रहीं, बेचारी।

और कहीं अगर एग्जिट पोल, खुदा न खास्ता, सच हो गए तो मोदी और भाजपा “ओय ओय” गायेंगे, “बल्ले-बल्ले” नाचेंगे। अतः मोदी सरकार फिर एक बार। मोदी है तो मुमकिन है। भावार्थ यही है कि राहुल–कांग्रेस ने अभी आरएसी टिकेट भी नहीं पाया हैं। मगर वे आस लगाये हैं। प्रतीक्षारत ही रह जायेंगे 2024 तक।

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