इंदिरा गांधी का लोकशाही से प्रेम !



---के• विक्रम राव, अध्यक्ष - इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

01 मई 1978 को छठी लोकसभा ने भारत को फिर से लोकतांत्रिक बनाया था। अधिनायकवाद का खात्मा हुआ था। 44वाँ संविधान संशोधन संसद ने मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री काल में आज ही के दिन पारित किया गया था। भारत ने दूसरी आजादी पायी थी। पहली 15 अगस्त 1947 को आयी थी। तब अंग्रेजों से मुक्ति मिली थी। इस बार इंदिरा गांधी की कांग्रेस की निरंकुशता से।

इमरजेंसी (25 जून 1975) घोषित कर इंदिरा गांधी ने हिटलर और मुसोलिनी से भी दुगने अधिकार हासिल कर लिये थे। उनके 42वें संविधान संशोधन (3 जनवरी 1977) में निर्दिष्ट प्रावधानों के अनुसार उच्चतम और सभी न्यायालय संसद के मातहत कर दिए गए। कोई भी कानून, जैसा भी हो, अदालत के विचार तथा अपील से बाहर रखा गया। लोकसभा की अवधि को पांच वर्ष से बढ़ाकर छः वर्ष कर दिया गया। मौलिक अधिकार (संपत्ति की, जीवन, अभिव्यक्ति) आदि कभी भी निरस्त या संशोधित किये जा सकते थे। नागरिक को बिना अदालती कार्यवाही के कैद किया जा सकता था। संविधान के संशोधन हेतु राष्ट्रपति को अधिकार मिल गया था कि वे कार्यकारी आदेश द्वारा संविधान बदल, निरस्त या संशोधित कर सकते थे। जब यह 42वाँ संशोधन पारित हुआ था, तो विपक्ष के अधिकतर सदस्य जेलों में नजरबन्द थे। केंद्र सरकार के एटार्नी जनरल निरेन डे ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया था कि पुलिस किसी भी नागरिक को गोली मार सकती है। राज्य को अधिकार मिला कि वह कोई भी निजी संपत्ति हथिया सकती थी। कुल मिलाकर दरोगा राज था। हमलोग जेल के अन्दर ज्यादा स्वतंत्र थे, बनिस्बत बाहर रह रहे भारतीय जन के।

जनता सरकार पार्टी बनते ही 44वाँ संविधान संशोधन लाकर उपरोक्त बाधाओं का खात्मा किया गया। साथ ही इमरजेंसी थोपने की वैधानिक धाराओं को इतना कठोर बना दिया गया कि इंदिरा गांधी-टाइप की तानाशाही दुबारा लागू नहीं की जा सकती है। अर्थात् एडोल्फ हिटलर और बेनिटो मुसोलिनी का भारत में अवतार सदैव के लिये बंद हो गया। इंदिरा गांधी के वंश के लिये यह चेतावनी भी थी।

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