आम चुनाव 2019 का पारा चढ़ा : हास्य और व्यंग के ग़ालिब की ठण्डी बौछार



नई दिल्ली, 20 अप्रैल 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

हिन्दुस्तान में जन्मे जानेमाने पाकिस्तानी उर्दू लेखक और व्यंगकार मुश्ताक अहमद युसूफी अब नहीं रहे। उन्होंने इस संसार का त्याग 20 जून 2018 को किया। बड़ा नुक़सान हुआ है। वह हास्य और व्यंग के ग़ालिब माने जाते थे । आइए, उनकी कुछ व्यंगभरी वनलाइनर्स को एन्जॉय करें :

● "ईस्लाम के लिए सबसे ज़्यादा कुर्बानी बकरों ने दी है"

● "मर्द की आँख, और औरत की ज़ुबाँ का दम सब से आख़िर में निकलता है"

● "ईस्लामिक वर्ल्ड में आज तक कोई बकरा नॅचरल डेथ नहीं मरा"

● "दुश्मनी के लिहाज़ से दुश्मनों के तीन दर्जे होते है... दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार"

● "आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाए तो ज़िन्दगीभर प्रोफेसर ही रहता है... चाहें बाद में वह समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे"

● "उस शहर की गलियां इतनी तंग थीं, कि गर मुख्तलिफ जीन्स (विपरीत सेक्स) आमने सामने हो जायें... तो निकाह के अलावा कोई गुंजाईश नहीं रहती"

● "वो ज़हर दे के मारती तो दुनिया की नज़र में आ जाती, अंदाज़-ए-क़त्ल तो देखो...हमसे शादी कर ली"

● "दुनिया में ग़ालिब वो अकेला शायर है...जो समझ में ना आया तो दुगना मज़ा देता है"

● "कुछ लोग इतने मज़हबी होते है... कि जूता पसंद करने के लिए भी मस्ज़िद का रुख़ करते हैं"

● "मेरा तआलुक उस भोली भाली नस्ल से है... जो ये समझती है कि बच्चे बुज़ुर्गों की दुआओं से पैदा होते हैं"

● "हमारे ज़माने में तरबूज़ इस तरह खरीदा जाता था जैसे आज कल शादी होती है... सिर्फ सूरत देखकर"

● "सिर्फ 99 प्रतिशत पुलिस वालों की वजह से बाकी 1 प्रतिशत भी बदनाम हैं"

● "हुकूमतों के अलावा कोई भी अपनी मौजूदा तरक्की से खुश नहीं होता"

● "फूल जो कुछ ज़मीं से लेते है... उससे कहीं ज़्यादा लौटा देते हैं"

● "हमारे मुल्क की अफवाहों की सब से बड़ी खराबी ये है कि वो सच निकलती हैं"

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