नई दिल्ली, 17 नवम्बर 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
भारत सरकार के प्रमुख थिंक टैंक नीति आयोग ने संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग एशिया और प्रशांत (यूएनईएससीएपी) और एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के साथ मिलकर दक्षिण एशियाई क्षेत्रिय सम्मेलन का आयोजन दिल्ली के प्रवासी भारतीय केंद्र में किया। सम्मेलन में शहरी आधारभूत संरचना की प्रमुख समस्याओं, संभावनाओं और आगे बढ़ने के रास्तों को लेकर बातचीत हुई।
“शहरी आधारभूत संरचना: सरकारी और निजी साझेदारी और नगर निगम के वित्तीय व्यवस्था के नए तरीकों को लेकर दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन 15-16 नवंबर को किया गया जिसका उद्घाटन नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत और वित्त मंत्रालय के वित्तीय मामलों के विभाग के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने किया। इस मौके पर भारत में संयुक्त राष्ट्र के स्थानीय समन्वयक यूरी अफानासीव, एशियाई विकास बैंक भारत के राष्ट्रीय निदेशक केनिची योकोयामा और यूएनईएससीएपी एसएंडएसब्ल्यू ऑफिस के निदेशक और प्रमुख डॉक्टर नागेश कुमार भी उपस्थित थे।
पहले दिन के समापन समारोह को केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हरदीप सिंह पुरी ने संबोधित किया। इस मौके पर श्री पुरी के सामने सरकारी निजी साझेदारी और नगर निगम की वित्तीय व्यवस्थाओं से जुड़े नए दृष्टिकोण और बेहतरीन कार्यप्रणालियों के नमूने प्रस्तुत किए गए।
अपने शुरुआती संबोधन में नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने इस बात पर जोर दिया कि आज ये जरूरी है कि आधारभूत संरचना के निर्माण में जो निवेश होता है उसकी समुचित वापसी का इंतजाम करने के लिए खासतौर से तैयार किए गए तरीकों से प्रोजेक्ट को बिना नुकसान पहुंचाए करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शहरी नियोजन के लिए अनुठे मॉडल विकसित करने की जरूरत है जो कि रचनात्मक, प्रगतिशील और लंबे समय तक टिकने वाला हो जो कि दक्षिण एशियाई देशों के अनुकूल हो।
वित्त मंत्रालय के वित्तीय मामलों के विभाग के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस बात पर जोर दिया कि शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच एक महीन सीमा के साथ विकेंद्रीकृत शहरीकरण ही सतत शहरीकरण की कुंजी है। उन्होंने कहा कि आधारभूत संरचना के साथ ही सेवाओं और सामानों की डिजिटल डिलीवरी भविष्य में वृद्धि और विकास के क्षेत्र है।
आधारभूत संरचना के विकास के क्षेत्र में बढ़ती मांग और उस अनुपात में कम आपूर्ति को देखते हुए शहरी संरचना के कार्यान्वयन और वित्तीय प्रबंधन के लिए नए रास्तों पर ध्यान देना जरूरी है। अकेले भारत में ही आधारभूत संरचना पर 2040 तक 4.5 ट्रिलियन डॉलर निवेश की उम्मीद है। शहरी जरूरतों को अगर देखें तो दक्षिण एशिया में 2030 तक आबादी 250 मिलियन बढ़ने की उम्मीद है, जबकि इतने समय में भारत की आबादी 590 मिलियन होने का अंदाजा लगाया गया है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत के शहरी झोपड़ियों में रहने वालों की संख्या करीब 98 मिलियन है जिनका विकास बेहद असंतुलित है और मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं। ये असंतुलन दूर करना बेहद जरूरी है ताकि शहरों का विकास समान रूप से और समान वातावरण में हो सके।
• पृष्ठभूमि:
दक्षिण एशियाई क्षेत्रिय सम्मेलन अपनी तरह का पहला सम्मेलन है जिसमे पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र से सरकार, उद्योग जगत, शोध संस्थानों, शिक्षा क्षेत्र, थिंक टैंक और प्रबुद्ध समाज के लोगों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन का उद्देश्य इससे जुड़ी सभी समस्याओं की समीक्षा के साथ ही सरकारी-निजी साझेदारी और शहरी वित्त प्रबंधन की संवहनीयता की जांच कर दक्षिण एशिया खासकर भारत में अंतर्राष्ट्रीय रूप से प्रचलित कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी और पहुंच बढ़ाना है। सम्मेलन के दौरान मुख्य बिंदुओं पर बातचीत, छोटे और केंद्रित सत्र, विस्तृत चर्चा, प्रस्तुति और इस क्षेत्र से जुड़े अलग अलग लोगों से सलाह और चर्चा हुई।
दुनिया के देशों को आधारभूत संरचना स्थापित करने के लिए नए और मौलिक मॉडल विकसित करने होंगे। सरकारी और निजी साझेदारी ऐसा ही एक विकल्प हो सकता है जिसमें सरकार किसी प्रोजेक्ट के स्थायित्व और जीवन काल से जुड़े खतरों को साझा कर सकती है। हालांकि सरकारी प्रबंधन को और गतिशील बनाने के लिए जरूरी है कि दूसरे व्यापक विकल्पों पर ध्यान दिया जाए। भारत में शहरी आधारभूत संरचना विकसित करने के लिए शासन प्रणाली को शहरी स्थानीय संस्थाओं के परिचालन और वित्तीय स्वतंत्रता को मद्देनजर रखते हुए शासन प्रणाली को लोकतांत्रिक बनाने के लिए गहन विचार विमर्श की जरूरत है।