जयपुर 14 मई। देश में बीड़ी पीने वालों की संख्या अन्य तरह से धूम्रपान करने वालों से काफी अधिक है। बाजार में एक सिगरेट की जगह आठ गुणा अधिक बीड़ी बिकती है। इस समय जब विभिन्न वस्तुओंके लिए वस्तु एवं सेवाकर दर (जीएसटी) तय हेाना है, ऐसे में सबसे ज्वलंत सवाल है कि क्या बीड़ी के कारण 11733 लोगों की नौकरी के लिए हर साल 54,300 लोगों की जान ली जा सकती है।
हालांकि सभी जानतें है कि बीड़ी पीने से स्वास्थ्य का नुकसान हेाता है। लेकिन बीड़ी पर किसी तरह का नियंत्रण कर के मामले में नहीं है, इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि बीड़ी बनाने के काम में लगे लाखोंलोगों का रोजगार छीन जाएगा।
तंबाकू के सेवन पर रोक लगाने पर काम करने वाले संबध हैल्थ फाउंडेशन के ट्रस्टी संजय सेठ का कहना है कि तंबाकू सेवन पर भारी कर लगा कर इसके प्रयोग को रोकना सबसे कारगर तरीकों में से एक है।लेकिन वर्षों से बीड़ी पर सबसे कम कर लगाया जाता है क्योंकि इसके लिए तर्क दिया जाता है कि बीड़ी उद्योग से लाखों लोगों का जीवनयापन होता है। जीएसटी में भी बीड़ी पर 18 प्रतिशत कर लगाने की बातहो रही है जो अन्य तंबाकू उत्पादों पर लगाए जाने वाले 28 प्रतिशत कर और सेस की तुलना में बहुत ही कम है।
वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिमस (वीओटीवी) के प्रभारी व सवाई मानसिंह अस्ताल के हैड नेक कैंसर सर्जन डा०पवन सिंघल का कहना है कि जितने लोग बीड़ी उद्योग में लगे हैं उससे अधिक हर साल लोगों कीमौत बीड़ी के सेवन से हो रही है। उन्होंने बताया कि वह बीड़ी पीने से हुई कैंसर की बीमारी के मरीजों को रोज देखते हैं। इसलिए बीमारी से न सिर्फ मरीज को झेलना पड़ता है बल्कि इससे मरीज का सम्पूर्णपरिवार भी बर्बाद हो रहा है। किसी भी हाल में बीड़ी के उपभोग को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। बीड़ी भी सिगरेट की तरह ही खतरनाक है और इसे जीएसटी के अंतर्गत अवगुण पदार्थों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
डा०सिंघल ने बताया कि ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (बीएमजे)2014 के अनुसार पूरे प्रदेश में बीड़ी उद्योग में केवल 11733 को ही रोजगार मिला है। इसी दौरान योजना आयोग के रोजगार आंकड़ों के अनुसार राज्यमें केवल शून्य प्रतशित लोगों को बीड़ी उद्योग में रोजगार मिला हुआ था। इससे इस उत्पाद से असम में मिले रोजगार के महत्व का पता चलता है।
वे बतातें है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी वर्ष 2012/13 के अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार राज्य में तम्बाकू पर वैट से केवल 797 करोड़ रुपए की आमदनी हुई थी जबकि तंबाकू के कारणपैदा हुई बीमारियों पर 1160 करोड़ रुपए खर्च किए गए। ग्लोबल अडल्ट टोबेको सर्वे (जीएटीएस) के अनुसार राजस्थान में 1 करोड़ 49 लाख लोग तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें 12.9 लाख सिगरेट और73.8 लाख लोग बीड़ी पीते हैं। इसके साथ ही 87 लाख लोग ऐसे भी हैं जो धुआं रहित तम्बाकू उत्पादों का प्रयोग करते हैं। सभी प्रकार के तम्बाकू सेवन के कारण हर साल 72000 लोगों की मौत होती है।
मुंबई टाटा मेमोरियल अस्पताल के कैंसर के सर्जिकल प्रोफेसर डा० पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि बीड़ी पीने से होने वाली मौतों और पेरशानियों की तुलना रोजगार के तर्क को देकर नहीं की जा सकती। उन्होंनेबताया कि एक अध्ययन के अनुसार देश में हर साल बीड़ी पीने से 5.8 लाख लोगों की मौत होती है।
उन्होंने बताया कि यह धारणा गलत है कि बीड़ी उद्योग असंगठित क्षेत्र है और इसमें बहुत भारी संख्या में लोग काम करते हैं। दरअसल बीड़ी उद्योग एक बहुत ही अच्छी तरह से संगठित क्षेत्र का उद्योग है औरहकीकत तो यह है कि बीड़ी मजदूर बीड़ी उद्योग द्वारा दुष्प्रचारित कि बीड़ी उद्योग असंगठित क्षेत्र है का शिकार बने हुए हैं।
वर्ष 2010 के एक बीड़ी बनाने वाले राज्य में किए गए एक अध्ययन के अनुसार यह पाया गया है कि 70 प्रतिशत मजदूर आंख, गैस और दिमाग की बीमारी से पीडि़त है। इनमें से आधेक लोगों को सांस लेने में दिक्कत हेाती है। इसी कारण से सभी चिकित्सकेां ने वितमंत्री से जीएसटी के अंतर्गत बीड़ी को आवश्यक रूप से अवगुण पदार्थों की श्रेणी में रखने की मांग की है।