सहकारिता के आधार पर ही होगा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का विकास!



--प्रमोद दूबे
संपादक - कपिला प्रहरी
कोलकाता - पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज।

... और क्या आप महसूस करते हैं कि भारत के विकास इतिहास में कुछ प्रयोग ऐसे हैं, जिन्होंने केवल आर्थिक संरचना नहीं बदली, बल्कि समाज की आत्मा को भी पुनर्जीवित किया। गुजरात की अमूल डेयरी ऐसी ही एक ऐतिहासिक पहल है। अमूल केवल दूध का ब्रांड नहीं, बल्कि वर्षों से विकास से वंचित, शोषित और बिखरे हुए पशुपालकों के आत्मसम्मान, आजीविका और भविष्य की गारंटी है। उसने यह सिद्ध कर दिया कि जब गरीब, मेहनतकश लोग सहकारिता के सूत्र में बंधते हैं, तो वे न केवल अपने शोषण को समाप्त करते हैं, बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी पहचान बना सकते हैं।

● अमूल का सहकारिता सूत्र: शोषण से सशक्तिकरण तक

अमूल की सफलता का मूल मंत्र अत्यंत सरल, परंतु गहरा है - उत्पादक स्वयं मालिक। गांव के पशुपालक, जिनका दूध कभी बिचौलियों की दया पर बिकता था, सहकारी समिति के सदस्य बने। गांव स्तर पर दूध संग्रह, जिला स्तर पर प्रसंस्करण और राज्य स्तर पर विपणन-तीन स्तरीय सहकारिता ढांचा। इस व्यवस्था ने बिचौलियों को हटाया, पारदर्शिता लाई और लाभ सीधे उत्पादक तक पहुंचाया।

अमूल ने यह भी समझा कि सहकारिता केवल आर्थिक अनुबंध नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का ताना-बाना है। नियमित भुगतान, गुणवत्ता के आधार पर मूल्य, पशु-चिकित्सा सेवाएं, चारा, प्रशिक्षण और तकनीक - इन सबने पशुपालकों को यह एहसास दिलाया कि वे किसी कंपनी के मजदूर नहीं, बल्कि उसके मालिक हैं। यही कारण है कि अमूल आंदोलन को श्वेत क्रांति कहा गया - एक ऐसी क्रांति जो बिना खून-खराबे के, पर गहरे सामाजिक परिवर्तन के साथ आई।

● उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की विडंबना: संसाधन हैं, संरचना नहीं, विकास पर जातिवाद भारी

अब प्रश्न उठता है - क्या यही सहकारिता मॉडल उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में संभव है? पूर्वांचल, जहां कृषि एकमात्र आजीविका का सहारा नहीं है। यहां काष्ठ शिल्प, चर्म उद्योग, मिट्टी के बर्तन, हथकरघा, वस्त्र, बांस और लोहे के पारंपरिक कुटीर उद्योग सदियों से जीवित हैं। कुशल हाथ हैं, पर बाजार नहीं। हुनर है, पर सम्मानजनक मूल्य नहीं। मेहनत है, पर सुरक्षा नहीं। नब्बे के दशक के पश्चात सरकारी नीतियों, माफियाओं, भ्रष्ट नौकरशाही के चलते एक-एक करके पूर्वांचल की चीनी मिलों और कुटीर उद्योग धंधों को ग्रहण लग गया। देखते-ही-देखते लाखों लोगों की आजीविका छिन गई। आत्मनिर्भरता का आधार ही सूख गया।

आज भी पूर्वांचल में कारीगर हैं, कुटीर उद्योग धंधों की अपार संभावनाएं हैं, पर सरकारी नीतियों, भ्रष्ट अधिकारियों, माफियाओं, आधारभूत संरचनाओं का अभाव, बिचौलियों, ठेकेदारों और साहूकारों के कारण अंतिम सांसें गिन रहा है। कुटीर उद्योग धंधों के उत्पाद शहरों और विदेशों में महंगे दामों पर बिकता है, पर निर्माता को दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह शोषण किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का है।

● अमूल की तर्ज पर पूर्वांचल सहकारिता: एक व्यावहारिक सपना

यदि अमूल मॉडल को पूर्वांचल की जरूरतों के अनुसार ढाला जाए, तो एक नई क्रांति संभव है हुनर की सहकारिता क्रांति। इसके लिए सबसे पहले गांव या समूह स्तर पर कारीगरों की सहकारी समितियां बनानी होंगी। लकड़ी, चर्म, मिट्टी, हथकरघा - हर क्षेत्र की अलग सहकारी इकाई, जहां कारीगर सदस्य और मालिक हों।

दूसरा चरण होगा - क्लस्टर आधारित प्रसंस्करण और डिजाइन केंद्र। जैसे अमूल ने दूध को मूल्यवर्धित उत्पादों में बदला, वैसे ही कच्चे हुनर को आधुनिक डिजाइन, पैकेजिंग और गुणवत्ता मानकों से जोड़ना होगा। स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर डिजाइन, मार्केटिंग और तकनीक से जोड़ा जाए।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण - विपणन सहकारिता। एक साझा ब्रांड, जैसे अमूल, जो पूर्वांचल के उत्पादों की पहचान बने। ई-कॉमर्स, निर्यात और शहरी बाजारों तक सीधी पहुंच। लाभ का बड़ा हिस्सा सीधे कारीगरों को, न कि बिचौलियों को।

● सहकारिता केवल अर्थशास्त्र नहीं, समाजशास्त्र है

अमूल की सबसे बड़ी देन यह थी कि उसने पशुपालकों में आत्मविश्वास जगाया। पूर्वांचल में भी यही सबसे जरूरी है। जब कारीगर यह महसूस करेगा कि वह दया का पात्र नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का निर्माता है, तभी वास्तविक परिवर्तन होगा। सहकारिता महिलाओं को नेतृत्व दे सकती है, युवाओं को रोजगार और पलायन पर रोक लगा सकती है।

यह मॉडल सरकारी योजनाओं की बैसाखी पर नहीं, बल्कि समुदाय की भागीदारी पर टिकेगा। सरकार की भूमिका मार्गदर्शक और सहायक की हो, मालिक की नहीं। पारदर्शिता, लोकतांत्रिक चुनाव और पेशेवर प्रबंधन - ये तीन स्तंभ सहकारिता को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचा सकते हैं।

● अब भी समय है

आज जब पूर्वांचल का युवा महानगरों में मजदूरी करने को मजबूर है, जब गांव का हुनर दम तोड़ रहा है, शासन-प्रशासन में जातिवाद का जहर घोला जा रहा है। तब अमूल का अनुभव हमें पुकार रहा है। यदि गुजरात का साधारण पशुपालक विश्व-स्तरीय ब्रांड का मालिक बन सकता है, तो पूर्वांचल का किसान, मजदूर, कुटीर उद्योग धंधों का मालिक और कारीगर क्यों नहीं?

सहकारिता कोई जादू नहीं, पर यह सामूहिक इच्छाशक्ति का सबसे मजबूत औजार है। अमूल ने दिखाया कि विकास ऊपर से थोपने से नहीं, नीचे से उगाने से आता है। अब आवश्यकता है कि पूर्वांचल अपने संसाधनों, अपने हुनर और अपने लोगों पर विश्वास करे।

यह केवल आर्थिक योजना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई है। अगर हम अमूल के सहकारिता सूत्र को समझकर, उसे अपने स्थानीय संदर्भ में ईमानदारी से लागू करें, तो वह दिन दूर नहीं जब पूर्वांचल भी अपनी “श्वेत नहीं, स्वाभिमान की क्रांति” लिखेगा।

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