नक्सलमुक्त भारत की दिशा में दो राज्यों की दो रणनीतियाँ, योजनाबद्ध पहल बनाम तात्कालिक निर्णय



--विजया पाठक
एडिटर जगत विजन
मध्यप्रदेश - छत्तीसगढ़ , इंडिया इनसाइड न्यूज।

● छत्तीसगढ़ में गृहमंत्री विजय शर्मा की गलत रणनीति के कारण हिडमा का हुआ एनकाउंटर

● मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में शांतिपूर्ण ढंग से सफल हुआ नक्सलियों के खात्मे का अभियान

● विजय शर्मा का यह कदम कहीं साय सरकार को बदनाम करने की सोची समझी साजिश तो नहीं

भारत लंबे समय से नक्सलवाद जैसी आंतरिक सुरक्षा चुनौती से जूझता रहा है। यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं, बल्कि विकास, विश्वास और संवाद से भी गहराई से जुड़ी हुई है। हाल के महीनों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़- दो ऐसे राज्य, जो कभी नक्सली गतिविधियों से प्रभावित रहे। नक्सलमुक्त अभियान को लेकर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आए हैं। दोनों राज्यों में सरकारें एक ही राजनीतिक दल की हैं, किंतु नक्सल विरोधी अभियान की रणनीति, कार्यशैली और परिणामों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। यही अंतर आज एक व्यापक विमर्श को जन्म दे रहा है।

• मध्यप्रदेश में योजनाबद्ध रणनीति और नेतृत्व की स्पष्ट दृष्टि

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में नक्सल विरोधी अभियान को एक स्पष्ट, मानवीय और रणनीतिक दिशा दी गई। बालाघाट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सरकार ने केवल बल प्रयोग को ही समाधान नहीं माना, बल्कि संवाद, आत्मसमर्पण नीति और सटीक खुफिया तंत्र के समन्वय से काम किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि नक्सलियों को या तो जीवित पकड़ा जाए या उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया जाए। यह निर्देश अपने आप में यह दर्शाता है कि सरकार का उद्देश्य केवल मुठभेड़ों के आँकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थायी शांति स्थापित करना था। इस रणनीति का परिणाम अभूतपूर्व रूप से सामने आया। मात्र 42 दिनों के भीतर 42 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। यह संख्या केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि यह उस भरोसे का प्रतीक है जो सरकार की नीति और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से बना। आत्मसमर्पण करने वाले कई नक्सलियों ने स्वीकार किया कि सरकार की पुनर्वास नीति, सुरक्षा की गारंटी और मुख्यधारा से जुड़ने का अवसर उनके निर्णय का आधार बना। मध्यप्रदेश ने इस तरह नक्सलमुक्ति की दिशा में एक नया इतिहास रचा, जिसमें बल से अधिक बुद्धि और संवाद की भूमिका रही।

• प्रशासन, पुलिस और समाज का समन्वय

मध्यप्रदेश मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता रही समन्वय। मुख्यमंत्री स्तर से लेकर जिला प्रशासन, पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और स्थानीय समाज- सभी को एक साझा लक्ष्य के तहत जोड़ा गया। योजनाबद्ध ढंग से क्षेत्रवार रणनीति बनाई गई, स्थानीय परिस्थितियों को समझा गया और हर कार्रवाई से पहले उसके दूरगामी परिणामों पर विचार किया गया। यही कारण है कि अभियान केवल सुरक्षा कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विकास योजनाओं, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के विस्तार से भी जुड़ा रहा। इससे नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र में रहने वाले आम नागरिकों का भरोसा सरकार पर और मजबूत हुआ।

• छत्तीसगढ़ में कार्रवाई पर उठते सवाल

इसके विपरीत छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान को लेकर कई प्रश्न खड़े हुए। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार के भीतर ही गृह विभाग की कार्यप्रणाली पर असहमति की आवाजें सुनाई दीं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि गृहमंत्री विजय शर्मा ने मुख्यमंत्री की पूर्ण जानकारी और व्यापक रणनीतिक योजना के बिना कुछ निर्णय लिए, जिनका परिणाम तात्कालिक रूप से हिंसक टकराव के रूप में सामने आया। विशेष रूप से हिडमा जैसे कुख्यात नक्सली नेता के संदर्भ में यह चर्चा तेज हुई कि यदि समग्र योजना और संवाद की संभावनाओं पर काम किया जाता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। आलोचकों का कहना है कि बिना पर्याप्त तैयारी और दीर्घकालिक रणनीति के की गई कार्रवाइयाँ न केवल मानव जीवन के लिए जोखिमपूर्ण होती हैं, बल्कि सरकार की छवि और विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती हैं।

• राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक छवि

छत्तीसगढ़ में हुई घटनाओं को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि तात्कालिक निर्णयों ने राज्य सरकार को अनावश्यक विवादों में घेर दिया। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे कदमों से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार की छवि को नुकसान पहुँचा और नक्सल विरोधी अभियान की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगे। यद्यपि सरकार की ओर से इन आरोपों का खंडन भी किया गया है, फिर भी यह बहस यह संकेत देती है कि आंतरिक सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर समन्वय और नेतृत्व की एकरूपता कितनी आवश्यक है।

• रणनीति बनाम तात्कालिकता

इन दोनों राज्यों के उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि नक्सलवाद जैसी समस्या का समाधान केवल हथियारों से नहीं हो सकता। जहाँ मध्यप्रदेश में योजनाबद्ध, चरणबद्ध और संवाद-आधारित नीति अपनाई गई, वहीं छत्तीसगढ़ में तात्कालिक कार्रवाई की छवि उभरी। एक ओर आत्मसमर्पण के रिकॉर्ड बने, दूसरी ओर मुठभेड़ों और विवादों की चर्चा हुई। यह अंतर केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है—कि राज्य नक्सलियों को केवल शत्रु के रूप में देखता है या भटके हुए नागरिक के रूप में, जिन्हें मुख्यधारा में लौटने का अवसर दिया जा सकता है।

• नक्सल-मुक्ति की राह से मिली सीख और संदेश

नक्सल-मुक्त भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब सभी राज्य एक संतुलित नीति अपनाएँ- जहाँ सुरक्षा बलों की सशक्त भूमिका हो, वहीं संवाद, विकास और पुनर्वास की भी उतनी ही मजबूत व्यवस्था हो। मध्यप्रदेश का अनुभव यह बताता है कि राजनीतिक नेतृत्व की स्पष्ट सोच, प्रशासनिक अनुशासन और मानवीय दृष्टिकोण से बड़े बदलाव संभव हैं। वहीं छत्तीसगढ़ का प्रसंग यह चेतावनी देता है कि बिना समन्वय और योजना के उठाए गए कदम, भले ही उद्देश्य सही हों, लेकिन परिणाम जटिल हो सकते हैं। नक्सलवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल एक राज्य या एक सरकार की नहीं, बल्कि राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के हालिया अनुभव हमें यह सिखाते हैं कि नेतृत्व की भूमिका निर्णायक होती है। जहाँ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने संयम, रणनीति और संवाद से इतिहास रचा, वहीं छत्तीसगढ़ में उठे सवाल यह याद दिलाते हैं कि आंतरिक सुरक्षा जैसे विषय पर हर निर्णय सोच-समझकर, सामूहिक विमर्श और स्पष्ट योजना के साथ लिया जाना चाहिए। नक्सलमुक्त भारत की दिशा में यही संतुलित और दूरदर्शी मार्ग सबसे प्रभावी सिद्ध हो सकता है।

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