बिहार से अंतर-राज्यीय पलायन का सकल और नेट दर देश में सबसे ज्यादा



--अभिजीत पाण्डेय,
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

बिहार से मजदूरों का पलायान का लंबा इतिहास है। पर बीते तीन दशकों में में इसमें अप्रत्याशित तेजी आई। पंजाब के खेतों और बंगाल की फैक्ट्रियों की ओर होने वाला मजदूरों का पलायन देशव्यापी स्वरूप में हमारे सामने है।

एक अनुमान के अनुसार बिहार के 35 से 40 लाख मजदूर विभिन्न प्रदेशों में काम करते हैं। हालांकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 25 से 30 लाख के बीच है।

अगर सरकार के आंकड़ों को ही मानें तो ये किसी भी प्रदेश के लिए बहुत बड़ी संख्या है। आईएचडी के सर्वेक्षण में शामिल 7 जिलों में औसतन सर्वाधिक प्रवासी मजदूर भेजने वाला जिला है गोपालगंज और मधुबनी है। यहां 71.8% मजदूर पलायन करते हैं।

आईआईपीए के 17 जिलों के ग्राम पंचायत सर्वेक्षण में अररिया में प्रवासी श्रमिकों वाले परिवारों का प्रतिशत 53.2, पूर्णिया में 48.2, शिवहर में 47.1 तथा मुंगेर और गया दोनों में 44.2% है। बाढ़ ग्रस्त कोसी क्षेत्र से भी काफी संख्या में श्रमिक रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं। इस क्षेत्र में शामिल जिले हैं सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, दरभंगा, सीतामढ़ी, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार शामिल हैं।

यही नहीं बिहार से अंतर-राज्यीय पलायन का सकल और नेट दर देश में सबसे ज्यादा है. ऐतिहासिक रूप से बिहार से पलायन तीन दौरों से गुजरा है। पहले दौर में, अंग्रेजों ने बिहारी श्रमिकों को पूर्व के राज्यों में पलायन करने के लिए खास तौर पर प्रोत्साहित किया. दूसरा दौर हरित क्रांति के बाद शुरू हुआ, जब मजदूर पंजाब, हरियाणा जाने लगे।

तीसरा मौजूदा दौर उदारीकरण के साथ शुरू होता है, जब शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन का रुझान बढ़ा। इसके साथ एक हकीकत ये है कि पलायन का 64 प्रतिशत परिवार भरण-पोषण के लिए होता है और महज 29 प्रतिशत ही परिवार बेहतर वेतन और अच्छे रोजगार के लिए पलायन करते हैं।

इन सबके बीच एक स्थिति ये है कि बिहार पिछले कई सालों से विकास दर के मामले में पहले-दूसरे स्थान पर बना रहता है। लेकिन सवाल ये है कि क्या यह लोगों के जीवन को कितना बेहतर कर पा रहा है?

अभी भी बिहार में विकास का मतलब बेहतर सड़कें, बिजली और कुछ हद तक अपराध पर नियंत्रण तक ही सीमित हैं। हाल के दिनों में कुछ फ्लाई ओवर और ऊंची-ऊंची बिल्डिगें भी इसके मानक माने जाने लगे हैं। इससे आगे बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, औद्योगीकरण, नौकरियां और बेहतर कामकाजी माहौल के बारे में कोई चर्चा ही नहीं होती है।

बिहार की सरकार एग्रो इंडस्ट्री को आकर्षित करने की बात तो कहती है पर सच्चाई ये है कि इसमें भी वह असफल रही है। एक आंकड़े के अनुसार देश की कुल आबादी का 69 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है, लेकिन बिहार में यह 90 प्रतिशत है। सरकार भले ही कृषि में तरक्की का दावा करे, लेकिन सच्चाई यही है कि खेती-किसानी अब घाटे का सौदा बन चुका है।

झारखंड से अलग होने के बाद राज्य में औद्योगिक विकास सिर्फ कागजों पर ही सीमित दिखता है। पिछले 20 वर्षों में इंडस्ट्री लाने में मौजूदा सरकार भी नाकाम ही रही है। हालांकि, सीमेंट की एक-दो फैक्ट्रियां लगी हैं, लेकिन यह नाकाफी है। अभी देश के कुल उद्योग में बिहार की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से कम है, और कैपिटल के मामले में यह सिर्फ आधा प्रतिशत। वहीं, गुजरात जैसे राज्य की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से अधिक है।

ताजा समाचार

National Report



Image Gallery
इ-अखबार - जगत प्रवाह
  India Inside News