--अभिजीत पाण्डेय,
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पूरी दुनिया इन दिनों कोरोना से बचने के उपाय में लगी है। पिछले साल करीब 200 बच्चों को मस्तिष्क बुखार की वजह से खोने वाला बिहार कोरोना वायरस को लेकर सतर्कता बरतने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है। बिहार की जेलों में भी इसको लेकर खासी पहल की गई है। जहाँ कैदियों द्वारा खुद मास्क बनाया जाता है।
सूबे के पूर्णिया स्थित केन्द्रीय कारागार में भी कोरोना वायरस को लेकर हाई अलर्ट है। इस जेल में कैदियों द्वारा खुद मास्क बनाया जाता है। कैदियों द्वारा उजले रंग के खादी के कपड़े से ये मास्क बनाये जा रहे हैं।
यहां के 20 से 25 कैदी प्रतिदिन करीब पांच सौ मास्क बनाते हैं। इन मास्कों को बिहार के कई जेलों में सप्लाई भी किया जाता है।
जेल में मास्क बनाने के लिये दस मशीनें उपलब्ध हैं। इन मशीनों से प्रतिदिन 20 से 25 कैदी मास्क बनाने का काम कर रहे हैं। दो दिनों में करीब एक हाजर मास्क बनकर तैयार हो गया है। कैदी प्रतिदिन करीब पांच सौ मास्क बना लेते हैं। मास्क बनाने में जो कपड़ा होता है वो खादी का होता है साथ ही मेटेरियल का उपयोग होता है वो भी पूर्णिया केन्द्रीय कारागार के कैदियों द्वारा ही बनाया जाता है।
इस तरह काफी कम लागत में कैदियों और जेल के कर्मचारियों के लिये कैदियों द्वारा मास्क बनाया जा रहा है। बताया गया कि जहां से भी जेल के लिये मास्क की मांग होगी वहां के जेल को मास्क की आपूर्ति की जायेगी। इसके अलावा यूपी के मथुरा केन्द्रीय कारागार में भी कोरोना को लेकर मास्क बनाया जा रहा है।
पूर्णिया केन्द्रीय कारागार में इस समय 51 महिला कैदी समेत कुल 1435 कैदी बंद हैं। फिलहाल पुरुष कैदियों द्वारा मास्क बनाने का काम चल रहा है लेकिन जल्द ही महिला कैदियों द्वारा भी मास्क बनाया जायेगा। इसके लिये उन्हें ट्रेनिंग भी दी गयी है।
वहीं उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर केंद्रीय जेल में करीब 50 कैदी मास्क बनाने के लिए अपने कार्य के लिए तय समय से अधिक देर तक काम कर रहे हैं। अधिक समय तक काम करने का उद्देश्य इस जेल में और अन्य जेलों में अपने कैदियों की सुरक्षा के लिए मास्क बनाना है। इस जेल में कपड़ा तैयार करने की परंपरा रही है। इसी कौशल का उपयोग मास्क बनाने के लिए किया जा रहा है। वैसे भी कम आपूर्ति होने की वजह से मास्क की मांग अधिक है।