--अभिजीत पाण्डेय,
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
बिहार की राजनीति हमेशा से जाति के ईर्द गिर्द घूमती रही है। बात चाहे निकाय चुनाव की हो या फिर विधानसभा, लोकसभा या राज्यसभा की। बिहार से राज्यसभा में सदस्यों (अपर हाउस) में अपर कास्ट ने अपना वर्चस्व बना लिया है वो भी तब जब बिहार के सियासत में पिछड़ा,अति पिछड़ा और दलितों की राजनीति के इर्द गिर्द सियासत घूम रही है। ऐसे में सवाल है कि आख़िर वो कौन सी वजह है जिसने बिहार के तमाम सियासी पार्टियों को सवर्ण नेताओं पर दांव लगाने को मजबूर कर दिया है खास कर उपरी सदन के लिए।
सवर्ण नेताओं को अपर हाउस भेजने में कोई एक पार्टी ही नहीं है बल्कि तमाम पार्टियां शामिल हैं जो उपरी सदन के लिए सवर्ण नेताओं पर ही भरोसा जताती है। राज्यसभा में बिहार से आने वाले सवर्ण नेताओं में हरिवंश सिंह- जेडीयू-राजपूत, अखिलेश सिंह-कांग्रेस-भूमिहार, सी• पी• ठाकुर-बीजेपी अब उनकी जगह विवेक ठाकुर-भूमिहार, गोपाल नारायण सिंह-बीजेपी-राजपूत, वशिष्ठ नारायण सिंह जेडीयू-राजपूत, मनोज झा-राजद-ब्राह्मण, किंग महेंद्र-जेडीयू-भूमिहार, सतीश चंद्र दुबे-बीजेपी-ब्राह्मण, अमरेन्द्रधारी सिंह-राजद-भूमिहार आदि शामिल हैं।
बिहार से कुल 15 राज्यसभा सदस्य हैं जिसमें आधे से ज़्यादा सवर्ण समुदाय से आते हैं। कुल 9 सदस्य सवर्ण समुदाय से, दो मुस्लिम जिसमें एक कहकंशा परवीन का टर्म ख़त्म होने वाला है। एक यादव मीसा भारती हैं तो एक दलित नेता रामविलास पासवान। एक नेता पिछड़ी जाति से हैं जो जेडीयू के आरसीपी सिंह हैं, जेडीयू से ही एक अति पिछड़ा समुदाय के नेता रामनाथ ठाकुर उपरी सदन के सदस्य हैं। ऐसे में साफ़ है कि तमाम पार्टियों ने अपर हाउस में अपर कास्ट को प्राथमिकता दी है।