समलैंगिक समुदाय की तृणमूल सांसद मेनका गुरुस्वामी की राज्य सभा में पहले भाषण से डरी सरकार



--राजीव रंजन नाग
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद और सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने बुधवार को अपने भाषण में राज्यसभा में आरोप लगाया कि "सरकार केवल उन्हीं जजों को नियुक्त करते हैं जिनकी विचारधारा आपकी विचारधारा से मेल खाती है!" हालांकि, उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने तुरंत निर्देश दिया कि इस टिप्पणी को रिकॉर्ड में नहीं रखा जाएगा। यह पहली बार था जब देश की पहली 'क्वीयर' सांसद गुरुस्वामी संसद में बोलीं। मेनका गुरुस्वामी के भाषण की संसद के अंदर और बाहर खासा चर्चा रही।

गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट की सीनियर एडवोकेट हैं और उन वकीलों में शामिल थीं जिन्होंने उस ऐतिहासिक संवैधानिक मामले में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व किया था, जिसके परिणामस्वरूप 2018 में आईपीसी की धारा 377 को आंशिक रूप से रद्द करके भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था। गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026' पर बहस के दौरान बोल रही थीं। इस विधेयक में सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या को सीजेआई सहित 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रावधान है। मेनका गुरुस्वामी ने न्यायपालिका में महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के बारे में भी बात की। सीनियर एडवोकेट ने न्यायिक नियुक्तियों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर प्रकाश डाला। उनके द्वारा बताए गए आंकड़ों के अनुसार, 2018 और 2026 के बीच हुई नियुक्तियों में, लगभग 3 प्रतिशत नियुक्त व्यक्ति अनुसूचित जातियों से, 2 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों से और 12 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्गों से थे।

यह विधेयक सोमवार को लोकसभा से पारित हो चुका है, लेकिन इसे राज्यसभा की मंज़ूरी का इंतज़ार है। इसका मकसद भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करना है। सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट के तौर पर बिताए समय का ज़िक्र करते हुए और यह बताते हुए कि वह "कुछ अनुभव" के साथ बोल रही हैं।

बुधवार को राज्यसभा में अपने पहले भाषण में, भारत की पहली खुलकर 'क्वीयर' पहचान वाली सांसद और सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि न्यायपालिका की समस्याएं और जज नियुक्त करने से हल नहीं होंगी; असल समस्या यह है कि केंद्र सरकार ने न्यायपालिका में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों या समलैंगिक लोगों को नियुक्त नहीं किया है। पश्चिम बंगाल से ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सांसद गुरुस्वामी ने कहा - जब आप संविधान के अनुसार काम करते हैं, तभी समस्याओं का समाधान होता है। उन्होंने आगे कहा कि समस्या यह है कि केंद्र सरकार न्यायपालिका में महिला जजों, अनुसूचित जातियों या जनजातियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों या समलैंगिक व्यक्तियों को नियुक्त नहीं कर रही है।

देश भर के हाई कोर्ट में स्वीकृत जजों के 30 प्रतिशत से ज़्यादा पद अभी भी खाली होने की बात पर ज़ोर देते हुए, गुरुस्वामी ने कहा कि अभी सभी हाई कोर्ट जजों में से 14 प्रतिशत महिलाएं हैं। दूसरी ओर, उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की महिलाओं की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से भी कम है। गुरुस्वामी ने बताया कि पिछले आठ वर्षों में (2018 से 2026 के बीच), केंद्र सरकार ने केवल 3 प्रतिशत एससी जज और 2 प्रतिशत एसटी जज नियुक्त किए। उन्होंने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आने वाले जजों का आंकड़ा 12 प्रतिशत रहा।

केंद्रीय कानून और न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बुधवार को राज्यसभा को बताया कि सुप्रीम कोर्ट हर साल लगभग 10,000 मामलों का निपटारा करने में पीछे रह जाता है क्योंकि नए मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मेघवाल ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने 11 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में बढ़ते मामलों के बोझ की ओर ध्यान आकर्षित किया था और सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने का अनुरोध किया था। मंत्री ने बताया कि 16 जुलाई, 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में 96,024 मामले लंबित थे। 25 हाई कोर्ट में कुल मिलाकर 64.72 लाख मामले लंबित थे, जबकि ज़िला और अधीनस्थ अदालतों में 4.98 करोड़ मामले लंबित थे।

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