--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
रायपुर - छत्तीसगढ़, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■बड़ा सवाल: क्या अब जेल की सलाखों में जायेगा छोटू?
■बीजेपी-कांग्रेस के नेताओं और पुलिस अफसर भी आयेंगे जांच के दायरे में
■छत्तीसगढ़ सरकार की हरी झंडी, जारी की राजपत्र में अधिसूचना
■बड़ी जांच एजेंसी की रडार पर होगी बड़ी मछली
भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) से जुड़े बहुचर्चित लोहा चोरी और संगठित धोखाधड़ी के मामले में एक बहुत बड़ा और अहम अपडेट सामने आया है। इस बहुचर्चित प्रकरण की अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा जांच कराई जाएगी। छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने इस बहुचर्चित मामले की जांच सीबीआई से कराने के लिए अपनी औपचारिक सहमति प्रदान कर दी है और इस संबंध में आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना भी जारी कर दी है। इसके साथ ही इस गोरखधंधे में शामिल बीजेपी-कांग्रेस के नेता भी जांच के दायरे में आयेंगे। उन पर भी अब सीबीआई का शिकंजा कसने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। ऐसे मामलों में सीबीआई की भूमिका केवल अपराधियों की पहचान तक सीमित नहीं होती, बल्कि पूरे तंत्र में मौजूद कमियों और संभावित मिलीभगत की भी जांच की जाती है। यह मामला केवल चोरी की जांच का विषय नहीं है, यह जवाबदेही की परीक्षा है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसका निर्धारण होना चाहिए। यदि किसी स्तर पर मिलीभगत हुई है तो उसका भी खुलासा होना चाहिए। और यदि निगरानी प्रणाली विफल रही है तो उस विफलता की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। लोकतांत्रिक शासन में सबसे बड़ी समस्या अपराध नहीं, बल्कि अपराध के बाद जिम्मेदारी से बचने की संस्कृति होती है।
●आर्थिक अपराध की उच्च श्रेणी में आता है लोहा चोरी का मामला
भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) से करोड़ों रुपये मूल्य के लोहे और स्क्रैप की कथित चोरी का मामला केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह देश के सार्वजनिक उपक्रमों की सुरक्षा व्यवस्था, जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करता है। यदि इतने बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान से लंबे समय तक व्यवस्थित तरीके से लोहा और स्क्रैप बाहर जाता रहा, तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं निगरानी तंत्र में गंभीर खामियां मौजूद थीं। हाल के वर्षों में सामने आए इस प्रकार के मामलों ने यह आवश्यकता और भी बढ़ा दी है कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष और व्यापक जांच हो तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। किसी भी बड़े औद्योगिक संयंत्र में स्क्रैप और उपयोगी धातु सामग्री का प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया होती है। यदि चोरी का नेटवर्क लंबे समय तक सक्रिय रहा हो, तो यह केवल कुछ व्यक्तियों का मामला नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में अक्सर परिवहन, भंडारण, अभिलेख प्रबंधन तथा निगरानी व्यवस्था के विभिन्न स्तरों की जांच आवश्यक हो जाती है। यही कारण है कि जब किसी प्रकरण में बड़े वित्तीय हित, अनेक पक्षों की संभावित संलिप्तता और व्यापक दस्तावेजी जांच की आवश्यकता होती है, तब स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच की मांग उठती है।
●शिकंजे में होना चाहिए मगरमच्छ के साथ छोटी मछलियां
दावा किया जा रहा है कि पिछले करीब 40 वर्षों में संयंत्र से लगभग 10 हजार करोड़ रुपये मूल्य का लोहा चोरी हो चुका है। इस दावे की वास्तविकता जांच का विषय है, लेकिन यदि इसमें तथ्य है तो यह अपने आप में अत्यंत गंभीर मामला है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इतने लंबे समय तक राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाला कोई संगठित तंत्र सक्रिय रहा, तो उसकी पूरी श्रृंखला अब तक जांच के दायरे में क्यों नहीं आई? क्या पुलिस की जांच केवल चोरी के दौरान पकड़े गए छोटे आरोपियों और वाहनों तक सीमित रही या उन लोगों तक भी पहुंची, जिनके बारे में कथित तौर पर वर्षों से चर्चा होती रही है? सूत्रों का कहना है कि लोहा चोरी से प्राप्त रकम का 04 आईपीएस, 03 आईएएस और 12 राजनेताओं में बंटवारा होता है। गौरतलब है कि इंद्रजीत सिंह ऊर्फ छोटू’ को भिलाई के प्रमुख ट्रांसपोर्ट कारोबारियों में गिना जाता है। वे हैवी ट्रांसपोर्ट कंपनी के डायरेक्टर हैं और कंपनी करीब 1,500 ट्रकों के संचालन से जुड़ी बताई जाती है।
●भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं में दर्ज है मामला
यह आपराधिक प्रकरण भारतीय न्याय संहिता की कई अति गंभीर धाराओं के तहत दर्ज किया गया है, जिनमें मुख्य रूप से धारा 303(2), 317(4), 319(2), 336(3), 338, 340(2), 111, 112, 61(2)(क) तथा 3(5) शामिल हैं। इन सभी धाराओं में संगठित अपराध (ऑर्गेनाइज्ड क्राइम), धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेजों का निर्माण और आपराधिक षड्यंत्र रचने जैसे गंभीर आरोप संलिप्त हैं। अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से आई सीबीआई की विशेषज्ञ टीम इस पूरे सिंडिकेट और नेटवर्क के अंतरंग पहलुओं की गहराई से जांच-पड़ताल करेगी।
●आशा है निष्कर्ष तक पहुंचेगी जांच
आवश्यक है कि जांच पूरी निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप संपन्न हो। दोषी चाहे किसी भी पद या स्तर का हो, उसके विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, जांच के निष्कर्षों के आधार पर ऐसी व्यवस्थागत सुधारात्मक पहल भी की जानी चाहिए जिससे सार्वजनिक उपक्रमों की संपत्ति सुरक्षित रह सके। बीएसपी से करोड़ों की लोहा चोरी का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की परीक्षा भी है। देश की जनता यह अपेक्षा करती है कि जांच एजेंसियां सत्य को सामने लाएं, दोषियों को कानून के दायरे में लाएं और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी कदम सुनिश्चित किए जाएं। यही किसी भी लोकतांत्रिक और जवाबदेह व्यवस्था की मूल आवश्यकता है।