--राजीव रंजन नाग
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।
मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार से 48 घंटे के अंदर इस्तीफा देने की काक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा समय सीमा तय करने के बाद शनिवार को चुनाव आयोग हरकत में आया। विपक्षा दलों के भारी विरोध प्रर्दशन के बीच भारत निर्वाचन आयोग नॉन-स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न के दौरान पुराने 'फॉर्म 6' का इस्तेमाल करने का ऐलान किया है। साथ ही, IIT/IIIT के एक स्वतंत्र एक्सपर्ट की मदद से ECINET के कामकाज की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाने की घोषणा की और उन वोटर्स के लिए तुरंत एक स्पेशल ड्राइव शुरू करने की भरोसा दिया जिनके नाम SIR के दौरान वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे, ताकि वे अपने नाम दोबारा जुड़वा सकें।
सीईसी ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की बैठक के बाद चुनाव आयोग ने एक प्रेस रिलीज़ में कहा, "SIR के लिए 'फॉर्म 6' के साथ जुड़े डिक्लेरेशन (घोषणा-पत्र) को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। नॉन-SIR अवधि के लिए, नियमों (रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स 1960) के अनुसार लागू होने वाले फ़ॉर्म का ही इस्तेमाल किया जाएगा।"
गौरतलब है कि ये घोषणाएं 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रितिका चोपड़ा की उस रिपोर्ट के बाद आई हैं, जिसमें बताया गया था कि पिछले दस महीनों में संधू और जोशी ने विवादित SIR प्रक्रिया के अलग-अलग पहलुओं पर 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी।
इँडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार इस साल मई में जोशी ने फ़ाइल पर चेतावनी दी थी कि 'फॉर्म 6' में इस तरह से बदलाव नहीं किया जा सकता कि नए वोटर्स के लिए यह बताना ज़रूरी हो जाए कि उनके माता-पिता/दादा-दादी "पिछली SIR वोटर लिस्ट" में शामिल हैं या नहीं। 'फॉर्म 6' में बदलाव से लेकर SIR में वोटर के नाम हटाने की अपीलों तक, 3 में से 2 चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार आपत्ति जताई है।
हालांकि जोशी ने कहा था कि सरकार द्वारा नियमों में संशोधन किए बिना 'फॉर्म 6' में बदलाव नहीं किया जा सकता और संधू भी इससे सहमत थे, फिर भी यह बदलाव कर दिया गया।
संधू ने 13 अगस्त को रिकॉर्ड पर यह बात रखी थी कि यह कदम "अनाधिकृत और गैर-कानूनी" था और इसे "तुरंत हटाया जाना चाहिए"। हालांकि, यह सवाल अभी भी फॉर्म 6 का हिस्सा बना हुआ है।
शनिवार की बैठक के बाद, ECI ने यह भी बताया कि जो वोटर वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो पाए हैं, उनके मामले में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) खुद उनके घर जाकर डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा करेंगे। उन्हें सुनवाई के लिए इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर/असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO/AERO) के ऑफिस नहीं बुलाया जाएगा। साथ ही यह भी कहा गया कि सुनवाई सिर्फ़ खास हालात में ही होगी और वह भी ज़्यादातर ऑनलाइन होगी।
आयोग ने कहा, "अगर किसी व्यक्ति को चल रहे SIR के दौरान अनमैप्ड होने या लॉजिकल गड़बड़ियों की वजह से नोटिस भेजा गया है, तो BLO ऐसे लोगों के घर जाकर डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा करेंगे और फिर उन्हें ERO के फ़ैसले के लिए ECINet पर अपलोड करेंगे। ऐसे लोगों को सुनवाई के लिए ERO/AERO ऑफिस बुलाने की ज़रूरत नहीं है। वह भी ज़्यादातर ऑनलाइन होगी। अगर ज़रूरत हो, तो वोटर अपनी जगह सुनवाई में शामिल होने के लिए परिवार के किसी भी बालिग सदस्य को अधिकृत कर सकता है। ऑनलाइन सुनवाई की सुविधाओं को और बेहतर बनाया जाएगा।"
इसके अलावा, आयोग ने घोषणा की कि सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर (DEC) की अध्यक्षता में एक कमेटी, जिसमें IIT/IIIT का एक स्वतंत्र एक्सपर्ट भी शामिल होगा, ECINET की समीक्षा करेगी ताकि "यह पक्का किया जा सके कि यह एक्ट और नियमों के प्रावधानों का पालन करता है। यह कदम अखबार की रिपोर्ट के दूसरे हिस्से के सामने आने के बाद उठाया गया है, जिसमें पता चला था कि गोवा में 97 वोटरों ने राज्य चुनाव आयोग के पास ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से अपना नाम हटाए जाने को सफलतापूर्वक चुनौती दी थी, लेकिन आयोग के सॉफ़्टवेयर सिस्टम उन्हें फ़ाइनल वोटर लिस्ट में शामिल करने में नाकाम रहे।
आयोग ने दिल्ली में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समय-सीमा 30 अक्टूबर, 2026 तक और नोटिस, दावों व आपत्तियों के निपटारे की समय-सीमा 30 नवंबर तक बढ़ा दी है। इसके अलावा, महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मिले अनुरोध के अनुसार, राज्य में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समय-सीमा 12 अक्टूबर, 2026 तक और महाराष्ट्र में नोटिस, दावों व आपत्तियों के निपटारे की समय-सीमा 10 नवंबर, 2026 तक बढ़ा दी गई है।
अपने दो चुनाव आयुक्तों की नाराजगी कम करने के लिए आयोग ने भरोसा दिया है कि आयोग की सभी बैठकों के लिए एजेंडा पहले से जारी किया जाएगा और बैठक का विवरण (मिनट्स) भी जारी किया जाएगा। साथ ही, आयोग के अधिकारियों को आयुक्तों द्वारा दिए गए सभी निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाएगा। चुनाव आयोग द्वारा अब तक इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था या नहीं?
आयोग ने अपने अंदर मतभेद की खबरों को कम करने के लिए सभी सदस्यों की मीटिंग की और अपने कामकाज के बारे में आरोपों पर पॉइंट-बाय-पॉइंट सफाई जारी की। चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार और इलेक्शन कमिश्नर सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शनिवार दोपहर नई दिल्ली के निर्वाचन सदन में मिले। साथ में एक टेबल पर तीनों की एक फोटो भी पोस्ट किया गया जिसमें कहा गया था कि वे 26 सितंबर को दोपहर 3 बजे मिले थे, यह उस विवाद के बीच हुआ था जब एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि संधू और जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों और ऑर्डर पर कई बार आपत्ति जताई थी। पहले एक फौरी जवाब में, आयोग ने तर्क दिया था कि अंदरूनी मतभेद उसके डेमोक्रेटिक कामकाज का हिस्सा हैं।
आयोग ने गोवा के उन 97 वोटरों के मामले पर बात की, जिनके नाम वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो पाए थे। के हवाले से कहा गया है कि गोवा के मुख्य चुनाव अधिकारी ने बूथ लेवल अधिकारियों की मदद से इन 97 वोटरों में से 81 ने नाम शामिल करवाने के लिए पहले ही 'फॉर्म 6' भर दिया था। आयोग ने अपने कामकाज को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय भी बताए। अब आयोग की सभी बैठकों का एजेंडा पहले ही बांटा जाएगा और बैठक की कार्यवाही का ब्योरा (मिनट्स) जारी किया जाएगा। आयोग ने कहा कि अधिकारियों को कमिश्नरों की तरफ से दिए गए निर्देशों का पूरी सख्ती से पालन किया जाएगा।
आयोग के ताज़ा बयान में अंदरूनी चर्चाओं और औपचारिक फैसलों के बीच अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की गई है। आयोग का कहना है कि SIR समेत उसके सभी अहम फैसले सामूहिक रूप से और सर्वसम्मति से लिए गए थे।