--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■संसदीय मर्यादा के शिखर पुरुष रहे हैं कमलनाथ
■राजनेताओं की अमर्यादित होती शैली से संकट में भारतीय राजनीति
■नेहरू जी, इंदिरा जी और अटल जी जैसे नेताओं से सीख लेने की जरूरत
लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं है, बल्कि यह संवाद, सहमति और सबसे बढ़कर 'मर्यादा' का नाम है। कमलनाथ का पूरा जीवन इसी मर्यादा को स्थापित करने और उसे जीने का एक जीवंत दस्तावेज रहा है। चाहे देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा हो, केंद्रीय मंत्रिमंडल की अहम जिम्मेदारियाँ हों, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का पद हो या फिर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका। उन्होंने हर दायित्व को जिस शिष्टता और गंभीरता से निभाया, वह आज की पीढ़ी के लिए एक महान सीख है। एक दौर था जब संसद और विधानसभाओं में पक्ष और विपक्ष के बीच केवल तीखी बहसें नहीं होती थीं, बल्कि वैचारिक मंथन होता था। विषय विशेषज्ञ अपनी बात पूरी गहराई से रखते थे। कमलनाथ इसी गौरवशाली परंपरा के एक मजबूत स्तंभ रहे हैं। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि विपक्ष का काम केवल विरोध करना नहीं, बल्कि जनकल्याण के मुद्दों पर सरकार को सही राह दिखाना और स्वस्थ चर्चा के जरिए देशहित में रास्ते निकालना है। उनके कार्यकाल में सदन केवल हंगामे का केंद्र नहीं, बल्कि जन सरोकारों के फैसलों की कर्मभूमि हुआ करता था। एक कुशल प्रशासक और राजनेता के रूप में उन्होंने हमेशा माना कि नीतियां बनाने के लिए गंभीर चिंतन और व्यापक संवाद की जरूरत होती है। उन्होंने सदन में रहते हुए हमेशा यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि हर बिल, हर बजट और हर नीति पर खुलकर बातचीत हो, ताकि जनता के हित के फैसलों को सही दिशा मिल सके। आज के नेताओं को नेहरू जी, इंदिरा जी और अटल जी जैसे नेताओं से सीख लेने की जरूरत है। जिन्होंने हमेशा लोकतंत्र की मर्यादाओं का सम्मान किया और लोकतंत्र की परिभाषा को सारगर्भित किया।
●एक दूरदर्शी सोच, जो हमेशा जनता के साथ रही
कमलनाथ की राजनीति का सबसे खूबसूरत पहलू ही यही रहा कि उनके लिए राजनीति कभी व्यक्तिगत शह-मात का खेल नहीं रही। उनकी सोच हमेशा इस बात पर केंद्रित रही कि व्यवस्था का आखिरी पहिया भी घूमना चाहिए और उसका लाभ आम जनता तक पहुँचना चाहिए।
●वक्त की पुकार: फिर से लौटानी होगी वह गरिमा
कमलनाथ का संसदीय सफर हमें याद दिलाता है कि सत्ता आती-जाती रहती है, पद बदलते रहते हैं, लेकिन जो मर्यादा एक नेता सदन में स्थापित करता है, वह इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए अमर हो जाती है। आज के बदलते और बिखरते संसदीय मूल्यों के बीच, कमलनाथ का व्यक्तित्व एक रोशनी की तरह है।
●दलगत राजनीति से ऊपर कमलनाथ से मार्गदर्शन की दरकार
आज की इस बिखरी हुई और वैचारिक रूप से बंटी हुई राजनीति में कमलनाथ एक ऐसे वटवृक्ष की तरह हैं, जिनकी छत्रछाया में हर दल का नेता खुद को सुरक्षित और समृद्ध महसूस कर सकता है। आज के दौर के जनप्रतिनिधियों- चाहे वे कांग्रेस के उभरते हुए युवा चेहरे हों या फिर भारतीय जनता पार्टी के सांसद और विधायक, सभी को दलगत राजनीति की सीमाओं से ऊपर उठकर कमलनाथ से व्यक्तिगत रूप से संपर्क करना चाहिए, उनसे मिलना चाहिए और उनके पास बैठकर देशसेवा का ककहरा सीखना चाहिए। एक ऐसा राजनेता जिसने दशकों तक दिल्ली के सत्ता गलियारों से लेकर मध्य प्रदेश की माटी तक को बहुत करीब से देखा है, उनके पास अनुभवों का वह अनमोल खजाना है जिसे किसी किताब में नहीं पढ़ा जा सकता। आज की युवा पीढ़ी के नेताओं को उनसे सीखना चाहिए कि कैसे धुर विरोधी विचारधारा के होने के बावजूद सदन में मर्यादा और शालीनता बनाए रखी जाती हैं। भाजपा के भी जनप्रतिनिधियों को उनके प्रशासनिक चातुर्य और जनकल्याणकारी नीतियों के क्रियान्वयन की कला से सीख लेकर देशहित में अपनी सोच को और अधिक व्यापक और समृद्ध बनाना चाहिए। आखिरकार, लोकतंत्र की असली खूबसूरती यही है कि जब बात राष्ट्र निर्माण और जनता के कल्याण की हो, तो वरिष्ठों का अनुभव ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी बनता है। कमलनाथ का द्वार हमेशा हर उस व्यक्ति के लिए खुला मार्गदर्शन है, जो मर्यादा, विकास और जनहित की राजनीति को आगे ले जाना चाहता है। आज की युवा पीढ़ी और वर्तमान जनप्रतिनिधियों को उनके जीवन से यह सीखना बेहद जरूरी है कि लोकतंत्र में बहस की अपनी एक मर्यादा होती है और उस मर्यादा को बनाए रखकर ही हम वास्तव में जनता की सेवा कर सकते हैं। "सदन सिर्फ दीवारों और कुर्सियों से नहीं बनता, वह वहाँ बैठे नेताओं के आचरण और मर्यादा से जीवंत होता है। कमलनाथ ने उस जीवंतता को हमेशा संजोकर रखा है।
●आज का कड़वा सच: शोर के बीच सिसकती मर्यादाएँ
आज जब हम देश की विधानसभाओं और संसद के सत्रों को देखते हैं, तो एक अजीब सी कसक महसूस होती है। आजकल सदन के सत्र बहुत छोटे होते जा रहे हैं और जो होते भी हैं, वे चर्चा के बजाय हंगामे और व्यक्तिगत हमलों की भेंट चढ़ जाते हैं।
•बौद्धिक विमर्श का अभाव: पहले विपक्ष सरकार की नीतियों से सीखता था और सरकार विपक्ष के रचनात्मक सुझावों का सम्मान करती थी। आज यह स्वस्थ परंपरा लगभग खत्म सी हो गई है।
•जनता की गाढ़ी कमाई का नुकसान: यह सोचना बेहद चिंतनीय है कि जनता के जिस पैसे से ये सत्र चलते हैं, वह बिना किसी ठोस फैसले या चर्चा के सिर्फ शोर-शराबे में बह जाता है। जब सत्रों में सार्थक चर्चा ही नहीं होगी, तो जनता के हित के कानून और नीतियां कैसे बनेंगी?