--विजया पाठक
एडिटर -जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■दांव पर लगी बीजेपी और कांग्रेस की साख
■कहीं, बीजेपी में मचे घमासान का फायदा न ले जाये कांग्रेस
■उम्मीदवार चयन में बीजेपी को समझना होगा क्षेत्र का मिजाज
■नरोत्तम मिश्रा के नाम पर बन सकती है आपसी सहमति
■दतिया को बचाना है तो बीजेपी को लगाना होगा नरोत्तम पर दांव
दतिया उपचुनाव का ऐलान होते ही कांग्रेस और बीजेपी में उम्मीदवारी चयन की हलचल तेज हो गई है। इस चुनाव में दोनों पार्टियां की साख दांव पर लगी है। दतिया विधानसभा उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रदेश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों- भाजपा और कांग्रेस की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। दोनों दल इस चुनाव को आगामी राजनीतिक समीकरणों और जनमत की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मुकाबला मान रहे हैं। भाजपा के लिए यह चुनाव सत्ता में रहते हुए अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं, संगठनात्मक मजबूती और सरकार के प्रति जनता के विश्वास की परीक्षा है। पार्टी पूरी ताकत के साथ मैदान में है और प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से लेकर स्थानीय संगठन तक मतदाताओं को साधने में जुटा है। यदि भाजपा यह सीट बरकरार रखती है तो यह सरकार की नीतियों पर जनता की मुहर मानी जाएगी। वहीं कांग्रेस इस उपचुनाव को सत्ता विरोधी माहौल और स्थानीय मुद्दों को भुनाने के अवसर के रूप में देख रही है। कांग्रेस जहां मौजूदा विधायक राजेन्द्र भारती को अयोग्य घोषित करने की सहानुभूति पर आश्वस्त है फिलहाल तो दतिया में उम्मीदवार घोषित करने की कशमकश हो रही है। हालांकि दोनों पार्टियों में दावेदारों की लंबी सूची है। यहां पार्टियों को फैसला करना है कि वह किस नेता पर दांव लगाती है। कांग्रेस का प्रयास है कि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को चुनावी केंद्र में लाकर मतदाताओं का समर्थन हासिल किया जाए। कांग्रेस के लिए जीत न केवल संगठन में नई ऊर्जा का संचार करेगी, बल्कि आगामी चुनावों के लिए कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ाएगी।
दतिया का राजनीतिक इतिहास भी इस मुकाबले को रोचक बनाता है। यहां जातीय और सामाजिक समीकरणों के साथ स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता चुनाव परिणाम पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। यही कारण है कि दोनों दल बड़े नेताओं की सभाओं के साथ-साथ बूथ स्तर तक संपर्क अभियान चला रहे हैं। इस उपचुनाव का परिणाम केवल विधायक चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। जीतने वाले दल को राजनीतिक बढ़त और नैतिक बल मिलेगा, जबकि हारने वाली पार्टी को अपनी रणनीति और संगठन पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। इसलिए दतिया की जनता का फैसला प्रदेश की राजनीति में दूरगामी संदेश देने वाला माना जा रहा है। स्पष्ट है कि दतिया उपचुनाव में मुकाबला केवल दो प्रत्याशियों के बीच नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक विश्वसनीयता, संगठनात्मक क्षमता और जनाधार की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। अब सभी की निगाहें मतदाताओं के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि दतिया से निकलने वाला संदेश मध्य प्रदेश की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा।
●बीजेपी से नरोत्तम मिश्रा प्रमुख दावेदार
बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा दतिया से प्रमुख दावेदार हैं। लगभग तय माना जा रहा है कि बीजेपी मिश्रा को ही टिकट देने वाली है। मिश्रा की दावेदारी की कई अहम पहलू भी है। क्योंकि नरोत्तम दतिया के सर्वमान्य और कद्दावर नेता हैं और इस क्षेत्र को बीजेपी का गढ़ बनाया है। 2023 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा बेहद कड़े मुकाबले में कांग्रेस के राजेन्द्र भारती से चुनाव हार गए थे। मिश्रा की क्षेत्र में मजबूत पकड़ को देखते हुए पार्टी उन्हें फिर से मैदान में उतारने का मन बना चुकी है। यदि वे यह चुनाव जीतते हैं, तो उनकी मध्य प्रदेश की सत्ता में एक बार फिर धमाकेदार वापसी तय मानी जा रही है। पार्टी हाईकमान उनके नाम पर असहमत नहीं हो सकती है। बीजेपी की वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए नरोत्तम ही वह चेहरा है जो बीजेपी को जिता सकता है। हालांकि बीजेपी के और भी कई दावेदार हैं। लेकिन नरोत्तम के मुकाबले कोई नही है। यदि दतिया की सीट लौटानी है तो पार्टी को नरोत्तम मिश्रा पर दांव लगाना ही होगा।
●कांग्रेस से संभावित नामों में अनुज भारती प्रमुख
प्रत्याशी चयन में कांग्रेस को काफी माथापच्ची करनी पड़ रही है। हालांकि माना जा रहा है कि कांग्रेस राजेंद्र भारती के बेटे अनुज भारती प्रमुख दावेदार हैं। वहीं अन्य संभावित उम्मीदवारों में घनश्याम सिंह और अवधेश नायक के नाम चर्चा में हैं। अनुज भारती का नाम इसलिए और अहम है क्योंकि कांग्रेस सहानुभूति का फायदा लेना चाहेगी। लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि दतिया का उपचुनाव कांग्रेस के लिए अपनी साख बचाने का दवाब जरूर रहेगा। वहीं प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के कार्यकाल का दूसरा उपचुनाव है। जिसमें उनकी साख भी दांव पर लगी है। वर्तमान परिदृष्य देंखे तो कांग्रेस में भी गुटबाजी चरम पर है।