'पासपोर्ट' नागरिकता साबित करने का दस्तावेज नहीं है..



--राजीव रंजन नाग
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।

36 या 60 पन्नों की एक छोटी (पॉकेट-साइज़) बुकलेट। मज़बूत कपड़े जैसे मटीरियल से बने नेवी ब्लू, सफ़ेद या मैरून रंग के कवर के बीच में सुनहरे रंग में राष्ट्रीय प्रतीक छपा होता है। पहले पन्ने पर इसे रखने वाले की पहचान - उनका नाम और राष्ट्रीयता - लिखी होती है। यह पासपोर्ट है और अब तक कई लोग मानते थे कि यह इसे रखने वाले को भारतीय नागरिक के तौर पर पहचान देता है। लेकिन अब सरकार ने कहा है कि ऐसा नहीं है, कम से कम कानूनी तौर पर तो नहीं। इस बात ने इसके मक़सद, कानूनी स्थिति और आम चलन को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि पासपोर्ट 'सिर्फ़ यात्रा के लिए एक दस्तावेज़' है और इसे नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता। अधिकारी ने ज़ोर देकर कहा कि इसे जारी करने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को भारतीय नागरिकों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। नागरिकता दस्तावेज को लेकर एक्स (ट्विटर) पर गंभीर और व्यंग्यात्मक ट्वीट की बाढ़ आ गई। कई लोगों ने कहा कि पासपोर्ट सिर्फ़ भारत सरकार ही जारी करती है, वह भी पूरी तरह से बैकग्राउंड की जाँच-पड़ताल के बाद - जिसमें व्यक्ति के रहने की जगह का पुलिस द्वारा भौतिक सत्यापन भी शामिल है - और यह असल में इसे रखने वाले की पहचान एक भारतीय के तौर पर करता है।

अवार्ड-विनिंग गीतकार जावेद अख्तर ने मंत्रालय के इस रुख को "बेतुका" बताया और सवाल उठाया कि अगर सरकार को इस बात का यकीन नहीं है कि पासपोर्ट रखने वाला असल में भारतीय नागरिक है, तो वह पासपोर्ट जारी ही क्यों करती है। शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने भी सरकार से ऐसे ही सवाल पूछे। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या सरकार का यह रुख - कि पासपोर्ट गैर-भारतीयों को भी जारी किया जा सकता है - इस दस्तावेज़ पर दूसरे देशों के भरोसे को कम कर सकता है।

....और दूसरों ने उन सरकारी आईडी की लिस्ट गिनाई जिन्हें अब नागरिकता के सबूत के तौर पर नहीं माना जाता, जिनमें आधार और चुनाव आयोग का वोटर कार्ड शामिल है; इन दोनों को ही राज्य की वोटर लिस्ट में दोबारा सत्यापन के लिए वोटरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने से मना कर दिया गया था। पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिबल भी उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने पूछा कि फिर नागरिकता का सबूत कौन सा दस्तावेज़ है। लेकिन क्या पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है? नहीं। क्योंकि सरकारी सूत्रों ने गुरुवार को बताया कि यह "कभी भी" ऐसा नहीं रहा है। केंद्र सरकार के एक अन्य सीनियर अधिकारी ने कहा-सरकार नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन लाने की तैयारी में है, जिन्हें संसद के आगामी मॉनसून सत्र में पेश किया जाएगा। ऐसे में, प्रस्तावित बदलावों से जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर गहराई से और आलोचनात्मक नज़रिए से विचार करने की ज़रूरत है। पासपोर्ट जारी करने से जुड़े 1967 के कानून का ज़िक्र करते हुए, सूत्रों ने बताया कि तकनीकी रूप से ये दस्तावेज़ गैर-नागरिकों को भी दिए जा सकते हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2013 के एक फ़ैसले में यही बात कही थी कि क्योंकि कानून गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी करने की इजाज़त देता है, इसलिए सिर्फ़ पासपोर्ट का होना नागरिकता का 'पक्का' या 'अंतिम' सबूत नहीं माना जा सकता।

विदेश मंत्रालय के सीनियर अधिकारी ने यह भी बताया गया कि नागरिकता का मामला अभी भी एक पुराने कानून - नागरिकता अधिनियम, 1955 - के तहत आता है। सूत्रों के मुताबिक, इसी कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति तय करने के लिए किया जाता है। पूर्व राजनयिक निरुपमा मेनन राव ने इस विवाद को समझाते हुए एक लंबी और विस्तृत पोस्ट लिखी और बताया कि कैसे "कानून और लोगों की समझ हमेशा एक जैसी नहीं होती"। राव ने पासपोर्ट अधिनियम और नागरिकता अधिनियम के बीच का अंतर बताया और कहा, "एक कानून दस्तावेज़ को नियंत्रित करता है; दूसरा कानूनी स्थिति को।" यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

नागरिकता देने और उससे जुड़े नियम उन मानदंडों पर आधारित होते हैं जो पासपोर्ट जारी करने के मानदंडों से कहीं ज़्यादा व्यापक होते हैं। पासपोर्ट का संबंध केवल यात्रा के दौरान अधिकारों की सुरक्षा और विदेशी आव्रजन अधिकारियों को यह दिखाने से होता है कि पासपोर्ट धारक वही व्यक्ति है जिसका वह दावा कर रहा है। सबसे अहम बात यह है कि पासपोर्ट सरकार की संपत्ति होता है और इसे ज़ब्त किया जा सकता है, जबकि नागरिकता छीनी नहीं जा सकती - कम से कम तब तो नहीं जब तक व्यक्ति खुद इसे न छोड़ दे।

ताजा समाचार

National Report




Image Gallery
इ-अखबार - जगत प्रवाह
  India Inside News