टीकाकरण : कथनी और करनी में फर्क



हावड़ा-पश्चिम बंगाल।

कोरोना काल जारी हैं। कोरोना के हर एक वेरिएंट को दबोचने के लिए टीकाकरण अहम किरदार निभा रहा है। 21 जून 2021 से 18 वर्ष से ऊपर यानि देश के नव युवाओं या मतदाताओं के लिए टीकाकरण नि:शुल्क उपलब्ध कराने की प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी जिसे धरातल पर दिन प्रतिदिन अमल करने का प्रयास जारी है। अन्य निजी केन्द्रों जैसे क्लीनिक, चिकित्सा जांच केंद्रों पर टीका लगवाने के लिए जहाँ विगत दिनों सेवा शुल्क 250 रुपए देने पड़ते थे वही 21 जून से मात्र 150 रुपए हो गये हैं। परन्तु उत्तर हावड़ा विधान सभा क्षेत्र इस महामारी काल में भी इन सेवाओं या सुविधाओं से वंचित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण, एक ओर प्रधानमंत्री की घोषणा के पश्चात आम जनों को इसका लाभ न मिलना वहीं दूसरी ओर केन्द्र सरकार से नि:शुल्क टीके न लेने की मुख्यमंत्री की हठ और पिछले दिनों शिविरों के माध्यम से कूपन आधारित औसत से भी कम लोगों का टीकाकरण, इन राजनताओं के “कथनी और करनी में फर्क” को उजागर करता है।

तत्काल में पश्चिम बंगाल में टीकाकरण शिविर बन्द है। जिसका श्रेय एक फर्जी आईएएस देबांजन देव को जाता है। हाँलाकि शिविर के आयोजन के लिए गृह विभाग से अनुमति की आवश्यकता होगी। फर्जी आईएएस देबांजन देव ने महानगर के विभिन्न क्षेत्रों में फर्जी टीकाकरण शिविर लगवाया। इसने सैकड़ों लोगों के जीवन से खिलवाड़ किया है। बता दें कि फर्जी टीकाकरण के खिलाफ सीबीआइ जांच की मांग को लेकर तीन अलग अलग जनहित याचिका दायर की गयी जिसे उच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया। जग-जाहीर है कि आरोपी फर्जी आइएएस की राज्य की सत्तारुढ़ पार्टी तृणमूल काँग्रेस के नेता व मंत्रियों के साथ तस्वीरें भी उजागर हुई थी। वही दूसरी ओर फर्जी आईएएस देबांजन देव के सुरक्षा कर्मी के साथ महामहिम राज्यपाल जगदीप धनखड़ की तस्वीर भी अखबार के मुख्य पृष्ठ पर देखा गया। तृणमूल के राष्ट्रीय प्रवक्ता व सांसद सुखेन्दु शेखर रॉय ने कुछ ऐसी ही तस्वीरें मीडिया में जारी की थी और आरोप लगाया था कि फर्जी टीकाकरण मामले में राज्यपाल का भी हाथ हो सकता है। हम सभी बखूबी जानते हैं कि दोषारोपण का खेल तो इन राजनीतिक नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार हैं।

फर्जी टीकाकरण को लेकर लोगों में बड़ा रोष है। भरोसा के साथ भरोसा से विश्वासघात हुआ है। जीवन के आस पर मृत्यु को निमंत्रण देने का कुकर्म किया गया है। जो कदापि माफी लायक नहीं है। वहीं हमारे तंत्र की कर्मशैली को उजागर करते हुए आज के डिजिटल इण्डिया में तंत्र की श्रेणी का परिचय भी बता देता है। वैसे कानूनी लिपा-पोती भी जारी है।

सैकड़ों ऐसे लोग हैं जो पहला डोज़ टीका लेने के बाद भी परेशान हैं। कोविन की सूची उन्हें दर्शाती है कि उन्होंने आजतक एक भी टीका नहीं लिया है। परेशानी में भागम-भाग भी जारी है। दूसरा टीका भी नहीं ले सकते। हाँ दूसरे को पहले के स्थान पर ज़रूर प्राप्त कर सकते हैं परन्तु यह कदापि उचित नहीं होगा। यहाँ भी तंत्र दोषी है। टीकाकरण के रेकॉर्ड क्यों गायब हैं? 2 से 3 महीने होने जा रहें हैं। लोग राष्ट्र से लेकर ज़िला स्तर तक शिकायत कर-कर प्रशसन व तंत्र को भरपेट कोस रहे हैं। सुझाव हर जगह से मिला रहा परन्तु समस्या का समाधान नहीं हो रहा। आलम यह है कि कोवैक्सीन के दूसरे डोज़ लेने की अवधि 28 दिनों से 42 दिनों के अंतराल में हैं, लेकिन लोग अर्ध-शतक पार कर दूसरे डोज़ से परे पहले डोज़ के नामांकन, ग्रहण पश्चात पंजीकरण के लिए भ्रांत होकर घूम रहे और संदेहास्पद दृष्टि से देख रहे हैं।

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