होम सेक्रेटरी ने कहा - काहे की 'माफी'? यह तो महज एक परम्परा है...



--राजीव रंजन नाग

नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।

सुप्रीम कोर्ट में अपने खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने माफी मांगते हुए अपना जवाब शुरू किया। लेकिन कुछ घंटों बाद, मंत्रालय ने 'एक्स' (ट्विटर) पर लिखा कि यह माफी कानूनी तौर पर "जरूरी" थी। इससे साफ है कि उन्होंने अदालत में माफी तो मांगी, लेकिन उनका इरादा माफी मांगने का बिलकुल नहीं था।

"कुछ मीडिया रिपोर्टस ने कहा है कि केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने अवमानना नोटिस के जवाब में माननीय सुप्रीम कोर्ट के सामने बिना शर्त माफी मांगी है। इस संबंध में पीआईबी ने सफाई देते हुए कहा है कि - जब भी माननीय सुप्रीम कोर्ट की ओर से अवमानना नोटिस जारी किया जाता है, तो यह जरूरी होता है कि नोटिस का जवाब देने वाला पक्ष अपने हलफनामे की शुरुआत “बिना शर्त” माफी के साथ करे। इसके बाद ही बाकी तथ्य और तर्क पेश किए जाते हैं। हर अवमानना याचिका में इस प्रक्रिया का अनिवार्य रूप से पालन किया जाता है।" मंत्रालय की तरफ से यह साफाई प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) ने दिया।

गौरतलब है कि भारतीय अदालतों (या कहीं भी) में केवल औपचारिकता के लिए माफी मांगने का चलन नहीं है, क्योंकि अदालत के सामने - खासकर अवमानना के मामलों में - माफी मांगने के गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971' (न्यायालय अवमानना अधिनियम) की धारा 12(1) के तहत, अगर अदालत को दी गई माफी संतोषजनक लगती है, तो वह आरोपी को बरी कर सकती है या उसकी सजा कम कर सकती है। माफी न मांगने का उल्टा असर भी हो सकता है। यह आरोपी पर निर्भर करता है कि वह कानूनी कार्यवाही का सामना करना चाहता है या माफी मांगना चाहता है। अगर वह माफी मांगने का फैसला करता है, तो यह अदालत पर निर्भर करता है कि वह क्या सजा तय करे या मामले को खत्म कर दे।

गौरतलब है कि मशहूर कॉमेडियन कुणाल कामरा ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू की गई अवमानना कार्यवाही में माफी मांगने से इनकार कर दिया था। उन्होंने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री का मजाक उड़ाने से जुड़े एक अन्य मामले में भी माफी मांगने से मना कर दिया था। गुरुवार की रिपोर्टों के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में यही तर्क दिया। कहा - यह माफी अवमानना नोटिस के जवाब में अदालत के स्थापित नियमों के तहत मांगी गई थी, जबकि असल में कोई अवमानना हुई ही नहीं थी। मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा कि इसे 'बिना शर्त' माफी नहीं, बल्कि 'शर्त के साथ' मांगी गई माफी माना जाएगा। लेकिन मेहता ने यह भी कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया की रिपोर्टों में गलत तरीके से यह बताया गया कि सरकार ने माफी मांग ली है और उसके पास अपने बचाव में कहने के लिए कुछ नहीं है। हालाँकि, अदालत की अवमानना (कॉनटेम्पट ऑफ कोर्ट) से जुड़े कानून में यह भी कहा गया है कि किसी सच्चे मन से मांगी गई माफी को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि वह किसी शर्त या दायरे के साथ दी गई है। यानी, अवमानना मामले में आरोपी पक्ष को अपनी बात रखने और अपने बचाव में तर्क पेश करने का अधिकार है। इससे माफी की अहमियत कम नहीं हो जाती।

इसी के अनुसार, सरकार ने अदालत में कहा कि 10 अक्टूबर को उठाए गए कदम (सुप्रीम कोर्ट द्वारा यात्रा और इंटरनेट पर पूरी तरह से पाबंदी न लगाने की बात कहने के एक दिन बाद) दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर लिए गए थे और इन्हें "उचित" पाया गया। हालाँकि, कानून में यह जरूरी नहीं है कि जवाब की शुरुआत माफी मांगने से ही हो। फिर भी, मंत्रालय ने पीआईबी के जरिए दिए गए अपने जवाब में कहा: हो सकता है कि केंद्र सरकार इसे एक कानूनी जिम्मेदारी मानकर, बिना किसी खास इरादे के "माफी मांगने की परंपरा" का पालन कर रही हो। इसके बावजूद, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक्स (पीआईबी के माध्यम से) पर अपनी पोस्ट में यह स्वीकार किया है कि केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और अन्य संबंधित अधिकारियों द्वारा दाखिल हलफनामों के पहले पैराग्राफ की शुरुआत अदालत से माफी मांगने के साथ हुई थी।

दिल्ली पुलिस के कामकाज की देखरेख करने वाले गृह मंत्रालय ने कहा, "इसके बाद हलफनामे में विस्तृत जानकारी दी गई है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार और पुलिस द्वारा उठाए गए सभी कदम पूरी तरह से कानून के अनुरूप हैं, और उनके खिलाफ अवमानना का कोई मामला नहीं बनता है।" गुरुवार की सुनवाई की पृष्ठभूमि यह थी कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) (इसकी चेयरपर्सन डी. थारा के जरिए), रेलवे अधिकारियों और दिल्ली ट्रैफिक पुलिस को नोटिस जारी किया था। यह नोटिस एक याचिका के आधार पर जारी किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राजधानी में परिवहन और इंटरनेट सेवाओं पर लगी पाबंदियों को हटाने के 9 अक्टूबर के आदेश का उल्लंघन किया गया है।

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