चारों तरफ क़साई ही खड़े हैं, जाएंगे किधर?



--प्रमोद दुबे
कोलकाता - पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज।

राजा गये, महाराजा गये, राजशाही गई, बादशाहत गई। राज्य गया, सल्तनत गई। लोकतंत्र में शासन-प्रशासन व राजनीति, अपराध से जुड़े लोगों में सामंतवादी सोच उत्पन्न हो चुकी है। बहुसंख्यक जाति के नेताओं की सत्ता या जनप्रतिनिधि निर्वाचित होना जन्मसिद्ध अधिकार है गया है। पति-पत्नी, बेटा-बेटी, बहू, दामाद, साला, बहनोई, चाचा, चाची, चचेरे मौसेरे भाई- बहन, घर के नौकर चाकर, पुरोहित, मुल्ला तक को संसद और विधानसभा में बहुत ही आसानी से भेज दिया जाता है।

भ्रष्टाचार में सजा पाने के बावजूद निर्लज्ज होकर सार्वजनिक मंचों से जनता को संबोधित करने वाले नेताओं की संख्या कोई कम नहीं है। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, इंजिनियरों, कर्मचारियों के पास अकूत संपत्ति है और कुछ के यहां आयकर का छापा भी पड़ता रहता है। अब ये आयकर वाले कौन से दूध के धुए हैं, इनके पास भी अकूत संपत्ति है। साधारण पुलिस कर्मी भी स्वयं को ही संविधान समझता है। धन प्रभावशाली होने का एक मजबूत साधन है।

आश्चर्य गरीब - अमीर एक साथ गांव, मुहल्ले या शहर में रहते हैं। तालाब से पानी निकालने की आजादी है, एक पंप से पानी निकाल रहा है, जबकि दूसरा कटोरी से पानी निकाल रहा है। यह लोकतंत्र है। हत्या, लूटपाट, भ्रष्टाचार, बलात्कार, डकैती कीजिए, धन हो तो तेजतर्रार वकील कीजिए, जमानत शीघ्र ही मिल जाएगी। निर्दोष हैं मुकदमा दर्ज है, पैसे नहीं हैं तो न्याय पाने में जीवन बीत जाएगा। जो जहां है, बस मौका मिल जाए, लूटपाट, मनमानी सबकुछ जायज है। समाज और परिवार काले धन और काली कमाई को सफलता से जोड़कर देखता है। काली कमाई वाले को समाज कोई दंड नहीं देता, उल्टे रिस्तेदारी जोड़ने के लिए पागल बना हुआ है।

ढिंढोरा पीटने से समानता नहीं आएगी, जो दिख रहा है, वह लोकतंत्र की हत्या है। पांच वर्ष के लिए सांसद, विधायक बनकर जीवनभर पेंशन और यहां जीवन भर काम कर भी पांच वर्ष चैन से जीने की गारंटी नहीं है। लाखों कार्यकर्ताओं को अपनी - अपनी पाटीं को जान देते देखते हैं, पर लोकतंत्र की हत्या हो रही है, बचाने के लिए एक भी विरोध का स्वर सुनाई नहीं देता है।

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