• सेाशल मीडिया पर लाखों लोगों ने दी सहमति
• देश में हर साल बीड़ी के सेवन से 6 लाख लोगों की मौत
नई दिल्ली, 5 मई। वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) में बीड़ी को सर्वाधिक टैक्स के स्लेब में रखने के लिए वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व वित मंत्री अरुण जेटली को सोशल मीडियो के जरिए अभियान चलाकर मांग की। इस अभियान में फेसबुक व टविटर का प्रयोग किया गया। वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिम के स्टेट पैटर्न व मैक्स अस्पताल के चेयरमेन डा० हरित चतुर्वेदी ने बताया कि हालांकि बीड़ी लाबी पूरी तरह से सक्रिय हो गई है और वह वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के दायरे से बीड़ी को छूट दिलाने की भरपूर कोशिश कर रही है। देश भर के लोग यह सुनश्चित करना चाहते हैं कि बीड़ी को जीएसटी में करो से छूट नहीं मिलनी चाहिए इसलिए यह अभियान चलाकर प्रधानमंत्री से बीड़ी को जीएसटी में अधिक कर की श्रेणी में रखने की मांग सोशल मीडिया के जरिए रखी गई। इस अभियान के तहत फेसबुक पर 87 हजार 164, वंही 1.3 मिलियन लेागों तक इसकी पहुंच बनी तथा देश के 1474 लेागों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्विट भी किया व 283757 बार इस टवीट को देखा गया। इसके साथ ही जीएसटी में वन टोबेको टैक्स के लिए जो हैसटेग बनाया बनाया गया उसे 7 लाख 12 हजार 239 लोगों ने देखकर अपनी सहमति दी है।
पूर्व रेल मंत्री दिनेश द्विवेदी ने भी इसके लिए प्रधानमंत्री को लिखा है कि बीड़ी को जीएसटी में उच्च कर की श्रेणी में रखा जाये। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बीड़ी से मरने वालों का आंकड़ा है।
इससे पूर्व टाटा मेमोरियल सेंटर के डा० आर.ए. बड़वे ने भी पत्र में भारत में तंबाकू उत्पादों पर कर में जो विसंगतियां है उनको दूर करने के लिए प्रधानमंत्री को लिखा था। उनके साथ ही 108 कैंसर चिकित्सकों ने बीड़ी को जीएसटी में उच्च कर में रखने की मांग की थी। गौरतलब है कि देश में तम्बाकू से होने वाली 12 लाख लोगों की मौतों में से अकेले बीड़ी से 6 लाख लोगों की मौत होती है। भारत में पैदा होने वाले कुल धूम्रपान उत्पादों में बीड़ी का हिस्सा 80 से 90 फीसदी है। देश में सिगरेट की तुलना में बीड़ी आठ गुना अधिक बिकती है। वंही देशभर में 9.2 प्रतिशत लोग बीड़ी तथा 5.7 प्रतिशत लेाग सिगरेट का सेवन करतें है। इससे साफ पता चलता है कि कैंसर से कुल होने वाली मौतों में बीड़ी से मरने वालों की संख्या अधिक है इसलिए जो उत्पाद अधिक मौतों का कारण बन रहे है उसे जीएसटी में कम टैक्स वाली श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है।
वे बतातें है कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पर भरोसा जताया है कि वे बीड़ी सहित अन्य तम्बाकू उत्पादों को जीएसटी में उच्च कर की श्रेणी में रखेंगे क्योंकि बीड़ी के कारण देश में तम्बाकू उत्पादों से होने वाली मौतों का प्रतिशत बहुत ही अधिक है। देश में इस समय एक सिगरेट की तुलना में नौ बीड़ी का सेवन किया जाता है। ऐसे में प्रति वर्ष बीड़ी पीने से 6 लाख लोगों की मौत होती है और ऐसे उत्पाद को जीएसटी में निम्न कर की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के सपने को पूरा करने की दिशा में लोगों तक पहुंचने में सोशल मीडिया सबसे कारगर और सबसे आसान रास्ता है। हाल ही में ट्विटर पर शुरू किए गए अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली से मांग की गई है कि बीड़ी को जीएसटी के तहत अवगुण पदार्थ की श्रेणी में रखा जाए। इस अभियान में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से यह भी मांग की गई कि बीड़ी को जीएसटी के तहत उच्च कर वाली श्रेणी में रखा जाए। कई पेशेवर सदस्यों ने बीड़ी की सच्चाई को उनके समक्ष पेश किए हैं।
उन्होने बताया कि एक अनुमान के अनुसार बीड़ी बनाने के काम में कोई 2.5 लाख बच्चे लगे हुए हैं। बड़ी बनाने में लगे कुल लोगों में करीब 95 प्रतिशत महिलाएं हैं और उनकी हालत हर दृष्टि से बहुत ही दयनीय है। मंगलोर की कंपनी गणेश बीड़ी में बच्चों द्वारा बीड़ी बनाने के काम करवाने के कारण अमेरिका के कस्टम विभाग ने भारत से बीड़ी के आयात पर रोक लगा दी है। अमेरिका के कस्टम विभाग को गणेश बीड़ी में बच्चों से बीड़ी बनवाने के सबूत मिले थे।
’’’एनॉलासिस ऑफ ट्विट’’’ की निदेशक डा० नंदिता मुरुकतुला के अनुसार देश में तम्बाकू सेवन को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका बीड़ी को उच्च कर की श्रेणी में लाना है। उच्च कर उपभोक्ताओं को इसके सेवन से हतोत्साहित करता है और फिर उन्हें इसके सेवन की लत से मुक्ति दिलाता है। भारत में कीमतों की लोचक विश्लेषण से पता चलता है कि कीमतो में 10 फीसदी से बीड़ी सेवन में 9.1 प्रतिशत की कमी आती है।
भारत में कराए गए कई अध्ययनों से यह पता चलता है कि बीड़ी के सेवन से फेफड़ों की बीमारी, कैंसर जैसी अनेक घातक बीमारियां होती हैं। बीड़ी पीने वालों की धूम्रपान न करने वाले की तुलना में दस साल पहले ही मौत हो जाती है। वर्ष 2011 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार तम्बाकू उत्पादों से होने वाली बीमारियों पर 104500 करोड़ रूपये खर्च आए। वर्ष 2011 में यह सकल घरेलू (जीडीपी) का 1.16 प्रतिशत और केन्द्र तथा राज्यों द्वारा स्वाथ्य की देखभाल पर किए जाने वाले खर्च का 12 प्रतिशत से अधिक है। वित्तीय वर्ष 2011-12 में कुल तम्बाकू उत्पादों से, तम्बाकू से होने वाली बीमारियों पर अनुमानित खर्च का केवल 17 प्रतिशत ही केन्द्रीय उत्पाद राजस्व के रूप में प्राप्ति हुई। ऐसे में अवगुण पदार्थ के रूप में तम्बाकू उत्पाद से आर्थिक रूप से भी राजस्व प्राप्ति की तुलना में नुकसान बहुत अधिक है।