02 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
(●) राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 की प्रक्रिया में विविध हितधारकों के साथ विस्तृत विचार विमर्श, क्षेत्रीय परामर्श, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण को केंद्रीय परिषद और मंत्रियों के समूह के अनुमोदन की आवश्यकता पर बल दिया गया है। नीति में 2025 तक जन स्वास्थ्य व्यय को उत्तरोत्तर जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाने की परिकल्पना की गई है। राज्य सरकारों से स्वास्थ्य के लिए उनके बजट परिव्यय को बढ़ाने का भी अनुरोध किया गया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 को लागू करने के लिए एक प्रारूप क्रियान्वयन ढांचा भी तैयार किया गया है। सरकार ने स्वास्थ्य नीति को लागू करने हेतु सभी संबंधित प्राधिकारियों से भी अनुरोध किया है।
देश के नागरिकों विशेषकर गरीबों कों वहनीय स्वास्थ्य परिचर्या सेवाएं प्रदान करने के लिए सरकार ने अनेक कदम उठाये हैं जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित शामिल हैं:-
· सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में अनिवार्य औषधियां और निदान नि:शुल्क प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन नि:शुल्क औषध एवं नि:शुल्क नैदानिक पहल का कार्यान्वयन।
· जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम का कार्यान्वयन तथा संशोधित राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम जैसे कार्यक्रमों का कार्यान्वयन करना, जहां क्षयरोगियों, एचआईवी, वेक्टर जनित रोगों के रोगियों को नि:शुल्क उपचार प्रदान किया जाए।
· व्यापक प्राथमिक परिचर्या प्रदानगी तथा प्रचारात्मक व स्वास्थ्य संवर्धन कार्यकलाप करने के लिए उप-स्वास्थ्य केन्द्र/पीएचसी को स्वास्थ्य एवं आरोग्य केन्द्रों में बदलने का निर्णय।
· उच्च रक्त चाप, मधुमेह तथा मुख, गर्भाशय व स्तन कैंसर के 5 सामान्य गैर संचारी रोगों की जांच व प्रबंधन।
· जिला अस्पतालों में गरीबों के लिए नि:शुल्क डायलिसिस सेवाओं हेतु प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम।
· अस्पतालों के सुदृढ़ीकरण, राज्यों में एम्स संस्थाओं की स्थापना और पूरे देश में मौजूदा सरकारी चिकित्सा कॉलेजों के उन्नयन के जरिए सरकारी क्षेत्र में तृतीयक स्वास्थ्य परिचर्या सेवाएं उपलब्ध करवाना।
· राज्य सरकारों के सहयोग से “जन औषधि स्कीम” के अंतर्गत सभी के लिए वहनीय मूल्यों पर गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाइयां उपलब्ध करवाना।
· राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, जिसमें परिवार फ्लोटर आधार पर स्मार्ट कार्ड आधारित नकद रहित स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाता है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल द्वारा राज्य सभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) स्थानीय भाषाओं में जेनेरिक दवाइयों का नुस्खालिखा जाना
भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (एमसीआई) ने केंद्र सरकार के पूर्व अनुमोदन से, अधिसूचना के माध्यम से भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर आचरण, शिष्टाचारऔर नीति) विनियम, 2002 के खंड 1.5 में एक संशोधन अधिसूचित किया है जिसमें निर्धारित किया गया है कि ‘प्रत्येक चिकित्सक द्वारा पठनीय और जहां तक संभव हो अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में जेनरिक नाम से औषधियों का नुस्खा लिखा जाना चाहिए और उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि औषधियों का नुस्खा एवं प्रयोग युक्तिसंगत हो।’
अधिकतम खुदरा मूल्य से अधिक कीमत पर औषधियों को न बेचा जाना सुनिश्चित करने के लिए फार्मास्युटिकल विभाग के तहत राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, [डीपीसीओ], 2013 के तहत अधिसूचित औषधियों की कीमतों की प्रभावी ढंग से निगरानी कर रहा है ताकि आम लोगों को अधिसूचित अधिकतम मूल्य और लागू करों पर ये फार्मूलेशन उपलब्ध हो सकें। राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) राज्य औषधि नियंत्रकों/व्यक्तियों से प्राप्त सूचना, खुले बाजार से खरीदे गए नमूनों और बाजार आधारित आंकड़ों से प्राप्त रिपोर्टों और ‘फार्मा जन समाधान’ तथा ‘केन्द्रीकृत जन शिकायत निवारण तथा निगरानी प्रणाली (सीपीजीआरएएमएस)’ जैसी शिकायत निवारण वेबसाइटों के माध्यम से प्राप्त शिकायतों के आधार पर उपभोक्ताओं से अधिक कीमत लेने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करता है। गैर- अधिसूचित फार्मूलेशन हेतु अनुमत सीमा से अधिक कीमतों में वृद्धि की निगरानी भी बाजार के आंकड़ों और व्यक्तियों से प्राप्त शिकायतों के आधार पर की जाती हैं।
भारतीय चिकित्सा परिषद ने दिनांक 21.04.2017, 22.11.2012 तथा 18.01.2013 के अपने परिपत्र के माध्यम से यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि सभी चिकित्सकों को जेनेरिक नामों से औषधियों का नुस्खा लिखना चाहिए। तथापि, अभी तक क्षेत्रीय भाषाओं में नुस्खा लिखने के संबंध में कोई दिशा-निर्देश नहीं है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल के द्वारा राज्य सभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) भारत में लगभग 8000 मेगावाट ज्वारीय ऊर्जा की अनुमानित क्षमता : आर• के• सिंह
विद्युत तथा नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राजकुमार सिंह ने राज्य सभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, चेन्नई द्वारा क्रिसिल (क्रेडिट रेटिंग इंफॉरमेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) रिस्क एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सोल्यूशन लिमिटेड के सहयोग से किए गए अध्ययन के अनुसार देश में ज्वारीय ऊर्जा की अनुमानित क्षमता लगभग 8000 मेगावाट है जिसमें से 7000 मेगावाट खंबात की खाड़ी, 1200 मेगावाट गुजरात में कच्छ की खाड़ी में तथा पश्चिम बंगाल के सुन्दर वन में गांगेये डेल्टा में 100 मेगावाट है।
राजकुमार सिंह ने कहा कि ‘स्टडी ऑन टाइडल एंड वेब एनर्जी इन इंडिया: सर्वे ऑन द पोटेंशियल एंड प्रोपोजिशन ऑफ ए रोडमैप’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट वेबसाइट www.ireda.gov.in पर उपलब्ध है।
श्री सिंह ने बताया कि प्रति मेगावाट 30 करोड़ रुपये से 60 करोड़ रुपये के बीच उच्च पूंजी लागत के कारण ज्वारीय ऊर्जा का वाणिज्यिक आधार पर फिलहाल शोधन नहीं किया जा सकता है।
(●) खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण वाले दो शैक्षिक अनुसंधान संस्थान- कुंडली, हरियाणा स्थित राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान (एनआईएफटीईएम) और तंजावुर, तमिलनाडु स्थित भारतीय खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी (आईआईएफपीटी)- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में कुशल श्रमिकों की उपलब्धता बढ़ाने तथा स्वदेशी तकनीक का विकास करने के उद्देश्य से शिक्षा प्रदान कर रहे हैं तथा खाद्य प्रसंस्करण तकनीक में अनुसंधान कर रहे हैं।
एनआईएफटीईएम का गठन देश के संस्थानों तथा विदेशी संस्थानों के मध्य सहयोग और नेटवर्किंग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया था। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में विश्व स्तरीय अभ्यासों का उपयोग, लघु अवधि के पाठ्यक्रम तथा अनुसंधान और शिक्षण पर बल देते हुए प्रबंधन पाठ्यक्रम संस्थान के उद्दश्यों में शामिल हैं। एनआईएफटीईएम खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एकीकृत अनुसंधान, शिक्षण व उद्यमिता के केंद्र के रूप में कार्य करता है। संस्थान के द्वारा 2012-13 से निम्नलिखित स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
(1) बीटेक (खाद्य प्रौद्योगिकी प्रबंधन)
(2) एम.टेक- पांच पाठ्यक्रमों में: -
(ए) खाद्य प्रक्रिया इंजीनियरिंग और प्रबंधन,
(बी) खाद्य संरक्षा और गुणवत्ता प्रबंधन,
(सी) खाद्य प्रौद्योगिकी और प्रबंधन,
(डी) खाद्य आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन,
(ई) खाद्य संयंत्र संचालन प्रबंधन।
इसके अतिरिक्त संस्थान ने 2013-14 से पांच स्नातकोत्तर विभागों में पीएचडी कार्यक्रम शुरू किया है। इसने दोहरी विशेषज्ञता के साथ एमबीए पाठ्यक्रम की शुरूआत की है। (I) अनिवार्य: खाद्य और कृषि व्यवसाय प्रबंधन, (II) वैकल्पिक: शैक्षिक वर्ष 2016-17 में विपणन/ वित्त / अंतर्राष्ट्रीय व्यवसाय में से कोई एक।
आईआईएफपीटी 60 स्नातक तथा 30 स्नातकोत्तर छात्रों को खाद्य प्रक्रिया इंजीनियरिंग और खाद्य विज्ञान और तकनीक में शिक्षण प्रदान करता है। इसके अलावे यह 20 छात्रों को पीएचडी कार्यक्रम में दाखिला देता है। इस संस्थान के पाठ्यक्रम को इस तरह तैयार किया गया है कि अंतिम वर्ष में छात्र केवल प्रशिक्षण और स्वदेशी तकनीक के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत आईआईएफपीटी विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा किसानों, उद्यमियों व युवाओं को उनके कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण प्रदान करता है।
यह जानकारी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री सुश्री साध्वी निरंजन ज्योति ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
(●) 2010-11 से 2016-17 के दौरान खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में 6492.19 मिलियन डॉलर का इक्विटी प्रवाह रहा
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग (डीआईपीपी) के अनुसार 2010-11 से 2016-17 के दौरान खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में 6492.19 मिलियन डॉलर का इक्विटी प्रवाह रहा है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में स्वचलित माध्यम (ऑटोमैटिक रूट) के जरिए 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति है, बशर्ते लागू कानूनों/नियमों/सुरक्षा स्थितियों का उल्लंघन न होता हो। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा किए गए उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार 2014-15 के दौरान पंजीकृत खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों द्वारा 368,43,371 लाख रूपये का पूंजी निवेश किया गया है। सर्वेक्षण के अनुसार खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में 2014-15 तक राज्यवार पूंजीवार निवेश अनुलग्नक में दिखाया गया है।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा उद्योगों पर किए गए सर्वेक्षण के अनुसार खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की संख्या 2010-11 के 35,838 से बढ़कर 2014-15 में 38,603 हो गई है।
2014-15 तक पंजीकृत खाद्य प्रसंस्करण ईकाइयों में राज्यवार पूंजी निवेश
क्र.सं.
राज्य
पूंजी निवेश (लाख रूपये में)
1
अंडमान और निकोबार द्वीप
733
2
आंध्र प्रदेश
2303736
3
अरूणाचल प्रदेश
6822
4
असम
802132
5
बिहार
688407
6
चंडीगढ
7251
7
छत्तीसगढ
355497
8
दादर एंड नागर हवेली
2337
9
दमन एंड दीव
33297
10
दिल्ली
651151
11
गोवा
152223
12
गुजरात
2568716
13
हरियाणा
2054238
14
हिमाचल प्रदेश
296996
15
जम्मू व कश्मीर
112583
16
झारखंड
124541
17
कर्नाटक
3227013
18
केरल
703629
19
मध्य प्रदेश
1218209
20
महाराष्ट्र
6749766
21
मणिपुर
5537
22
मेघालय
44828
23
नगालैंड
1938
24
ओडिशा
333689
25
पुदुचेरी
70505
26
पंजाब
2298109
27
राजस्थान
953902
28
सिक्किम
18285
29
तमिलनाडू
2809159
30
तेलंगाना
1008565
31
त्रिपुरा
20030
32
उत्तर प्रदेश
5119369
33
उत्तराखंड
506498
34
पश्चिम बंगाल
1593680
कुल 368,43,371
स्रोत: उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण, केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय
यह जानकारी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री सुश्री साध्वी निरंजन ज्योति ने लोकसभा में दी।