प्रदूषण के कारण



पर्यावरण में प्रदूषण कुछ भ्रष्टाचार जैसा है। फैलता ही जाता है। जैसे आकाश, आसमान न होकर कोई सरकारी दफ्तर है। सरकार भ्रष्टाचार और प्रदूषण, दोनों के विषय में सजग है। तभी तो, छंटे हुए विद्वानों को खर्चा-पानी देकर आमंत्रित किया जाता है। दिन भर तकरीरें होती हैं, लंच और चाय के दौरान भी। इनमें अतिथि बाबू-मंत्री, धुआं उगलती गाड़ियों से पधारते हैं। कुछ ज्ञानियों की मान्यता है कि प्रदूषण देश के विकास का मीटर है। जितनी तेजी से तरक्की की सुई आगे बढ़ती है, उसी रफ्तार से ‘पॉल्यूशन’ की। सड़क के निर्माण-चौड़ीकरण की प्रक्रिया में पेड़ों का कटना एक आम वारदात है। उससे हाकिमों के घरों के खिड़की-दरवाजे, पलंग-सोफे आदि बनना और फिर वृक्षारोपण भी। दिक्कत है कि यह पेड़ केवल फाइलों में फलते-फूलते हैं और इनकी लागत का पैसा बाबू-मंत्री की जेबों में। कागज पेड़ों से बनता है और उसी में बसे भी, तो आश्चर्य क्या है? जल-प्रदूषण का जिम्मेदार भी विकास है। शहर में लाखों घर, दजर्नों अस्पताल और हजारों गटर हैं। एक बेचारी नाले-सी नदी भी। सारे कूड़े-कर्कट का भार उसी के कमजोर प्रवाह पर है। कचरे से बिजली बनाने का संयंत्र वर्षों से चालू है। बस उसमें न कूड़ा है, न उत्पादन। फिर भी कूड़ा ढोते ठेकेदार और संयंत्र के कर्मचारी नियमित पैसा हींचते हैं।

इधर एक नया प्रदूषण पैदा हुआ है। इसे भाषण या वाक्-प्रदूषण कहते हैं। कुछ के गले में पैदाइशी ध्वनि विस्तारक यंत्र फिट हैं। वे पान की दुकान पर बोलें, तो सड़क के मुसाफिर कानों में उंगली डालकर गुजरते हैं। घर में फोन पर बात करें, तो मोहल्ला थर्राता है। वॉल्यूम घटाने की सलाह पर उनकी दार्शनिक प्रतिक्रिया है कि ‘ऊपर वाले ने एक ही तो नियामत बख्शी है। जब तक है, उसका प्रयोग कर लें।’ ऐसे वाक्-लतियल धरती को वायदों का स्वर्ग बनाने पर आमादा हैं। गनीमत है कि ऐसा हो नहीं पाता है, वरना इंसान रहता कहां? कहना कठिन है कि विकास जनित प्रदूषण ज्यादा खतरनाक है कि भाषण-रचित। एक से ऑक्सीजन मॉस्क पहनने का डर है, दूसरे से भूखे रहने का।

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