--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
●मध्यप्रदेश में ‘शिक्षा माफिया’ का चेहरा डॉ. सुनील कपूर, आरकेडीएफ समूह पर बढ़ता शिकंजा
●कैसे आरकेडीएफ और डॉ. सुनील कपूर पर लगा शिक्षा माफिया होने का ठप्पा
मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि कुछ निजी संस्थान सेवा नहीं, बल्कि मुनाफे का जरिया बना चुके हैं। हालिया घटनाक्रमों ने इन आरोपों को और गहरा किया है। आरकेडीएफ समूह और उसके प्रमुख डॉ. सुनील कपूर का नाम बार-बार विभिन्न जांच एजेंसियों की कार्रवाई में सामने आना इस बात की ओर इशारा करता है कि मामला केवल प्रशासनिक चूक तक सीमित नहीं, बल्कि एक संगठित शैक्षणिक घोटाले की ओर बढ़ता हुआ प्रतीत होता है।
• एक बड़े खुलासे की आहट
राजस्थान पुलिस के विशेष कार्य बल द्वारा भोपाल स्थित आरकेडीएफ विश्वविद्यालय परिसरों और संस्थान के निदेशक सुनील कपूर के आवास पर की गई छापेमारी ने शिक्षा जगत में हलचल मचा दी। यह कार्रवाई कथित तौर पर फर्जी या अनियमित मार्कशीट जारी किए जाने की जांच के सिलसिले में की गई। एसटीएफ की टीमें एक साथ आरकेडीएफ विश्वविद्यालय के गांधीनगर और नर्मदापुरम रोड स्थित परिसरों में दाखिल हुईं, जबकि एक अलग टीम डॉ. कपूर के आवास पर पहुंची। एसटीएफ यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में हेरफेर कर फर्जी मार्कशीट या दस्तावेज जारी किए गए।
• अंतरराज्यीय जांच और पुराने मामलों की कड़ियाँ
यह कार्रवाई केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसियों के अनुसार, मामला कई राज्यों में फैले एक व्यापक नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है। यही कारण है कि इसे एक अंतरराज्यीय जांच का रूप दिया गया है। आरकेडीएफ समूह से जुड़े विवाद कोई नए नहीं हैं। दिसंबर 2015 में मध्यप्रदेश की आर्थिक अपराध शाखा ने आरकेडीएफ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान को दी गई रियायतों में कथित अनियमितताओं के संबंध में एफआईआर दर्ज की थी। उस समय भी आरोप लगे थे कि नियमों को ताक पर रखकर संस्थान को लाभ पहुंचाया गया। इसके अलावा, डॉ. सुनील कपूर का नाम तेलंगाना में भी कानूनी जांच के दायरे में आया। आरकेडीएफ विश्वविद्यालय से फर्जी डिग्रियां जारी करने के आरोप में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी और तेलंगाना पुलिस ने उन्हें हिरासत में भी लिया था। यह घटनाक्रम इस ओर संकेत करता है कि कथित शैक्षणिक धोखाधड़ी का दायरा राज्य की सीमाओं से कहीं आगे तक फैला हुआ है।
• 90 करोड़ रुपये का कथित घोटाला
लगभग 15 वर्ष पहले राजस्थान एसटीएफ की कार्रवाई से पहले ही केंद्रीय जांच ब्यूरो डॉ. सुनील कपूर और उनसे जुड़े संस्थानों पर शिकंजा कस चुकी है। सीबीआई ने प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य डॉ. कपूर के आवास और आयुष्मती सोशल सोसायटी द्वारा संचालित चार इंजीनियरिंग कॉलेजों पर एक साथ छापेमारी कर लगभग 90 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का पर्दाफाश किया। इस कार्रवाई के तहत सत्य साईं अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक पर भी छापा मारा गया, जिसकी अध्यक्ष डॉ. कपूर की मां बताई जाती हैं। सीबीआई सूत्रों के अनुसार, छापेमारी आठ स्थानों पर की गई, जिनमें आरकेडीएफ इंजीनियरिंग कॉलेज, सत्य साईं इंजीनियरिंग कॉलेज, भाभा इंजीनियरिंग कॉलेज, भाभा मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट और आयुष्मती सोशल सोसायटी के पदाधिकारियों के आवास शामिल थे।
• फर्जी एफडीआर और मान्यता का खेल
जांच में सामने आया कि आयुष्मती सोशल सोसायटी ने ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन से इंजीनियरिंग कॉलेजों की मान्यता प्राप्त करने के लिए 2.50 करोड़ रुपये मूल्य की 35 फर्जी फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें (एफडीआर) प्रस्तुत कीं। कुल मिलाकर यह राशि करीब 87.5 करोड़ रुपये बैठती है। चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस बैंक के माध्यम से ये एफडीआर तैयार की गईं, उसमें वास्तविक जमा राशि केवल 10 लाख रुपये बताई गई। आरोप है कि बैंक के जरिए फर्जी दस्तावेज तैयार कर धनराशि को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, ताकि नियामक संस्थाओं को गुमराह किया जा सके। यह घोटाला इस वर्ष जुलाई में आरकेडीएफ कॉलेज और सत्य साईं अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक पर आयकर विभाग की छापेमारी के दौरान सामने आया था, जिसके बाद सीबीआई ने मामले की गहन जांच शुरू की।
• प्रसार भारती बोर्ड की सदस्यता और नैतिक सवाल
डॉ. सुनील कपूर का नाम केवल एक शिक्षाविद या संस्थान प्रमुख के रूप में नहीं, बल्कि प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य के रूप में भी सामने आता है। ऐसे में जब उन पर गंभीर वित्तीय और शैक्षणिक अनियमितताओं के आरोप लगते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की छवि का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह शिक्षा क्षेत्र में नियामक तंत्र की विफलता को भी उजागर करेगा। सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर कथित फर्जीवाड़ा वर्षों तक कैसे चलता रहा और संबंधित एजेंसियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी।
• शिक्षा माफिया की परिभाषा और हकीकत
‘शिक्षा माफिया’ शब्द अक्सर राजनीतिक बयानबाजी में सुनने को मिलता है, लेकिन आरकेडीएफ समूह से जुड़े मामलों ने इस शब्द को एक ठोस संदर्भ दिया है। जब शिक्षा संस्थानों का उपयोग डिग्री, मार्कशीट और मान्यता को एक व्यापारिक वस्तु की तरह करने के लिए किया जाए, तो यह सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य और समाज की नींव के साथ खिलवाड़ है। डॉ. कपूर के खिलाफ चल रही विभिन्न एजेंसियों की जांचें अभी निर्णायक चरण में नहीं पहुंची हैं। बार-बार सामने आ रहे आरोप, छापेमारी और एफआईआर यह जरूर संकेत देते हैं कि मामला साधारण नहीं है। राजस्थान एसटीएफ, सीबीआई, आयकर विभाग और अन्य एजेंसियों द्वारा जुटाए गए सबूत आने वाले समय में कई बड़े खुलासे कर सकते हैं। यह भी उम्मीद की जा रही है कि जांच एजेंसियां अपने निष्कर्ष शिक्षा नियामकों और राज्य पुलिस बलों के साथ साझा करेंगी, ताकि भविष्य में इस तरह के कथित घोटालों पर रोक लगाई जा सके। देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता इसी बात पर निर्भर करती है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी कार्रवाई हो।