--आचार्य प्रशान्त,
संस्थापक, प्रशान्त अद्वैत फाउंडेशन।
भूलना नहीं है कि आपकी परेशानी आपकी सब गतिविधियों के केंद्र में होनी चाहिए। मैं अगर परेशान हूँ तो मुझे हक़ ही नहीं है कुछ भी इधर-उधर का करने का। मेरा पहला दायित्व है - मैं पूछूँ कि मैं जो कुछ भी करने जा रहा हूँ, उससे मेरी परेशानी मिटेगी या नहीं मिटेगी? मेरा पहला कर्तव्य है स्वभाव में जीना।
कर्तव्य माने वो चीज़ जो करने लायक है। तो अगर मैं परेशान मैं हूँ तो मेरे लिए करने लायक पहली चीज़ यही है कि अपनी परेशानी दूर करूँ। मैं कुछ भी और करने लग गया अपनी परेशानी साथ में लिए-लिए तो ये ग़लत होगा। ये अर्धम है, ये अकर्तव्य है।
तो आप जो भी कुछ करते हो, पूजा-पाठ, तप, यज्ञ इत्यादि, आप पूछ लीजिए इससे आपकी परेशानी कैसे मिट रही है। आप कुछ मानें या न मानें। पर पूछिए ज़रूर कि ये मुझे जो कुछ भी करने को कह रहे हो, इसका मेरी जो सीधी-सीधी समस्याएँ हैं, उनसे ताल्लुक़ क्या है।
मालूम है आप ये सवाल क्यों नहीं पूछ पाते? आप ये सवाल इसलिए नहीं पूछ पाते क्योंकि आपने कभी ख़ुद से ही स्वीकार नहीं किया कि आपकी असली समस्या क्या है। पहले ख़ुद तो स्वीकार करिए कि मेरी असली समस्या क्या है?
मान लिया एक बार मैंने साफ़-साफ़, ऐसे उंगली रखकर, पिन प्वाइंट करके कि ये मेरी असली समस्या है, तो अब मैं एक साफ़ सवाल रख सकता हूँ। क्या साफ़ सवाल? कि ये मैं जो भी कुछ कर रहा हूँ इधर-उधर, इससे ये समस्या मिटेगी कि नहीं मिटेगी? ये बिलकुल साफ़ सवाल होगा जिसका साफ़ जवाब आएगा हाँ या न। इसमें अब कोई धोखाधड़ी हो नहीं सकती। हम चाल क्या चलते हैं? हम कहते हैं, “मैं अपनेआप को बताउँगा ही नहीं कि मेरी साफ़ समस्या क्या है। तो मैं इस पूरी चीज़ को ऐसे कह दूँगा ‘मेरी न साफ़ समस्या इधर से है, न उधर से, हम सही बताते ही नही तो फिर क्या होगा? पिन प्वाइंट करने की जगह कह दिया कि मेरी पूरी समस्या इधर कहीं है। तो आप इधर कुछ कर रहे हो, अपनी कोई विधि कर रहे हो, कुछ भी कर रहे हो अपना अध्यात्मिक कार्यक्रम। तो आप कह दोगे, “क्या पता इससे यहाँ फ़ायदा हो, क्या पता मेरी समस्या यहाँ हो। यहाँ भी तो हो सकती है मेरी समस्या।” क्योंकि आपने अभी ख़ुद ही स्पष्टता से ये घोषणा नहीं करी है कि मेरी समस्या तो ये है।
तो किसी के पास आप जाएँगे, वो कहेगा, “देखो, ये करने से ये फ़ायदा होता है।” आप कहेंगे, “हाँ, बढ़िया चीज़ है। क्योंकि क्या पता मेरी समस्या यहीं पर हो।
और हर चीज़ में अपने आप को ये बता रखा है ‘क्या पता फ़ायदा हो ही जाता हो! कर लो, इससे हो जाए अब’। हकीक़त यह है कि तुम भलीभाँति जानते हो कि तुम्हारे कहाँ पर खुजली है लेकिन रूह काँपती है ये स्वीकार करने में। क्योंकि सिखा दिया गया है कि कुछ बातें बताने की नहीं होतीं, ख़ुद को बताने की नहीं होती। हर चीज़ कामयाब हो सकती है। बिलकुल हो सकती है, अगर आपको पता हो उस चीज़ का इस्तेमाल आपको किसलिए करना है। न तो हम जानते हैं कि हमें क्या समस्या है, न हम ये जानते हैं कि जहाँ हम जा कहाँ रहे हैं,।
यज्ञ क्या है? हम पता तो करें पहले। हमें पता भी है यज्ञ क्या है? क्या हम यज्ञ जानते हैं? हम न ध्यान जानते, न यज्ञ जानते, न पूजा जानते, न पाठ जानते, न भजन जानते, न कीर्तन जानते। न हम ये जानते कि वो क्या हैं, न हम ये मानते कि हमारी समस्या क्या है, तो तुम्हारे काम क्या आएगा? न आप ये जानते कि आप जिस डॉक्टर के पास जा रहे हो वो विशेषज्ञ किस चीज़ का है, न आप ये जानते कि आपको कौन सा रोग हुआ है, तो आपको कैसा फ़ायदा हो जाना है, फिर आपको ये भी नहीं पता चलेगा कि जिसके पास आप गए हो, वो डॉक्टर असली है या नीम-हकीम है।
यज्ञ का अगर असली अर्थ पता हो तो यज्ञ बहुत पवित्र और पावन चीज़ है। लेकिन ये जो इधर-उधर पंडित घूम कर यज्ञ कराते रहते हैं, इन्हें यज्ञ का क्या पता है। इनके लिए तो यज्ञ का मतलब है लकड़ी जलाना और उसमें घी डाल दो।
ऐसे आपको आध्यात्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति होने वाली है क्या? और आपको ख़ुद नहीं पता होता आप क्या कर रहे हो। वो पंडित बोल देता है अब ये तीसरी उंगली आगे करो, तो आप तीसरी कर देते हो, कभी दूसरी कर देते हो, कभी कुछ कर देते हो।
यही वजह है कि जगत घोर रूप से अधार्मिक होता जा रहा है। कुछ जानना नहीं, कुछ समझना नहीं, बस करे जाना है, और उसका जो ख़तरनाक नतीजा निकलता है, जानते हैं क्या होता है? फिर एक पीढ़ी आती है जो कहती है, इन चीज़ों का कोई अर्थ तो है नहीं, ये तो हमें करनी ही नहीं। बिना जाने-समझे पूजा-पाठ करते-करते ये स्थिति आ गई कि अब एक पीढ़ी खड़ी हो गई है जो किसी भी तरह की पूजा, कोई पाठ, कोई जप करना ही नहीं चाहती।
और हम उनको दोष नहीं दे सकते। क्योंकि उन्होंने अपने घर में यही देखा है, माँ-बाप को, दादा-दादी, नाना-नानी को, कि ये बिना जाने-समझे कुछ भी करते रहते हैं। बस ऐसे ही खड़े हो जाते हैं, करना है, घंटी बजा रहे हैं और साथ में इधर देख रहे है। तुम किसको बेवकूफ़ बना रहे हो? धर्म से ज़्यादा मुक्तिप्रद कुछ नहीं और धर्म से बड़ा बंधन भी कुछ नहीं। खेद की बात है कि हमने धर्म को बंधन ही बना डाला। जीवन ही पूरा यज्ञ होना चाहिए। वो जो आप आहुति दे रहे हैं वो स्वयं की देनी है। और वो जो ज्वालाएँ हैं सब, उनका काम है कि आपने जो कुछ आहुति में दिया हो उसको उठा के ऊपर पहुँचा देना। ये प्रतीकात्मक है।
'ख़ुद को किसी ऐसी जगह झोंक दो जो तुम्हें उठाकर के सीधे आसमान से मिला दे – ये है यज्ञ का वास्तिवक अर्थ।'
तर्क देते हैं लकड़ी जलानी होती है और यज्ञ से धुआँ निकलता है, उससे हवा शुद्ध हो जाती है’। कैसी बातें कर रहे हो! ऐसे ही इतना प्रदुषण है, तुम लकड़ी जलाओगे, उससे हवा शुद्ध हो जाएगी। क्या है ये!
सीधा-सीधा एक प्रतीक है। भूलना नहीं है कि सारी बात किसकी हो रही है? अपनी, अहम् की हो रही है। वही परेशान है, वही दुखी है। उसी से राहत चाहिए। उसी का समर्पण करने की सारी बात है।
पहले मैंने तुझे वो सब कुछ दिया जो मुझे व्यर्थ ही प्रिय था। जो मुझे व्यर्थ ही प्रिय है वही मेरा बंधन है। ये यज्ञ है। ऐसे ही आगे और समझ लीजिएगा कि पूजन का, नमन का, इनका क्या अर्थ है; मूर्ति का क्या अर्थ है। ये सब जाने बिना अगर आप मंदिर जा रहे हैं तो लाभ नहीं होगा। और मंदिर बहुत लाभ की जगह हो सकती है, अगर उसको रूढ़ि की जगह न बना दिया जाए।