'तलाक' पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : अब पति-पत्नी को नहीं करना होगा 6 महीने का इंतजार



--राजीव रंजन नाग,
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने आज सोमवार को तलाक पर अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि अगर पति-पत्नी के रिश्ते बिगड़ जाएं और शादी का जारी रहना संभव न हो, तो वह सीधे अपनी तरफ से तलाक का आदेश दे सकता है। कोर्ट ने कहा कि वह भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत बिना फैमिली कोर्ट भेजे तलाक को मंजूरी दे सकता है। इसके तहत शादीशुदा जोड़े को तलाक लेने के लिए छह महीने तक इंतजार करने की जरूरत नहीं रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने तलाक से जुड़ी एक याचिका पर व्यवस्था दी कि अगर रिश्तों में सुधार की गुंजाइस नहीं बची है तो दंपति को 6 महीने की जरूरी प्रतीक्षा अवधि के इंतजार की जरूरत नहीं है। जस्टिस एसके कौल की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने कहा, ‘हमने अपने निष्कर्षों के अनुरूप व्यवस्था दी है कि इस अदालत के लिए किसी शादीशुदा रिश्ते में आई दरार के भर नहीं पाने के आधार पर उसे खत्म करना संभव है। यह सरकारी नीति के विशिष्ट या बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं होगा।’

यह फैसला जस्टिस एसके कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एएस ओका और जस्टिस जेके माहेश्वरी की संविधान पीठ ने सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक पर ये फैसला सुनाते हुए गाइडलाइन भी जारी की है। कोर्ट ने गाइडलाइन में उन वजहों का जिक्र किया है जिनके आधार पर पति-पत्नी का रिश्ता कभी पटरी पर ना आने वाला माना जा सकता है। कोर्ट की ओर से जारी गाइडलाइन में रखरखाव, एलिमनी यानी गुजारा भत्ता और बच्चों के अधिकारों के संबंध में भी बताया गया है।

दरअसल, हिंदू मैरिज एक्ट-1955 की धारा 13बी में इस बात का प्रावधान है कि पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक के लिए फैमिली कोर्ट को आवेदन दे सकते हैं। हालांकि फैमिली कोर्ट में मुकदमों की अधिक संख्या के कारण जज के सामने आवेदन सुनवाई के लिए आने में वक्त लग जाता है। इसके बाद तलाक का पहला मोशन जारी होता है, लेकिन दूसरा मोशन यानी तलाक की औपचारिक डिक्री हासिल करने के लिए 6 महीने के इंतजार करना होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले कई मामलों में शादी जारी रखना संभव न होने होने के आधार पर अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए अपनी तरफ से तलाक का आदेश दिया था। अनुच्छेद 142 में इस बात का प्रावधान है कि न्याय के हित में सुप्रीम कोर्ट कानूनी औपचारिकताओं को दरकिनार करते हुए किसी भी तरह का आदेश दे सकता है। ये मामला डिविजन बेंच ने जून 2016 में 5 जजों की संविधान बेंच को रेफर किया था। इस मुद्दे को संविधान बेंच के पास इस सवाल के साथ भेजा गया था कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए भी अनिवार्य वेटिंग पीरियड को खत्म किया जा सकता है? हालांकि, बेंच ने ये भी विचार करने का फैसला किया कि जब शादी में सुलह संभावना ना बची हो, तो क्या विवाह को खत्म किया जा सकता है?

पांच याचिकाओं पर लंबी सुनवाई के बाद बेंच ने सितंबर 2022 में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि सामाजिक परिवर्तन में थोड़ा वक्त लगता है और कभी-कभी कानून लाना आसान होता है, लेकिन समाज को इसके साथ बदलने के लिए राजी करना मुश्किल होता है। इंदिरा जयसिंह, कपिल सिब्बल, वी गिरी, दुष्यंत दवे और मीनाक्षी अरोड़ा जैसे सीनियर एडवोकेट्स को इस मामले में न्याय मित्र बनाया गया था।

विवाह के असुधार्य टूटने के आधार पर तलाक का अनुदान अधिकार का मामला नहीं है, बल्कि एक विवेक है जिसे बहुत सावधानी और सावधानी से प्रयोग किया जाना है। छह महीने की "कूलिंग ऑफ" अवधि को समाप्त किया जा सकता है क्योंकि समय अंतराल का उद्देश्य पहले से ही विघटित विवाह को फैलाना नहीं है। इस विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग पक्षकारों के साथ 'पूर्ण न्याय' करने के लिए किया जाना है, जिसमें न्यायालय संतुष्ट है कि तथ्यों से पता चलता है कि विवाह पूरी तरह विफल हो गया है। जब तक मौलिक सामान्य और विशिष्ट सार्वजनिक नीति के विचारों के आधार पर निर्णय लिया जाता है, तब तक यह प्रक्रिया के साथ-साथ मूल कानूनों से अलग हो सकता है।

पीठ ने यह भी बताया कि इक्विटी को कैसे संतुलित किया जाए। हमने इसके लिए कारक निर्धारित किए हैं। विशेष रूप से बच्चों के भरण-पोषण और अधिकारों के संबंध में।

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