दोषी शासक जेल भेजे जायें! न्याय का तकाजा है!!



--के. विक्रम राव,
अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

क्या किसी पुलिस या सरकारी कर्मी को किसी निर्दोष नागरिक को कोई हानि पहुंचाने पर कभी दंड मिला? भले ही उस बेकसूर व्यक्ति को वित्तीय नुकसान, मानसिक यातना, शारीरिक पीड़ा, प्रतिष्ठा पर कलंक आदि अवैध कैद के दौरान हुए हों। इसीलिए सुखद है कि कल (2 दिसंबर 2022) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तिरुअनंतपुरम के तीन आईपीएस अफसरों की अग्रिम जमानत वाले केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर देने के फैसले का व्यापक स्वागत हुआ है। इन खाकी पोशाकधारियों ने पद का बेजा उपयोग कर एक योग्य तथा बेगुनाह वैज्ञानिक को पच्चीस वर्षों तक हर तरह उत्पीड़ित किया। वह वैज्ञानिक हैं केरल के नम्बी नारायण जिन्हे 2019 में पद्मभूषण से नवाजा गया था। अभियुक्त पुलिस वाले हैं दो पूर्व महानिदेशक आर.बी. श्रीकुमार और सीबी मैथ्यू तथा तीन वरिष्ठ वर्दीधारी : एस. विजयन, थंपी दुर्गादत्त और पी.एस. जयप्रकाश। उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति-द्वय मुकेश रसिकभाई शाह तथा सीटी रवि कुमार ने केरल हाईकोर्ट द्वारा प्रद्त अग्रिम जमानत रद्द कर दी। हाईकोर्ट को पांच सप्ताह में फैसला सुनाने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत की अपेक्षा है कि उक्त सिद्धांतों का प्रतिपादन हो और नियमों का निरूपण किया जाए, ताकि आयंदा कोई भी भावनाहीन सत्तासीन अधिकारी नाजायज कदम उठाने से हिचकेगा, कई बार सोचेगा, शर्मसार होगा। कोई भी रक्षकजन कानून से अठ्खेली नहीं करेगा।

नंबी नारायण के वैज्ञानिक प्रयोगों को बाधित करने में दो महाशक्तियों की साजिश रही। क्रायोजिनिक इंजिन को नम्बी नारायण तथा उनके साथी भारत में बना रहे थे। राकेट में इसका उपयोग होता है। आयात में लागत करोड़ों रुपयों की है। अमेरिका भारत को उपलब्ध नहीं कराना चाहता था। उसके मना करने से रूस भी पीछे हट गया। ठीक ऐसे वक्त इन पुलिस अधिकारियों ने अनजान कारणों से 1994 में नम्बी नारायण पर विदेशी सरकार की जासूसी का आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया। तब कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव तथा केरल के मुख्यमंत्री कांग्रेसी के. करुणाकरन थे। दोनों खामोश रहे। बाद में फिर किस प्रकार नारायण लगातार संघर्ष करते रहें और अंततः जीते और बेगुनाह साबित होकर रिहा हो गए। इनकी गाथा बड़ी मर्मस्पर्शी है।

क्या गुजरी होगी उनके राष्ट्रभक्त परिवार पर जिसने सारा वैज्ञानिक अनुसंधान ही देश के लिए किया हो। उनको झूठे आरोप में गिरफ्तार किया गया। वो भी देशद्रोह मे! ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब “राकेट्री : द नंबी इफेक्ट” नामक चलचित्र में मिलेंगे जो अंतरिक्ष वैज्ञानिक नंबी नारायण के जीवन पर बनी है। नारायण को लगभग 28 साल पहले इस आरोप में गिरफ्तार किया गया था कि वे इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन) से जुड़ी गोपनीय जानकारियां पाकिस्तान को दे रहे हैं। लंबे समय तक चले मुकदमे के बाद उनको बाइज्जत बरी किया गया। ये फिल्म उनके परिवार को किस शारीरिक और मानसिक क्लेश से गुजरना पड़ा, उसी की कहानी है। इसके मुख्य किरदार फिल्म “थ्री इडियट्स” में ख्याति पाये आर. माधवन हैं जिन्होंने नंबी नारायण की भूमिका निभाई है। वे ही इस फिल्म के निर्देशक और लेखक भी हैं। शाहरुख खान ने इस फिल्म में किरदार नंबी नारायण का इंटरव्यू लिया है और इसी इंटरव्यू के माध्यम से सारी कहानी फ्लैशबैक के माध्यम से सामने आती है। फिल्म ये भी दिखाती है कि भारत के अंतरिक्ष विज्ञान के विकास में हमारे वैज्ञानिकों ने किस लगन और देश प्रेम के साथ काम किया है। नंबी नारायण और उनके जैसे कई वैज्ञानिक चाहते तो आराम से अमेरिका जाकर करोड़ों-अरबों कमाते और वहां के अंतरिक्ष विज्ञान को समृद्ध करते। ऐसे लोगों के कारण ही भारत विज्ञान में तरक्की कर सका।

मगर इस लेख का लक्ष्य कानून से संबन्धित है। गैरकानूनी हरकत करने वाले शासकीय हुक्कामों को कब सजा दी जाएगी? न्यायमूर्ति जे.सी. शाह आयोग ने आपातकालीन नृशंसता के लिए अफसरों को दोषी करार दिया था। भले ही ऐसा जघन्य कृत्य करने का आदेश “ऊपर” से आया हो। ऐसा ही सिद्धांत न्यरेमबर्ग ट्रायल में नाजी फौजियों पर लगा हुआ था। एडोल्फ हिटलर के अमानवीय आदेशों का जर्मन अफसरों ने विरोध नहीं किया। अतः दायित्व उन्हीं पर था।

ऐसे ही विषय पर एक हिंदी फिल्म भी बनी थी “अंधा कानून”। अमिताभ बच्चन नायक थे। उसी की कहानी है। एक दिन ड्यूटी के दौरान यह वन अधिकारी कुछ शिकारियों को देखता है जो अवैध रूप से चंदन के पेड़ काट रहे थे। वे जवाबी कार्रवाई करते हैं। एक संघर्ष शुरू होता है और उनमें से राम गुप्ता (अमरीशपुरी) मारा जाता है। बच्चन पर उसकी हत्या का आरोप लगाया गया, अदालत में मुकदमा चलाया गया और 20 साल जेल की सजा सुनाई गई। पर मृतक जीवित पाया गया। फिल्म के कथानक से सभी अवगत हैं।

यहां कुछ अदालती घटनाओं का उल्लेख हो। इनमें वे बेगुनाह नागरिक हैं जो सजा काट चुके, जेल की यातना भुगत चुके है। मगर उनकी कोई भी क्षतिपूर्ति नहीं हुई। बलिया जिले में एक व्यक्ति को निर्दोष साबित होने में 14 साल लग गए लेकिन ये 14 साल उनके जेल में ही कट गए। रेवती गांव के रहने वाले मुकेश तिवारी विगत में जेल से सजा काटने के बाद निर्दोष साबित होने पर घर लौटे। यौवन के 14 अनमोल वर्ष उनके जो बर्बाद हुए, उसकी मुआवजा कौन देगा? कानपुर (देहात) के अल्ताफ उर्फ नफीस को 21 वर्षों बाद बलात्कार के अपराध से बरी किया गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा (3 दिसंबर 2022) 14 वर्षों तक तो मुकदमा सूचीबद्ध ही नहीं किया गया था।

करीब 35 साल से बेहमई कांड का चला मुकदमा इसका जीता जागता उदाहरण है। इसमें अभियुक्त समेत कई पीड़ित पक्ष के ज्यादातर लोगों की मौत हो चुकी है। पर मुकदमे में फैसला तो नहीं, सुनवाई तक पूरी नहीं हुई है। ऐसी हालत कब तक बरदाश्त की जाएगी?

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