भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है हमारा पवित्र संविधान



वाराणसी-उत्तर प्रदेश,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ पंडित कमलापति त्रिपाठी फाउंडेशन की ओर से संविधान दिवस पर विचार गोष्ठी में वक्ताओं के विचार

देश का संविधान भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है उसमें कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक दूसरे की जांच और सन्तुलन का एक ऐसा सूत्र निहित है जिसे छेड़ने या कमजोर होने से सीधे सीधे पूरा संविधान ही खतरे में आ जाता है और आज ऐसा ही कुछ देश में होता नजर आ रहा है जो देश और देशवासियों के लिये गम्भीर चिन्ता का सबब है। यह विचार शनिवार को ईंगलिसियालाईन स्थित पंडित कमलापति त्रिपाठी फाउंडेशन की ओर से संविधान दिवस पर आयोजित विचार गोष्ठी में व्यक्त किया गया।

वक्ताओं ने आगे कहा कि भारत के संविधान निर्माताओं ने सालों साल की मेहनत और चिन्तन के बाद संविधान को अन्तिम रूप देते समय यह सुनिश्चित किया था कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था देश के लोगों के हितों की रक्षा तभी स्वस्थ तरीके से कर सकेगी जब इसमें चेक और बैलेन्स की व्यवस्था वस्था सही तरीके से लागू रहेगी और यदि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच से परस्पर चेक और बैलेन्स की यह संवैधानिक व्यवस्था हटेगी तो उसका दुष्प्रभाव लोकतंत्र पर पड़ना स्वाभाविक हो जायेगा और फिर लोकशाही को तानाशाही में बदलने में देर नहीं लगेगी। दुर्भाग्य बस देश की वर्तमान स्थिति ऐसी ही हो चली है, यहां तो लोकतंत्र के तीनों पायों में न तो समन्वय दिखता है न ही संवैधानिक संस्थानों में स्वायत्ता दिखती है, बेलगाम कार्य पालिक विधायिका और न्याय पालिका दोनों को निगल जाने पर आमादा दिख रही है। ऐसे में संविधान पर भारी खतरा उत्पन्न होता जा रहा हैं अब ऐसे संविधान और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिये देश के सभी जागरूक नागरिकों, सिविल सोसायटी और लोकतंत्र के प्रबल पक्षधर राजनीतिक लोगों को एक मंच पर आकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिये संघर्ष करना होगा कदाचित संविधान दिवस का आज यही सन्देश होगा।

विचार गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ राजनैतिक और समाज सेवी विजय शंकर पान्डेय ने और संचालन फाउंडेशन के सचिव बैजनाथ सिंह ने किया, गोष्ठी में पूर्व एमएलसी राजेश पति त्रिपाठी, वरिष्ठ समाजसेवी राधेश्याम सिंह,एडवोकेट राधेलाल श्रीवास्तव, एडवोकेट प्रभूनाथ पान्डेय, एडवोकेट भूपेन्द्र प्रताप सिंह, मनोज चौबे, वरिष्ठ पत्रकार हरेन्द्र शुक्ला, डाक्टर प्रेमशंकर पान्डेय, आनन्द मिश्रा, ब्रह्मदेव मिश्रा, संजय तिवारी, ज्वाला मिश्रा, एडवोकेट पंकज मिश्रा, कमलाकान्त पान्डेय, पुनीत मिश्रा, रविकान्त दूबे, मोहम्मद अरशद, शुभम राय, उदय सिंह, युवराज पान्डेय, गौरव पान्डेय, पिन्टू शेख आदि ने विचार व्यक्त किये।

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