--राजीव रंजन नाग,
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
कर्नाटक में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर बैन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसले के वक्त सुप्रीम कोर्ट में मामला और उलझ गया। कर्नाटक हिजाब बैन मामले में फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों में मतभेद हो गया। जिसके बाद इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) के पास भेजा गया है। अब मुख्य न्यायाधीश तय करेंगे कि मामले में आगे क्या करना है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही हिजाब की लड़ाई और लंबी हो गई है।
दो जजों की पीठ ने, में से एक जस्टिस हेमंत गुप्ता ने गुरुवार को फैसला सुनाते हुए कहा, "हमारे बीच मतभेद हैं, लेकिन जजों ने यह नहीं बताया कि बड़ी बेंच कब गठित की जाएगी या अगली सुनवाई कब होगी। "यह अंततः पसंद का मामला है," अन्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने कहा, क्योंकि उन्होंने कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया था।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ को यह तय करना था कि कर्नाटक हिजाब विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला सही है या नहीं। इस पर फैसला सुनाते हुए दोनों जजों की राय अलग-अलग थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने जहां याचिकाओं को खारिज कर दिया, वहीं जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। क्योंकि कर्नाटक हिजाब बैन केस में दोनों जजों की राय अलग-अलग थी।
भारत में मुसलमान एक बड़ा अल्पसंख्यक हैं, जो दक्षिण एशियाई राष्ट्र में देश की 1.4 बिलियन आबादी का 14 प्रतिशत है, जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं। कुछ मुस्लिम छात्रों ने मार्च में प्रतिबंध को बरकरार रखने वाले राज्य की एक अदालत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक के शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध हटाने से इनकार करने वाले कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं दायर की गईं थी, जिस पर जस्टिस हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने 10 दिनों तक मामले में दलीलें को सुना था। अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तय करेंगे कि कब और कौन सी बेंच कर्नाटक हिजाब बैन मामले की सुनवाई करेगी। इस फैसले के साथ ही हिजाब की लड़ाई और लंबी हो गई।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें कर्नाटक हाईकोर्ट के राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध हटाने से इनकार करने के निर्णय को चुनौती दी गई है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने 15 मार्च को उडुपी में ‘गवर्नमेंट प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज’ की मुस्लिम छात्राओं के एक वर्ग द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने कक्षाओं के भीतर हिजाब पहनने की अनुमति देने का अनुरोध किया था।
अदालत ने कहा था कि यह (हिजाब) इस्लाम धर्म में अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। कर्नाटक सरकार ने पांच फरवरी 2022 को दिए आदेश में स्कूलों तथा कॉलेजों में समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा पहुंचाने वाले वस्त्रों को पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं दायर की गईं हैं। इस मामले में बीते दिनों न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
कर्नाटक सरकार ने हिजाब संबंधी अपने आदेश को सुप्रीम कोर्ट में ‘धर्म निरपेक्ष’’ बताया। राज्य सरकार ने अपने आदेश का जोरदार बचाव करते हुए पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) को विवाद के लिए दोषी ठहराते हुए दावा किया कि यह एक ‘बड़ी साजिश’ का हिस्सा था। राज्य सरकार ने जोर दिया कि शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने के समर्थन में आंदोलन कुछ लोगों द्वारा ‘स्वतःस्फूर्त’ नहीं था और अगर उसने उस तरह से काम नहीं किया होता तो वह ‘संवैधानिक कर्तव्य की अवहेलना’ की दोषी होती। कर्नाटक सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि पीएफआई ने सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू किया था जिसका मकसद ‘लोगों की धार्मिक भावनाओं’ के आधार पर आंदोलन शुरू करना था।
न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता ने हिजाब प्रतिबंध का समर्थन किया, वहीं न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने कहा कि वह उनके साथ "सम्मानपूर्वक असहमत" थे क्योंकि वह लड़कियों की शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण मानते थे। दोनों जजों ने अपने आदेश सुनाते हुए बहुत तीखी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति धूलिया ने धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक स्वतंत्रता और लड़कियों की शिक्षा को सक्षम बनाने पर जोर दिया। न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा, "हमारे संविधान के कई पहलुओं में से एक है विश्वास। हमारा संविधान भी विश्वास का दस्तावेज है। यह वह विश्वास है जिसे अल्पसंख्यकों ने बहुमत पर रखा है।" "स्कूलों में अनुशासन होना आवश्यक है। लेकिन अनुशासन स्वतंत्रता और सम्मान की कीमत पर नहीं।
विश्वविद्यालय की एक पूर्व छात्रा को अपने स्कूल के गेट पर हिजाब उतारने के लिए कहना, उसकी गोपनीयता और गरिमा पर आक्रमण है। न्यायमुर्ति धुलिया ने कहा "आज भारत में सबसे अच्छी जगहों में से एक है एक बच्ची जो सुबह स्कूल जाती है, उसका स्कूल बैग उसकी पीठ पर होता है। वह हमारी आशा है, हमारा भविष्य है। एक बालिका के लिए अपने भाई की तुलना में शिक्षा प्राप्त करना अधिक कठिन होता है," "क्या हम ऐसा (हिजाब प्रतिबंध) करके उसके जीवन को बेहतर बना रहे हैं?" "सभी याचिकाकर्ता चाहते हैं कि हिजाब पहनें!
हालांकि, छात्रों को अनुशासन का पालन करना आवश्यक है स्कूल वर्दी के मामले में।" न्यायाधीश ने कहा। "धार्मिक विश्वास को राज्य के धन से बनाए गए एक धर्मनिरपेक्ष स्कूल में नहीं ले जाया जा सकता है। न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता सभी नागरिकों पर लागू होती है, इसलिए एक समुदाय को धार्मिक प्रतीकों को पहनने की अनुमति देना "धर्मनिरपेक्षता का विरोध" होगा। उन्होंने कहा कि अगर छात्रों को धार्मिक प्रतीकों को कक्षा में ले जाने की अनुमति दी जाती है तो बंधुत्व का संवैधानिक लक्ष्य पराजित हो जाएगा।