कैसे अब संवैधानिक संस्थान की उड़ाई जा रहीं हैं धज्जियां



--विजया पाठक (एडिटर, जगत विज़न),
रायपुर-छत्तीसगढ़, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ पुलिस स्थापना बोर्ड के सभी फैसलों पर लगती सौम्या की आखरी मुहर

■ कब तक मुख्यमंत्री भूपेश की आँखों पर रहेगी पट्टी?

छत्तीसगढ़ में स्थापित पुलिस स्थापना बोर्ड केवल नाम का बोर्ड रह गया है। वैसे तो पुलिस अफसरों के ट्रांसफर, पोस्टिंग में बोर्ड का बहुत बड़ा रोल होता है। किसी भी अफसर के ट्रांसफर, पोस्टिंग में इस बोर्ड की अनुशंसा बहुत जरूरी होती है। बोर्ड की अनुशंसा के बाद यह मामला डीजीपी के पास जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल की सरकार में नियमों और कानून की धज्जियां किस तरह से उड़ाई जा रही हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है। यहां पर सारे नियम कायदे भूपेश बघेल और उनकी करीबी अधिकारी सौम्या चौरसिया के चलते हैं। सुप्रीम कोर्ट की गाईडलाइंस में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि बोर्ड की अनुशंसा के बगैर किसी भी अधिकारी की ट्रांसफर, पोस्टिंग नहीं की जा सकती है। इसमें सुप्रीम अदालत का मानना है कि बोर्ड के पॉवरफुल होने से सरकारें अपनी मनमर्जी से किसी के साथ अनर्थ और गैरकानूनी तरीके से नुकसान नहीं पहुंचा पायेगीं पर छत्तीसगढ़ में पुलिस स्थापना बोर्ड को इतना पंगु और निकम्मा बना दिया है कि सारे के सारे फैसले बोर्ड के बाहर सौम्याा चौरसिया कर रही हैं। कौन थानेदार, कौन एसपी, कौन एडिशनल एसपी, कौन सीएसपी कहां जायेंगे। यह तय सौम्या ही तय करती हैं। यहीं कारण है कि बोर्ड में जानबूझकर जूनियर और भ्रष्ट अफसरों की तैनाती की गई है, जो सिर्फ सुपर सीएम (सौम्या चौरसिया) की जी हजूरी में लगे रहते हैं। जो सुपर सीएम कहती है वहीं आदेश हो जाता है और बोर्ड की अनुशंसा हो जाती है। सूत्रों का कहना है कि बोर्ड की अनुशंसा डीजीपी तक जाती ही नहीं है और सीधे मुख्यमंत्री को पहुंचाई जाती है। बोर्ड के संबंध में यह भी आदेशित है कि इसकी नियमित समय अंतराल पर बैठकें होना चाहिए लेकिन चिंतनीय है कि प्रदेश में बोर्ड की भूपेश सरकार में एक भी बैठक नहीं हुई है और न ही कोर्ट के निर्देश अनुसार कोई पालन हो रहा है। इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में पुलिस स्थापना बोर्ड कितना पावरफुल है।

वैसे भी सरकार बनने से लेकर अब तक बघेल सरकार में केवल भ्रष्टाचार, अनाचार, मनमानी ही देखने को मिली है। छत्तीसगढ़ के लिए पुलिस स्थापना बोर्ड का पंगु होना लोगों को अचरज में नहीं डालता है क्योंकि प्रदेश में ऐसे कई और बोर्ड हैं जो सरकार की मर्जी से अपने हिसाब से चल रहे हैं और अपने हिसाब से तानाशाही रवैये से लोगों को परेशान कर रहे हैं। इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि कोई भी व्यक्ति या पत्रकार सरकार के कारगुजारी के खिलाफ आवाज उठाता है उसे सरकार के अधिकारी जेल में बंद कर देते हैं, उसके ठिकानों को नुकसान पहुंचा देते हैं। उस पर झूठे मुकदमा दर्ज किये जाते हैं। इतना ही नहीं धमकाया जाता है। मैं भी प्रदेश सरकार के काले कारनामों को उजागर करती हूं। मुझे भी धमकियां दी जाती हैं कि गिरफ्तार कर लिया जायेगा। ऐसे ही एक आईपीएस अफसर हैं जीपी सिंह। उनका कसूर इतना भर था कि जब वह ईओडब्यूं में थे तो उन्होंने सरकार के कहने पर सही लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाया था। इसके बदले जीपी सिंह को कई संगीन आरोप लगवाये।

● 08 हजार करोड़ से 80 हजार करोड़ तक पहुंचा प्रदेश का कर्जा

जब प्रदेश में रमन सिंह की सरकार थी उस समय प्रदेश पर कुल 08 हजार करोड़ रूपये का कर्ज था। लेकिन पिछले चार साल में प्रदेश पर लगभग 80 हजार करोड़ रूपये का कर्जा हो गया है। आखिर सवाल उठता है कि ऐसी कौनसी योजनाएं भूपेश बघेल ने चलाई जिससे प्रदेश पर इतना भारी भरकम कर्ज हो गया। जमीन पर आज भी प्रदेश अविकसित और अराजकता के माहौल में है। निश्चित है कि इसमें से भारी राशि भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी में गई होगी।

● 22 विधायकों की बनाई गई सीडी

पिछले कुछ महिनों की बात है जब भूपेश बघेल अपने साथ 22 विधायकों को दिल्ली लेकर गए थे। बताया जा रहा है कि इन सभी विधायकों की गलत सीडी गोवा और मुंबई में बनवाई थी। इसके पीछे कहा गया है कि इन सीडी के कारण विधायक सरकार के खिलाफ न जा पाये और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कब्जेे में रहे। इसी के बाद दिल्ली में भूपेश बघेल ने इनकी परेड निकाली थी जहां इनके जय जय कार के नारे लग रहे थे। क्योंकि उस समय प्रदेश में ढाई-ढाई साल का मामला खूब उछल रहा था।

आपको बता दें कि ये वही सौम्या चौरसिया है जिनके ठिकानों पर पिछले दिनों ईडी और आयकर की टीमों ने छापामार कार्यवाही की। यही नहीं उसके तुरंत बाद सौम्या चौरसिया मुख्यमंत्री बघेल की कैबिनेट बैठक में वहां मौजूद सभी मंत्रियों को चिल्लाते हुए नजर आई थी। और यह सब तब हुआ जब खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल वहा मौजूद थे। कुल मिलाकर अगर राज्य के भीतर इसी तरह से चौकड़ी का खेल चलता रहा तो कांग्रेस पार्टी के आलाकमान और स्वयं राहुल गांधी इस बात को मान ले कि अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार की सत्ता में वापसी नामुकिन है।

जानकारों के अनुसार छत्तींसगढ़ में मौजूदा कांग्रेस सरकार अपनी अंतिम सांसे गिन रही है। राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता़ का नामोनिशान मिटने के आसार बन गये हैं। दरअसल यह राज्य कांग्रेस के लिये वरदान साबित हुआ था। उसमें 15 सालों तक सत्ता में वापिस बीजेपी के योजनाओं की विफलताओं को जनता के सामने ऐसा पेश किया था। प्रदेश के पत्रकारों पर जिस तरह से शिकंजा कसा गया है और कई नामचीन पत्रकारों के खिलाफ फर्जी मामले दर्ज कर उन्हें महीनों तक जेलों में निरूद्ध रखा गया। उससे पत्रकारिता की दशा और दिशा ही बदल गई। इन 04 सालों में अब वही पत्रकार शेष बचे हैं जो राज्य की कांग्रेस सरकार का गुणगान करने में माहिर माने जाते हैं। हकीकत बयां करने वाले पत्रकारों को ठिकाने लगाने की योजना कांग्रेस पार्टी की उपलब्धियों में से एक है। आम जनता के सिर से मुख्यमंत्री बघेल और कांग्रेस का भूत तेजी से उतर रहा है। वहीं लोगों को लगने लगा है कि कांग्रेस से तो बेहतर पुरानी बीजेपी सरकार ही थी। यही नहीं कांग्रेस की जड़ों पर जिस तरह से मुख्यमंत्री बघेल और उनके करीबियों ने हमला किया है उससे आम कांग्रेसी भी सदमे में हैं। अब भूपेश बघेल को आंखे खोलने चाहिए और अपने आगे पीछे की चंडाल चौकड़ी से बाहर निकलना चाहिए। आज के छत्तीसगढ़ में कैसे एक अधिकारी को सरकार और कांग्रेस पॉलिटिक्स के ऊपर बिठा दिया है यह एक आश्चर्य की बात है, इसका एक वाकया सामने भी आया है जब आलाकमान की अनुशंसा से प्राप्त राहुल गांधी के मित्र कोई काम लेकर सौम्या से मिले, सौम्या ने उन्हें उक्त काम के लिए मना कर दिया और साथ में हिदायत भी दी की आगे से डायरेक्ट मेरे पास आए तभी काम होगा। आश्चर्य है कि पहले इनको सरकार उर्फ कैबिनेट से ऊपर रखा अब यह सीधे गांधी परिवार को ही मना कर देती है। इतना साहस या दुसाहस का कारण क्या है इसका पता लगाना चाइए ताकि छत्तीसगढ़ और बर्बाद होने से बच पाए।

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