ब्रिटेन अब आया पहाड़ तले !



--के• विक्रम राव,
अध्यक्ष- इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन बहुत व्यथित हैं। गत बृहस्पतिवार (6 मई 2021) के दिन स्काटलैण्ड प्रदेश के राष्ट्रीय विधानसभा के निर्वाचन में पृथकतावादी स्काटिश नेशनल पार्टी की प्रभावी जीत से स्वतंत्र स्काटलैण्ड की मांग फिर उठी है। राष्ट्रवादी नेता, विधिवेत्ता, इक्यावन-वर्षीया निकोला स्ट्रार्जन ने चुनाव परिणाम के तुरंत बाद मांग उठायी कि उत्तरी भूभाग का यह प्रदेश ब्रिटेन से अलग होकर एक गणराज्य बनना चाहता है। अत: जनमत संग्रह दोबारा हो। पहला हुआ था 2014 में जिसमें पचास प्रतिशत से कम वोट पृथकतावादियों को मिले थे।

विश्व के बड़े भूभाग का कभी सम्राट रहा इंग्लैण्ड अब टूटने की कगार पर है। कारण यही कि उत्तरी भूभाग (एडिनबर्ग) अब लंदन से कट जाना चाहता है। यूं भी दक्षिण के आयरलैण्ड पर इंग्लैण्ड ने कब्जा कर रखा है। उसे भारत-पाक की भांति स्वार्थवश विभाजित भी कर चुका है। यहां के राष्ट्रपति ईमन डिवेलेरा स्वाधीनता सेनानी रहे। फिर स्वतंत्र मगर विभाजित आयरलैण्ड के प्रथम राष्ट्रपति बने। वे चौथे भारतीय राष्ट्रपति वीवी गिरी के मित्र थे। गिरी ने राजधानी डबलिन में शिक्षा पायी थी। इसी भांति वेल्स प्रदेश भी इंग्लैण्ड के पूर्वी दिशा पर स्थित है जिसकी अपनी अलग भाषा, अलग राष्ट्रीय विधानसभा है। स्काटलैण्ड, वेल्स, उत्तरी आयरलैण्ड तथा इंग्लैण्ड मिलाकर यूनाइटेड किंगडम बना है जो यूरोपिय यूनियन से अलग होने के बाद अब टुकड़े हो सकता है, क्योंकि स्काटलैण्ड के स्वतंत्रता-समर्थक सांसदों की गत सप्ताह जीत से स्वतंत्रता संघर्ष को बल मिला है।

ऐतिहासिक रुप से स्काटलैण्ड की भारत से प्रगाढ़ मित्रता है। वह भारतीय स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी का समर्थक रहा। इसी भांति महान नाटककार जार्ज बर्नार्डशा की स्पष्ट उक्ति थी कि उनके स्वदेश आयरलैण्ड की भांति भारत पर राज करने का इंग्लैण्ड का कतई अधिकार नहीं है। अपनी बम्बई (अब मुम्बई) यात्रा पर 1931 में बर्नार्डशा ने यह कहा था।

अत: स्काटलैण्ड में भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिये जनमत संग्रह की मांग से इंग्लैण्ड के शासकों का कम्पित होना स्वाभाविक है। हालांकि 2014 के जनमत संग्रह में स्वाधीन स्काटलैण्ड के पक्ष में 45 प्रतिशत वोट मिले थे। मगर अब इंग्लैण्ड के यूरोपियन यूनियन से अलग होने पर स्काटलैण्ड का तर्क है कि वह यूरोपियन यूनियन का सदस्य बनना चाहता है। यह संभव है यदि वह इंग्लैण्ड से पृथक हो जाये।

सदियों से भी इंग्लैण्ड तथा स्काटलैण्ड के लोगों में वैचारिक शत्रुता बड़ी घनी रही है। अंग्रेजी भाषा के प्रथम शब्दकोष के रचयिता डा. सैमुअल जांसन ने जुई के दाने को परिभाषित किया था कि : ''अनाज जिसे घोड़े तथा स्काटजन खाते हैं।'' साहित्यकार से राजनयिक तक इंग्लैण्ड के सभी पुरोधाओं की अपने इस द्वितीय उपनिवेश के प्रति दृष्टिकोण तथा सोच ऐसी ही रही। जार्ज बर्नार्डशा ने जवाहरलाल नेहरू को लिखा भी था कि ''उस बूढे़ ब्रिटिश शेर ने मेरे स्वराष्ट्र की भांति तुम्हें भारत को भी धर्म के आधार पर विभाजित कर दिया।''

केवल चार लाख आबादीवाला (लखनऊ के छोटे से मुहल्ले के बराबर) स्काटलैण्ड यदि आजादी के पक्ष में मतदान करें तो साम्राज्यवादी ब्रिटेन को अपने उपनिवेशों के शोषण का दण्ड मिल जाये। स्काटलैण्ड की आजादी के विरूद्ध इंग्लैण्डवालों के प्रचार अभियान यही है कि यदि स्काटलैण्ड स्वतंत्र हो गया तो विश्वभर में अलगाववादी आन्दोलनों को बल मिलेगा। इसमें कश्मीर, नागालैण्ड, तो उधर बलूचिस्तान का भी उल्लेख किया गया। विश्वविख्यात स्काच ह्निस्की महंगी हो जायेगी, यह भी मुद्दा था।

स्काटलैण्ड की आजादी की मांग के पीछे तीन खास कारण हैं। सभी भारत के स्वाधीनता संग्राम से मिलते जुलते हैं। एक है कि स्काटिश जनता पर नृशंस अत्याचार न हो। स्काटलैण्ड की हिमसिंचित पर्वत श्रृंखला के वन का काटना और पहाड़ियों (शूरवीर हाइलैण्डर्स) का नरसंहार करना ही इंग्लैण्ड की शासकीय नीति तीन सदियों तक रही। वस्तुतः स्काटलैण्ड में अपने फौजियों को नरवध का प्रशिक्षण देकर ही ये ब्रिटिश साम्राज्यवादी इन कमाण्डरों को जलिंयावाला बाग, मुम्बई का अगस्त क्रान्ति मैदान, बलिया आदि विद्रोही स्थलों पर भेजते थे। दूसरा है स्काटलैण्ड के खनिज पदार्थ, विशेषकर कच्चा तेल सस्ते में लेना। स्काटलैण्ड का तीसरा प्रतिरोध था कि अनावश्यक युद्धों में (ईराक, सीरिया, बोस्निया आदि) में स्काट सैनिकों की बलि देना और परमाणु शस्त्र को त्राइदेन्ट नामक स्काट नगर में निर्मित करना। स्काटलैण्ड अपनी विपन्नता के कारण इसे सहता रहा।

अमूमन इंग्लैण्ड से आये सत्तासीन अंग्रेजों को भारतीय उपनिवेश के विकास में रूचि नहीं रही। मगर जो शासक स्काटलैण्ड प्रान्त से भारत आये उनका दिल इन शोषित और पीड़ित गुलामों के लिये धड़कता रहा। मसलन मुम्बई और मद्रास प्रान्तों में शिक्षा की शुरूआत उन गवर्नरों से किया जो स्काट थे।

स्काटलैण्ड का भारत को योगदान के स्वरूप में तीन महापुरूष स्मरणीय है। कालिन कैम्पबेल देहरादून आये थे और भारत का प्रथम भौगोलिक मानचित्र बनाया। उनके बाद सर्वेयर-जनरल कार्यालय बना। भूगोल शास्त्री की भांति वनस्पतिशास्त्री भी स्काटलैण्ड से आये। नाम था एलेक्सैण्डर किड्ड, जिन्होंने कलकत्ता का विश्वविख्यात बोटेनिकल गार्डेन बनाया, जहां देश का प्राचीनतम वटवृक्ष हर दर्शक के आकर्षण के केन्द्र है। डेविड ह्यूम स्काटलैण्ड के दार्शनिक थे जिनकी साम्राज्यवाद-विरोधी रचनाओं से भारतीय राष्ट्रवादी को अपार प्रेरणा मिली थी। वे इटावा के जिलाधीश रहे। कांग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष थे। लेकिन सर्वाधिक भारतभक्त रहे राष्ट्रीय कांग्रेस के चौथे अध्यक्ष जार्ज यूल (1888) जिन्होंने इलाहाबाद सम्मेलन का सभापतित्व किया था। कोलकता नगर के शेरिफ (महापौर जैसे) रहे।

यदि स्काटलैण्ड से भारत आये इन राजनयिकों की चलती तो भारत को स्वतंत्रता चवालीस वर्ष (1924) पूर्व ही मिल जाती। स्काट सोशलिस्ट नेता और भारतमित्र रेम्से मैकडोनल्ड तब ब्रिटेन में साझा सरकार के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया ताकि भारतीय उपनिवेश का मसला हल हो। पर मुस्लिम लीग के अड़ियलपन से यह संभव न हो पाया। तब संसद में कन्जेर्वेटिव पार्टी के दबाव से लेबर पार्टी असहाय थी। मैकडोनल्ड राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता करने हेतु भारत आनेवाले भी थे।

यहां स्काटलैण्ड के इतिहास से एक उपयुक्त घटना का उल्लेख आवश्यक है। बालक-पाठक सर्वत्र स्काटलैण्ड के राजा राबर्ट ब्रूस की कहानी पढ़ते हैं। किस प्रकार गुफा में छिपे रहकर वे जाल बुनती मकड़ी को गिरते उठते देखते। इंग्लैण्ड से पराजित यह स्काट राजा बहुत प्रेरित हुआ। कई बार लड़ा। अन्ततः इंग्लैण्ड को हराया। यह किस्सा आज भी बोधक है, सूचक है।

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