हमें चाहिए संपूर्ण स्वतंत्रता: देश के पत्रकारों एक हो



--शाहनवाज़ हसन,
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

सत्ता का यह चरित्र है, इसकी सवारी करने वाले को नशा सर चढ़ जाता है।विपक्ष में रहते जिस सीढ़ी को पकड़ कर सत्ता में आते हैं सबसे पहले उस सीढ़ी पर ही पहला वार करते हैं, चाहे दल कोई भी हो, सत्ता की सवारी सब संभाल नहीं पाते। कोपभाजन पत्रकार ही बनते हैं, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिनके लिए पत्रकार अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं जेल में ठूंसे जाते हैं, हत्याएं तक होती हैं वे (सजग जनता) भी पत्रकारों के साथ खड़े नहीं होते। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (अधिकांश भांड की भूमिका में) के एंकरों को ही आजकल लोग पत्रकार समझते हैं। फिर भी हम लड़ते हैं उनके लिए जो हमारे लिए सदैव अदृश्य रहते हैं।

महात्मा गांधी ने संपूर्ण स्वराज का नारा दिया था, अब पत्रकारों को एक निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी। संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए सत्ता के नशे में यह चाबुक तबतक पत्रकारों पर चलता रहेगा जबतक 124(ए) की लगाम सत्ता के हाथों होगी। सभी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में पत्रकारों की स्वतंत्रता (पत्रकार सुरक्षा कानून) की घोषणा की जाती है सत्ता में आते ही उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इस संघर्ष के लिए अब हमें तैयार रहना होगा, चाहे आप किसी भी संस्थान/संगठन से क्यों न जुड़े हों इस संघर्ष में साथ खड़े हों। संपूर्ण स्वतंत्रता से कम पर कुछ भी नहीं मंज़ूर।

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