नाबालिग अपराधी: हालात का शिकार या स्क्रीन का गुलाम?



--के• विश्वदेव राव
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
इंडिया इनसाइड न्यूज।

रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था कि बच्चे इस दुनिया में नए संदेश लेकर आते हैं। पर सवाल यह है कि जब वही बच्चा कानून की पकड़ में आ जाए, तो समाज उसे नया संदेश देता है या नया दाग?

हाल में सुप्रीम कोर्ट की दो पीठों ने इसी सवाल पर दो अलग-अलग रास्ते चुने हैं। एक तरफ सितंबर 2026 में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने गरीबी, असमानता और भेदभाव को बच्चों के अपराध की जड़ माना। वहीं, कुछ हफ्ते पहले जुलाई 2026 में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने डिजिटल युग के हवाले से कहा कि अब बच्चे जल्दी समझदार हो रहे हैं, इसलिए नरम रवैये पर पुनर्विचार हो। दोनों फैसले अपने-अपने तर्क से सही लगते हैं, पर साथ में एक बेचैनी छोड़ जाते हैं।

यह बेचैनी सिर्फ अदालतों की नहीं, बल्कि उस समाज की भी है जो बच्चों को एक तरफ मासूमियत का प्रतीक मानता है, और दूसरी तरफ उसे स्क्रीन और संकरें रास्ते के बीच फंसा छोड़ देती है। आखिर एक नाबालिग अपराध की राह पर क्यों चलता है? क्या वह अपने हालात का शिकार है या डिजिटल दुनिया का प्यादा? और जब वह कानून की पकड़ में आए, तो न्याय प्रक्रिया में किन तथ्यों को तौलना चाहिए, उसकी गरीबी को, उसके द्वारा मोबाइल या अन्य उपकरणों के इस्तेमाल को, या उसके भीतर की उस टूटी हुई समझ को जो न गरीबी से बनी है न किसी मोबाइल की स्क्रीन से?

बड़े बुजुर्ग कहते हैं, बचपन में बुरी आदतों या संगति का ज़हर घुलने से पहले ही, बच्चों के मन में अच्छे संस्कारों का अमृत भर देना चाहिए। अर्थात: रोकथाम इलाज से बेहतर है।

पर आज के जमाने में बच्चे के हाथ में सस्ता स्मार्टफोन और असीमित डेटा ऐसे पहुंच जाता है जैसे बाजार में बिकाऊ सामान। जब माता-पिता रोजी-रोटी के लिए घंटों बाहर रहते हैं, और डिजिटल संपर्क ही उसके खालीपन को भरने वाला संसाधन होता है। तो समस्या तो उत्पन्न होगी ही।

2024 के आँकड़ों के अनुसार तो देशभर में नाबालिगों के खिलाफ 34 हज़ार मामले दर्ज हुए, जिसमे आरोपी या संलिप्त व्यक्ति नाबालिग थे। जो पिछले साल से 11 फीसदी ज्यादा हैं। इनमें से 77.7 फीसदी नाबालिग 16 से 18 साल के थे। दिल्ली, लखनऊ, पुणे जैसे शहरों में चोरी, लूट, ब्लैकमेलिंग और वसूली के मामले सामने आए हैं जहां सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ है।

पर सच तो यह है कि गरीबी और स्क्रीन अलग-अलग नहीं चलते। वे एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं। विभिन्न देशों में हुए अध्ययन की माने तो जिन घरों में तनाव, अनिश्चितता और उपेक्षा का माहौल हो, वहां बच्चे के दिमाग के विकास पर असर पड़ता है। शुरुआती सालों में लगातार तनाव उन न्यूरॉन्स को नुकसान पहुंचा सकता है जो भावनाओं और सीखने की क्षमता पर काम करते हैं। वहीं, ज्यादा स्क्रीन टाइम से अवसाद और व्यवहारिक समस्याएं बढ़ती हैं। अब सवाल यह है कि जब गरीबी और स्क्रीन दोनों मिलकर किसी बच्चे की ज़िंदगी को दिशाहीन कर दें, तो न्याय व्यवस्था उसे कैसे देखे?

यहीं पर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 15 का सवाल आता है। इस धारा के तहत 16 से 18 साल के किशोरों पर गंभीर अपराधों में प्रारंभिक आकलन करने की ज़िम्मेदारी जुवेनाइल जस्टिस बोर्डों पर है। यह तय करना कि बच्चे में अपराध की प्रकृति समझने और उसके नतीजों का अंदाज़ा लगाने की मानसिक क्षमता थी या नहीं। पर ज़्यादातर बोर्ड न तो प्रशिक्षित बाल मनोवैज्ञानिकों से लैस हैं, न ही उनके पास कोई स्पष्ट, वास्तविक मापदंड है। इन हालातों में पहले से बोझ तले दबे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के मजिस्ट्रेट किस दिशा में फैसला लें?

यह भूलना भी आसान नहीं कि अगर गरीबी को अपराध की मुख्य वजह मान लिया जाए, तो निम्न आय वर्ग और सड़क पर पले-बढ़े बच्चे तो पैदा ही अपराधी हुए, वहीँ दूसरी ओर, डिजिटल जानकारी को नैतिक और भावनात्मक परिपक्वता मान लिया जाए, तो किसी सोलह साल के बच्चे के आवेगपूर्ण कृत्य को वयस्क अपराध की तरह देखा जा सकता है। दोनों ही नज़रिए, अपने चरम पर, इंसाफ को अन्याय में बदल सकते हैं।

पर असल संकट अदालतों के फैसलों में नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर बैठे जुवेनाइल जस्टिस बोर्डों की सीमाओं में है। 2025 और 2026 में कई पी•आई•एल• फैसलों में कोर्ट ने जोर दिया है कि नाबालिगों के आपराधिक रिकॉर्ड गोपनीय रखे जाएं और उन्हें नष्ट किये जाने का अधिकार हो। पर जब बोर्डों के पास न प्रशिक्षित विशेषज्ञ हों, न स्पष्ट मानदंड, तो ये निर्देश कागज पर ही रह जाते हैं। अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा कि एक नाबालिग को गलती से दो साल तक नियमित जेल में रखा गया, जिसे “गंभीर और व्यवस्थागत” विफलता कहा गया। यह सिर्फ एक मामले की बात नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है।

सरकार ने 2015 में जो बदलाव किए उसमें उन्होंने 16-18 साल के किशोरों को वयस्कों जैसा माना जा सकने का रास्ता तो खोल दिया, पर धारा 15 के तहत आकलन को स्पष्ट, साक्ष्य-आधारित दिशा-निर्देश देने का काम अधूरा छोड़ दिया। ज़मीनी स्तर पर बोर्डों को मजबूत करने, बाल मनोवैज्ञानिकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण पर ध्यान देना अभी बाकी है। बेहतर यह होगा कि हर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में प्रशिक्षित बाल विशेषज्ञों की अनिवार्य मौजूदगी हो, धारा 15 के आकलन के लिए स्पष्ट मनोवैज्ञानिक मापदंड बनें, और ऐसा कानून हो जो यह सुनिश्चित करे कि गरीबी और डिजिटल जानकारी से अपराधबोध सिद्ध न किया जाये।

चिंता जनक तो तब होगा जब न्यायपालिका की अलग-अलग पीठें बुनियादी सिद्धांतों पर मामले-दर-मामले अलग-अलग राय बनाती रहेंगी, तो देश भर में किशोर न्याय एक जैसा कैसे रहेगा?

अपितु यह ज़िम्मेदारी अदालतों की नहीं, संसद की है।

अंततः कोर्ट बच्चों को हालात का शिकार या डिजिटल दुनिया का समझदार नागरिक मानती रही, तो आखिर हम उन्हें क्या मानें? शिकार या प्यादा?

जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक हर किशोर का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि उसका मामला किस पीठ के सामने सुना जायेगा? फिर तो यह इंसाफ नहीं, किस्मत का खेल बन जाएगा।

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