--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■कमलनाथ की ऊर्जा क्षेत्र में बदलावों की नींव वाले दौर में संसदीय कमेटी में रही महत्वपूर्ण भूमिका
देश के पेट्रोलियम क्षेत्र में आज जब आपूर्ति, कीमतों और उपलब्धता को लेकर नई चुनौतियां सामने आती हैं, तब पुराने संसदीय अनुभवों और नीतिगत समीक्षा से सीख लेना समय की जरूरत है। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ नेता कमलनाथ 1998-99 में पेट्रोलियम एवं रसायन संबंधी स्थायी समिति के सदस्य रहे। उस समय समिति में अध्यक्ष सहित कुल 23 सदस्य थे और समिति की अध्यक्षता डॉ. बलराम जाखड़ कर रहे थे। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े सार्वजनिक उपक्रमों तथा नीतिगत विषयों की संसदीय समीक्षा की गई थी। इसलिए कमलनाथ ने पेट्रोलियम क्षेत्र में उस दौर में जो सिफारिश दी उन्हें सरकार ने स्वीकार किया। यही कारण है कि कमलनाथ की भागीदारी को देश के ऊर्जा क्षेत्र में हो रहे महत्वपूर्ण बदलावों की संसदीय निगरानी के उनके अनुभव के रूप में अवश्य देखा जा सकता है। उस दौर में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां देश की ऊर्जा व्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिला थी। आज केंद्र सरकार के सामने पेट्रोलियम क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रश्न हैं। ऐसे समय में राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर देश के अनुभवी नेताओं, नीति विशेषज्ञों और पूर्व जनप्रतिनिधियों के अनुभव का उपयोग किया जाना चाहिए। कमलनाथ का लंबा संसदीय अनुभव उन्हें ऐसे विमर्श में उपयोगी आवाज बना सकता है। वर्तमान सरकार यदि पुराने अनुभवों और नए नीतिगत उपायों के बीच समन्वय स्थापित करे, तो पेट्रोलियम क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए व्यापक और व्यावहारिक दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है।
भारत के पेट्रोलियम और रसायन क्षेत्र के विकास की कहानी केवल हाल के वर्षों की नहीं है। उदारीकरण के बाद 1990 के दशक में देश की ऊर्जा जरूरतों, घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन, निजी निवेश, रिफाइनिंग क्षमता, पेट्रो केमिकल उद्योग और उभरती ऊर्जा तकनीकों को लेकर कई महत्वपूर्ण नीतिगत बदलावों की नींव रखी गई। 1998-99 में भारत का पेट्रोलियम क्षेत्र एक ओर सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों पर निर्भर था, वहीं दूसरी ओर आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी भागीदारी और प्रतिस्पर्धा के लिए रास्ते खोले जा रहे थे।
●संसदीय निगरानी का महत्वपूर्ण दौर
पेट्रोलियम एवं रसायन संबंधी स्थायी समिति का मूल काम सरकार के मंत्रालयों की योजनाओं, बजट और नीतियों की संसदीय समीक्षा करना था। समिति ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की वर्ष 1999-2000 की अनुदान मांगों की जांच की। समिति ने मंत्रालय के अधिकारियों से साक्ष्य लिए और इसके बाद रिपोर्ट को अपनाया। कमलनाथ की भूमिका इसी संसदीय प्रक्रिया के भीतर थी। उस समय के किसी विशिष्ट सरकारी निर्णय को अकेले कमलनाथ का निर्णय बताने के बजाय यह कहना अधिक तथ्यात्मक है कि वे उस संसदीय समीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा थे, जिसमें पेट्रोलियम क्षेत्र की भविष्य की दिशा पर महत्वपूर्ण विमर्श हुआ।
●घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने की चुनौती
समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में एक घरेलू कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन को बढ़ाना था। रिपोर्ट में कहा गया कि देश के हाइड्रोकार्बन भंडार सीमित थे और नई खोजों में तेजी नहीं आने पर आने वाले वर्षों में आयात पर निर्भरता बढ़ सकती थी। समिति ने इस स्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया और मंत्रालय द्वारा खोज गतिविधियों को बढ़ाने के लिए उठाए जा रहे कदमों की समीक्षा की। रिपोर्ट में 3-डी सिस्मिक सर्वे, गहरे पानी और नए फ्रंटियर बेसिन में खोज, आधुनिक तकनीक, अतिरिक्त खोजी कुओं तथा निजी भागीदारी जैसे उपायों का उल्लेख है। उस समय देश के लगभग 45 प्रतिशत तलछटी बेसिन पूरी तरह अन्वेषित नहीं थे। इस स्थिति ने भारत के लिए नए तेल और गैस संसाधनों की खोज को रणनीतिक आवश्यकता बना दिया था। यह वह दौर था जब ऊर्जा सुरक्षा को लेकर संसदीय विमर्श अधिक व्यापक हो रहा था। कमलनाथ जैसे अनुभवी सांसद का इस समिति में होना उस संसदीय निगरानी व्यवस्था का हिस्सा था, जिसमें सरकार की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन पर सवाल-जवाब तथा समीक्षा की जाती थी।
●रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने पर जोर
भारत के पेट्रोलियम क्षेत्र में केवल तेल की खोज ही पर्याप्त नहीं थी। देश में बढ़ती खपत को पूरा करने के लिए रिफाइनिंग क्षमता का विस्तार भी आवश्यक था। समिति की रिपोर्ट के अनुसार उस समय देश की कुल रिफाइनिंग क्षमता लगभग 67.55 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष थी। विभिन्न नई रिफाइनरियों और विस्तार परियोजनाओं के पूरा होने के बाद इसे 2001-02 तक लगभग 113.95 मिलियन मीट्रिक टन और 2006-07 तक लगभग 145.75 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचाने की योजना थी। रिफाइनिंग क्षमता का यह विस्तार बाद के वर्षों में भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण आधार बना। देश में सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों के साथ निजी क्षेत्र की परियोजनाओं का विस्तार भी इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा था।
●रसायन और उर्वरक क्षेत्र की भी समीक्षा
कमलनाथ की समिति की जिम्मेदारी केवल पेट्रोलियम तक सीमित नहीं थी। समिति के अधिकार क्षेत्र में रसायन एवं उर्वरक विभाग भी शामिल था। समिति ने उर्वरक विभाग की अनुदान मांगों की भी जांच की और इस विषय पर अलग रिपोर्ट प्रस्तुत की। बाद में समिति ने सरकार की ओर से की गई कार्रवाई की समीक्षा भी की। इसी अवधि में देश में दवा और रसायन उद्योग को लेकर भी नीतिगत पुनर्विचार चल रहा था। उस दौर की समीक्षा के आधार पर वर्तमान सरकार को भी अमल करना चाहिए। जिससे काफी हद तक पेट्रो पदार्थों की समस्या से उबरा जा सकता है। राजनीतिक वैमनस्यता से हटकर देशहित ही सर्वोपरि होना आवश्यक है।